Moral stories in hindi : “ अरे सुरेश बाबू … आज आपको ही याद कर रहा था और देखो आपने फ़ोन कर दिया.. कहिए क्या हाल है…लगता है अब बैंगलोर जाकर हमें भूल ही गए तभी तो अपना घर भी बेचने का विचार कर रहे।” कैलाश जी ने जैसे ही सुरेश जी से ये सब कहा वो आँखें फाड़ फ़ोन को ऐसे घूरने लगे मानो कोई ऐसी बात हो गई जो कभी सपने में भी वो ना सोचें हो
“ ये आप क्या कह रहे कैलाश बाबू… मैं तो आप सब का हाल पूछने को फ़ोन किया और जानना चाहता था मेरे बच्चे मतलब मेरे पेड़-पौधे सब ठीक तो है ना… मैं तो अपने घर आने की सोच रहा था….पर आपकी बातें सुन मेरा सिर घूमने लगा… सच सच बताइए क्या बात हो गई?” आश्चर्यचकित सुरेश जी पूछे
“ ये आप क्या कह रहे हैं सुरेश बाबू… आपके घर में तो कुछ दिन पहले से लोग रह रहे हैं …. सुनने में तो यही आया आप घर बेचकर अब बैंगलोर में ही रहने वाले है … लगता है आपके बेटे ने आपको कुछ बताया नहीं… चलिए फिर कभी बात करता हूँ… पोते पोती को बसस्टॉप से लाने का समय हो गया ।” कह कैलाश जी ने फ़ोन रख दिया
इधर सुरेश बाबू हैरान परेशान से घर में चहलक़दमी कर रहे थे… ये क्या कह रहा था कैलाश…. सुबोध ने मुझे कुछ बताया भी नहीं और घर किराए पर लगा दिया और बेच दिया ये सब मैं क्या सुन रहा हूँ… कितने जतन से रमा के साथ मिलकर घर बनाया था… रमा ने घर के लिए कितनी ख्वाहिशों को ताक पर रख दिया था…. मुझे यहाँ आना ही नहीं चाहिए था….ये सब सोचते सोचते उन्हें यहाँ आने से पहले की बातें एक एक कर याद आने लगी…
पत्नी की मृत्यु के बाद जब बेटा सपरिवार आया था तो जाने से कुछ दिन पहले ही बेटे ने कहा था “ पापा सोच रहा हूँ अब इस घर को ताला लगा दिया जाए…और आप हमारे साथ बैंगलोर रहने चलिए…… अब माँ भी नहीं है तो यहाँ आप अकेले कैसे रहेंगे….हम दोनों पतिपत्नी काम करते हैं आपके पास यहाँ रहना मुनासिब नहीं होगा…इसलिए आप हमारे साथ चल चलिए ।” सुबोध ने सुरेश बाबू से कहा
मरते क्या ना करते … पत्नी जो चंद दिनों पहले साथ छोड़ कर चली गई…डायबिटीज़ और वीपी के मरीज कहाँ अकेले रहते …सोचाबच्चों के साथ समय व्यतीत हो जाएगा…..एक ही बेटा है जिसके साथ जाने के अलावा कोई चारा नज़र नहीं आया।
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सुरेश बाबू अपने कपड़े, दवाइयों और साथ में धर्मपत्नी की तस्वीर साथ लिए बिहार के एक ज़िले से निकल कर बैंगलोर चल दिए…
बैंगलोर में बेटे का दो कमरों का घर और पाँच लोग…. सुबोध उसकी पत्नी मनु और छोटा बेटा एक कमरे में और उससे बड़ा दूसरे कमरे में दादा के साथ रहने लगा।
कुछ दिन ही हुए थे सुरेश बाबू का बहुत कोशिशों के बाद भी यहाँ मन नहीं लग रहा था ….अपने यार दोस्तों के साथ कॉलोनी में रहने की आदत… उनके साथ बैठ कर अपने दुख सुख कहना …पत्नी की आती याद इन सब से सुरेश बाबू दुखी रहने लगे थे….वो वापस अपने शहर जाना चाहते थे….
