सोमी की गरमी की छुट्टी हुए काफी दिन हो गये थे। वो मामा के यहाँ जाना नहीं चाहती थी। उसे बुआ के यहाँ जाना अच्छा लगता था, वो जब भी जाती तो दो चार दिन के लिए ही जाती थी। इस बार भाभी की बेटी मौली के साथ खेलना था, वो दो साल की थी, वो भी बहुत प्यारी थी। इस कारण सोमी को लग रहा था कि कब बुआ के यहाँ चली जाऊँ।
फिर कुछ बाद सोमी के पापा से बुआ की बात हुई उन्होंने कहा -फूफा जी सोमी को लेने आएगें। तब सोमी ने बड़ी खुशी- खुशी जाने की तैयारी की।
अब वह वहां पहुंच गयी। उसका मौली के साथ खूब मन लगता था। सुबह से रात तक का समय कब निकल जाता उसे पता न चलता… बुआ फूफा जी उसका खूब ख्याल रखते। वो न ज्यादा सब्जी खाती न ही कोई डिमांड करती, पर कहीं जाना हो तो वह खुश हो जाती। उसी शहर में उसके नाना जी और दूसरे फूफा जी रहते थे।
पर सोमी को बडे़ फूफा जी लाए थे तो उनके मन में था कि हम लेकर आए है तो दूसरी जगह क्यों भेजें फिर क्या था। न उसे नाना के यहाँ भेजते, न ही छोटे फूफा जी के यहाँ भेजते।
एक दिन उसे छोटे फूफा जी ने सोमी के लिए पूछा भी तो वो बोले हम लेकर आए है तो हमारे घर रहेगी। जब आप लाना तो आपके घर रहेगी। इस तरह सोमी को पता भी न चलने दिया छोटे फूफा जी लेने आए थे। खैर….
वो अपनी तरफ खूब प्यार देते। रोज आइसक्रीम शाम को खिलवाते, कभी डोसा, फुलकी, पिज़्ज़ा खिलवाते। अब दस दिन हो चुके थे। सोमी को घर की याद आने लगी,,रोज मम्मी पापा भैया से बात करती लेकिन अपना घर अपना ही होता है। न रोज घर में जल्दी उठना पड़ता, न ही कोई चीज लेने से पहले सोचना पड़ता। रोज घर में रहती
तो दूध मम्मी जबरदस्ती पिलाती ,उसने संकोच वश दूध एक दिन भी न पिया। घर में अधिकार पूर्वक सामान लेना, कभी ज्यादा लेना, कभी गिर जाए तो डर न लगना यही सब….
अब रोज मम्मी को फोन पर कहती -“मम्मी पापा को बोल दो लेने आ जाए।” तब फूफा जी कहते -क्यों सोमी कोई परेशानी है क्या.. रुको आराम से रहो…क्यों जल्दी जाना है। देखो तुम्हें भाभी भैया कितने अच्छे है तुम्हें प्रदर्शनी और माल ,चौपाटी सब जगह घुमा लाए तो क्यों घर जाना!!
तब वो कुछ नहीं बोली।
सोमी ने दो दिन बाद फिर कहा- फूफा जी हमें होमवर्क करना है ,इसलिए जाना है।
फिर तेरहवें दिन जब फूफा जी छोड़ने आए। तो कहने लगे सोमी बिटिया का तो हमारे घर खूब मन लगा। ऊपर से वो गिनाने लगे कि उन्होंने क्या- क्या खिलाया।
तब सोमी बोली- फूफा जी पापा तो आने वाले थे आपने कहा था आप लेकर आओगे।
आप ये क्यों गिना रहे हो। कि क्या -क्या खिलाया हमें,,,वो तो सभी चीजों को सब लोग खाते थे।
तब फूफा जी बोले- बेटा गिना नहीं रहे हैं, बस खुश रहो , इसलिए मन की चीज खाने मंगवाते थे।
तब सोमी बोली -” फूफा जी आपके यहाँ अच्छा तो लगा पर अपना घर अपना होता है।
. इस तरह घर आकर मम्मी से कहती- मम्मी अपने घर जैसी कोई जगह नहीं……. कम से कम कोई का एहसान तो नहीं.. क्या खिलाया…कहाँ घुमाया, तब मम्मी ने कहा-” बुआ के यहाँ अब नहीं जाओगी क्या? ” तब वह बोली -मम्मी मजबूरी में रहना अलग होता है। मुझे अपना घर ही अच्छा लगता है।
और वह मम्मी के ऊपर सिर रखकर लेट गयी। और मम्मी भी सिर पर हाथ फिराते हुए बोली-” मेरी सोमी बिटिया रानी तुम्हारे बिना भी घर सूना हो गया था। तुम्हारे भैया जब बात नहीं सुनता था और कोई बात न करता था तुम्हारी याद आती थी। “
इसलिए मैं रोज फोन करती थी। फिर सोमी भी लाड़ करते हुए बोली- मम्मी अब बिना कहीं नहीं जाऊंगी।
तब दोनों की बात सुनकर भैया भी मजा लेते हुए बोला हां हां पता कितने बार फोन करती थी। फिर सोमी कहती मम्मी देखो न भैया को….
इस तरह सोमी के घर आने से घर चहक उठा।
स्वरचित रचना
अमिता कुचया
#अपना घर अपना ही होता है….