दुलारी सिम्मी – डा उर्मिला सिन्हा

 आज क‌ई वर्षों के पश्चात् मायके की सीढ़ियां चढ़ती सिम्मी की आंखें भर आईं। यह वही घर है जहां उसका जन्म हुआ, घुटनों चली बड़ी हुई।पढ़ाई पूरी की।व्याही गई। दादा दादी, माता-पिता, चाचा चाची के आंखों की पुतली सिम्मी। भाई-बहनों के दिल की धड़कन दुलारी सिम्मी।

  न‌ आज दादा दादी हैं और न माता-पिता । भाई-बहन भी अपने संसार में उड़न छू हो ग‌ए।

     बस लाल चाचा और उनका परिवार इस गांव की पुरानी हवेली में रहते हैं। चाचा ने अपनी बिटिया की शादी में बड़े प्यार से निमंत्रित किया,”आ जा सिम्मी विवाह के बहाने ही सही।

 “जी , चाचा अवश्य….” वह गदगद हो उठी।

     और ठीक विवाह के दिन अपनी नन्ही परी के साथ आ पहुंचीं। गांव की तरक्की देख वह अभिभूत हो गई।

पक्की सड़कें, जगमग करती बिजली की झालरें, पक्के मकान। शादी घर में मिठाईयों की खूशबू , गहमा-गहमी किंतु सारे चेहरे अनजान।

 सिम्मी एक हाथ से बिटिया को थामें और दूसरे हाथ में विवाह में लाये उपहार का पैकेट पकड़ उपेक्षित सी खड़ी थी।बेबस नजरें किसी परिचित को चहुंओर ढूंढने लगीं।

  “अरे सिम्मी बिटिया……आ गई!”चाचा ने उसे गले से लगा लिया। भर-भराकर रो पड़ी दुलारी सिम्मी ‌निराशा के बादल छंटने लगे। फिर तो रस्म रिवाज और सभी के अपनापन ने उसका दिल जीत लिया।

  तीसरे दिन बिदाई में चाची ने जब खोंईंछा में चावल, हल्दी,दूब , चांदी का सिक्का;लाल साड़ी, दामाद,परी के कपड़े ,मिठाई का टोकरा ….”फिर आना बिटिया दामाद जी के साथ। बेटी बूढ़ी होती है मायका बूढ़ा नहीं होता, कोई न कोई उसके स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए ज़रूर रहता है……!”

   उसे चाचा-चाची के अक्स में माता-पिता का अक्स झांकने लगा।इतना सम्मान पाकर उसका हृदय उल्लसित हो उठा।

 घर की दुलारी सिम्मी सभी से विदा हो हवेली के फाटक को अंकवारी ले मीठी यादों के साथ गाड़ी में आ बैठी….!

सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक रचना–डा उर्मिला सिन्हा

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