आज यही सोचकर हाल समाचार लेने को कैलाश जी फ़ोन किए और साथ ही ये बताने को कि अब वो वही रहने आना चाहते है परकैलाश जी की बात सुन वो परेशान हो गए ।
शाम को ऑफिस से जब बेटा आया उसे अपने पास बुलाएँ और बोले,“ बेटा मैं वापस उस घर जाना चाहता हूँ जहाँ तुमने ताला लगवा दिया था….मेरा मन यहाँ नहीं लग रहा है जब तक हाथ पैर सलामत हैं मैं अपनी देखभाल कर लूँगा जब नहीं कर पाऊँगा तो यहाँ आ जाऊँगा….।”
“ पर पापा अब आप उस घर नहीं जा सकते…. आपको रहना हमारे साथ ही होगा…. वहाँ हम तो साथ नहीं होंगे ।” घर में कदम रखती ससुर की बात सुन बहू ने कहा
“ यहाँ भी कौन सा तुम लोग रहते हो …. बच्चे भी अपने स्कूल कोचिंग में व्यस्त रहते … एक कला आती है वो खाना पीना …दवा दे जाती है तुम दोनों कौन सा मेरे साथ ही रहते हो ।” सुरेश बाबू क्षोभ व्यक्त करते हुए बोले
“ ये कैसी बात कर रहे हैं पापा… हम दोनों सुबह और रात सशरीर आपके साथ तो होते हैं पर पूरे दिन हम कैमरे से आपको देख कर तसल्ली करते रहते हैं कि आप ठीक है फिर कला भी तो आपका पूरा ध्यान रखती है ..उधर जाने के बाद आप बिलकुल अकेले हो जाएँगे।” सुबोध ने कहा
“ ये बोलो ना बेटा अब उस घर पर मेरा कोई अधिकार ही नहीं रहा… तुमने उसे बेचने की पूरी तैयारी कर ली है…. घर भी किराए पर लगा दिया है ।” सुरेश बाबू ग़ुबार निकालते हुए बोले
“ओहहह तो आपको पता चल ही गया… चलिए फिर हम कागज पर आपके दस्तख़त भी ले लेते है ताकि बाकी की कार्रवाई की जा सकें… मनु जरा वो पेपर लेकर आना।” सुबोध पिता के पास बिना किसी झिझक के ढीठ की तरह बैठ गया
मनु कागज लेकर आई और सुरेश बाबू के सामने रख दी….
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कागज देखते सुरेश बाबू कभी बेटे बहू को देखते कभी कागज को… वो एक वृद्धाश्रम का काग़ज़ था।
“ ये सब क्या है?” सुरेश बाबू ने पूछा
“ पापा हम घर बेच नहीं रहे बस उसे किराए पर लगा दिया है… एक चाभी वहाँ मनोहर अंकल के पास रहता था ना… उन्होंने ही सुझावदिया ….बेटा घर में तुम लोग ताला लगा कर चले गए हो… जानता हूँ तुम लोगों के पास अपने लिए पर्याप्त पैसे है…
किराए की ज़रूरतनहीं होती पर एक सुझाव है मेरा ये घर किराए पर लगा दो और जो भी किराया आएगा रमा भाभी अक्सर जिस वृद्धाश्रम जाकर सबकी सेवा किया करती थीं वहाँ दान दे दो…. भाभी को अच्छा लगेगा और घर पर ताला भी नहीं लगा रहेगा मैं किसी पहचान वाले से बात करूँअगर तुम बोलो तो….
पर तेरा अड़ियल बाप ना मानेगा ये भी सोच लेना… बस पापा हमने माँ की ख़ुशी के लिए ये सब किया आपको तोहम कभी अकेले रहने नहीं देंगे ये मेरा खुद से वादा है… अब जहाँ नौकरी कर रहा हूँ रहना तो वही होगा ना….
उस घर पर आपका हीअधिकार है ….वो घर कल भी आपका ही था आज भी आपका ही है उसपर लगा ताला भी आपका और चाबी भी…. आप नहीं बेचनाचाहते तो हम ऐसा क्यों करेंगे….
वैसे एक ख़ुशख़बरी है आपके लिए हम अब दूसरी सोसायटी में जाएँगे जहाँ आपके हमउम्र लोग बहुत हैजिनके साथ मिलकर बातें कर आपको अच्छा लगेगा…. वैसे आपको बिना बताए सब निर्णय लिया उसके लिए सॉरी।” सुबोध सुरेशबाबू से बोला
“ मैं भी ना ….जब से कैलाश से बात किया तब से ना जाने क्या क्या सोच लिया था….अब मुझे कोई आपत्ति नहीं है बेटा मेरी रमा कीख़ुशी जिसमें मैं भी उसमें खुश रहूँगा….।” कहते हुए सुरेश बाबू ने बेटे को गले से लगा लिया
आजकल का समय ऐसा आ गया है हम ग़ैरों की बात सुन जल्दी आवेश में आ जाते हैं और अपनों पर ही शक करने लगते हैं…. ज़रूरीनहीं हर बार हमारी संतान गलत ही कर रही हो…. कभी उनका भरोसा भी कर लेना चाहिए ….
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धन्यवाद
रश्मि प्रकाश
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