“एक सहारा”  – डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

   पूरे गाँव में चर्चा का विषय था कि पांडे जी की बेटी लता जिलाधिकारी बन गईं हैं। उसे देखने और सम्मानित करने के लिए गाँव वालों ने एक बहाना बनाया क्योंकि  विवाह के बाद जो वह विदा होकर ससुराल गई उसके बाद वह वापस गांव नहीं आई थी। नव निर्मित प्राथमिक विद्यालय का उद्घाटन करने के लिए आग्रह पूर्वक तैयार कर लिया था। वह तैयार हो गई लेकिन एक शर्त के साथ। शर्त यह था कि वह  जाएगी तो अपने  बाबूजी के साथ ! अब गांव की बेटी जिलाधिकारी बन चुकी थी तो गांव वालों को उसके शर्त का मान रखना जरूरी भी था। लेकिन अफसोस की बात यह थी कि पिछले साल बाबूजी स्वर्गवासी हो गए इस कारण समारोह स्थगित हो गया। 

साल भर बाद, आज सबके लिए खास और खुशी का दिन था।गाँव में खूब गहमागहमी थी। लोगों ने ने बड़े सम्मान के साथ चौरस्ते से लेकर मंच तक अतिथियों के लिए  कालीन बिछवाया था। मंच चारों तरफ से फूलों की झालर से सजाया गया था। सब गणमान्य लोग फूलों की माला लेकर गाँव के मुहाने पर इंतजार कर रहे थे। जैसे ही चार -पांच गाड़ियों के साथ जिलाधिकारी की गाड़ी आई। सभी उपस्थित लोग माला लेकर आगे बढ़े। पांडे जी भी साथ में खड़े थे। उनकी आंखें भरी हुई थीं दस साल बाद बेटी को देखा था। बेटी साक्षात सरस्वती का रूप लग रही थी उपर से नीचे तक श्वेत वस्त्र धारण किए हुए। मानो  वह अपनी जन्मभूमि को अपने कमंडल -जल से पवित्र करने स्वर्ग से उतरी हो !! 

भीड़ को चीरती हुईं वह मंच पर पहुँची। साटन के कपड़े से दो मूर्ति ढ़की हुईं थीं। लता को आश्चर्य हुआ कि एक तो शहीद कॅप्टन विजय की है जिनके नाम पर विद्यालय था और दूसरी किसकी? 

उसने पहली मूर्ति का फीता काटा चारों तरफ से तालियां बजने लगीं। नारे लगने शुरू हो गये। विजय बाबु अमर रहें…शहीद विजय अमर रहें ।जब तक सूरज चांद रहेगा…..। 

दूसरी मूर्ति किसकी है यही सोचते हुए लता कैची लेकर काटने के लिए आगे बढ़ी मूर्ति के नीचे लिखे नाम पर उसकी नजरें ठिठक गईं…. स्वर्गीय रामेश्वर दीक्षित!

लता के मूंह से अनायास निकला…

बाबूजी की मूर्ति! इस गाँव में ! मेरे बाबूजी मेरे भगवान मेरे सामने विराजमान हैं! 

लता पढ़ते-पढ़ते बाबूजी के नाम में कहीं खो सी गई। उसके कान में बाबूजी की आवाज गूँज रही थी…. 

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“लता, अपना सामान समेट लो बेटा, तुम लोगों को वापसी में देर हो जाएगी,सवेरे- सकाल यहां से निकल जाओ। दूर का सफर है।

बेटा, तुम्हारे पिताजी कब से बाहर बैठे इंतजार कर रहे हैं,जाओ “बहू” देर न करो।” 

“बाबूजी मैं आपको छोड़कर यहां से कहीं नहीं जा रही !” 

“क्यूँ बच्चों जैसी हठ कर रही हो बहू, क्या करोगी यहां अकेली रहकर इस खंडहर में!  मैं बुढ़ा आदमी अपना ठिकाना नहीं खुद बेसहारा हो गया हूँ। तुम्हारा ध्यान कहां रख पाउंगा।” 

लता की आँखों से झड़ -झड़ आंसु बहने लगे। उन्हें किसी तरह रोकने का प्रयास करते हुए बोलीं-” बाबूजी मुझ अभागिन के लिए आपके हृदय में इतनी ही जगह थी?

मैंने तो सोचा था आपके दहलीज पर डोली में आई थी, यहां से अर्थी में ही जाऊँगी।” 

बाबूजी अपने आसुओं को रोक नहीं पाये बोले –

“बेटा इस बूढ़े पिता पर रहम खाओ! मेरे मन के घाव पर मत चोट करो।जो पहले से ही अपने बेटे के गम में घायल है। तुम्हारे लिए मेरे मन में क्या है यह अपने पिता से पूछ लेना । सैकड़ों ल़डकियों में मैंने तुम्हें, तुम्हारे पिता से माँगा था अपने बेटे के लिए।” 

बाबूजी,आपके बेटे ने जो सम्मान मुझे पत्नी बनाकर दिया था। वह मैं ताउम्र अपनी यादों में सम्भाल कर रखना चाहती हूँ क्या आप मेरा साथ नहीं देंगे…..  आप मुझे अपने आँगन के कोने में थोड़ी जगह नहीं देंगे बाबूजी ?” 



“नहीं बेटा ऐसी बात नहीं है, मेरे लिए जितना प्यार बेटे के लिए था उससे रत्तीभर भी कम नहीं है तुम्हारे लिए। लेकिन किस हक से रोक लूं तुम्हें।  बेटा, निर्दयी वक्त ने  मेरा बेटा छीन लिया मुझसे ।अकेला कर दिया इस बुढ़ापे में। ” 

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बहू,”मैंने तुम्हारे पिताजी से पहले ही माफ़ी मांग ली है और अब तुम भी मुझे माफ कर देना।तुम्हारे अभी हँसने खेलने के दिन हैं । मैं नहीं चाहता कि इस चारदीवारी में घुटकर तुम्हारी खुशी  रह जाए। ” 

बाबूजी के जुड़े हाथ अपनी ओर देख लता विह्वल हो रो पड़ी। उसने आगे बढ़कर उनका हाथ थामते हुए कहा-” बाबूजी अगर ‘लता, आपकी बेटी होती तो क्या आप उसे अपने घर से चले जाने को कहते? ” 

बाबूजी लता की बातें सुन फफककर रोने लगे। 

लता ने झुककर उनका पैर पकड़ लिया और बोली-” बाबूजी आपकी  इस बेटी को आपके सहारे की जरूरत है आप इसे अपनी चरणों में जगह दीजिये,

देंगे न!” 

बाबूजी ने लता को अपने पैरों पर से ऊपर उठाया और माथा चूमते हुए बोले-” बेटा, सहारा तुम्हें नहीं इस बुढ़े  बाप को है जिसका अब कोई नहीं है इस बंजर दुनियां में।” 

“अपने बाबूजी को माफ कर दो बेटा तुम्हें भगवान ने बेटी के रूप में लक्ष्मी भेजा है ।मैं पहचान नहीं पाया मुझसे भूल हुई । ” 



बाबूजी ने बाहर जाकर लता के पिताजी से माफ़ी मांगते हुए कहा कि माफ कीजिये समधी जी, मैं अपनी बेटी को आपके साथ नहीं जाने दे सकता!!

आपके घर से उसे लक्ष्मी रूप में लाया था और मैं लक्ष्मी को अपने हाथों विदा नहीं कर सकता। 

पिताजी अपना आंसू पोछ खाली हाथ लौट गये। 

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उस दिन के बाद से उस घर में बहू और ससुर नहीं बल्कि एक पिता और बेटी रहते थे। लता ,बाबूजी के इर्द-गिर्द छाया बनी फिरती और बाबूजी हर सम्भव लता की इच्छाओं को पूरा करने में लगे रहते थे। उन्होंने लता की अधूरी पढाई फिर से शुरू कारवाई और उसे उत्साहित करते रहे। ग्रैजुएशन पूरी करने के बाद बाबूजी ने लता को यूपीएससी की तैयारी करने के लिए हॉस्टल में जबरदस्ती अपनी कसम देकर भेजा। शायद वैसा प्यार और प्रयास अपने भी नहीं करते हैं जैसा बाबूजी ने किया। पिछले साल लता ट्रेनिंग में ही थी तभी बाबूजी के नहीं रहने की खबर मिली थी। 

अचानक कान में किसी की आवाज गूंजी -” मैडम फीता काटीए और माईक में कुछ बोलिये,गाँव वाले इंतजार कर रहे हैं।”

लता ने फीता काटा सामने बाबूजी को देख खुद को रोक न सकी उसकी आँखें  झरने की तरह बहने लगी। पिछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। पलटकर देखा पिताजी थे उन्होंने बेटी को गले से लगा लिया और रुद्ध गले से बोले-” बेटा तेरे बाबूजी के लिए मेरे और गाँव वालों के तरफ से यह एक श्रद्धांजलि थी।” 

लता ने माईक सम्भाला और बोली-” मैं लता दीक्षित आप सभी का आभार प्रकट करती हूँ जो आपने इस उद्घाटन समारोह में भाग लेने के लिए मुझे आमंत्रित किया। मैं धन्यवाद देना चाहती हूँ अपने जन्मभूमि को और यहां के लोगों को जिन्होंने अपनी बेटी को इस धरती पर बुलाया। और मैं शत -शत नमन करती हूँ उस महापुरुष को और अपने श्रद्धेय बाबूजी को जिन्होंने मुझे यहां तक आने के लिए काबिल बनाया।”। 

#सहारा 

स्वरचित एंव मौलिक 

डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा 

मुजफ्फरपुर,बिहार 

 

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