दुःख का अथाह सागर – अनीता सिंह तोमर

“अनु!  मेरी कल बहुत जरूरी मीटिंग है मुझे जल्दी जगा देना।”

इतना कहकर अंकुर 9 बजे सोने चला गया। अनुष्का ने किचन समेटा अपने सास-ससुर को दूध दिया। इसके बाद जैसे ही लेटी उसका दो साल का बेटा अथर्व जग गया कुछ देर उसको सुलाने में लग गयी इस तरह से उसको सोने में रात के 1 बज गया।

सुबह उसकी आंख लग गयी वह 6 बजे हड़बड़ाकर उठी और जल्दी से अंकुर को जगाया!!  अंकुर घड़ी पर नज़र पड़ते ही चिल्लाने लगा- “अनु!  तुमने मुझे अच्छा जल्दी जगाया!!  मैं आज लेट हो जाऊंगा मीटिंग के लिये!!  तुम इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हो?? इसीलिये रात में तुमसे कहा था कि सुबह तुम मुझे जल्दी जगा दोगी लेकिन तुम!!  क्या बताऊँ???

“अंकुर!  रात में मैं देर से सोयी इसलिये सुबह आंख नहीं खुली..अलार्म बजने पर भी मैं नहीं जग पायी प्लीज! आप नाराज न हों!! आप जल्दी से फ्रेश होकर आइये मैं सब कर देती हूँ”..अनुष्का अपराध बोध से बोली।

अंकुर बड़बड़ाता हुआ बाथरूम में घुस गया। अनुष्का ने जल्दी से नाश्ता तैयार करके मेज में लगाया और अंकुर के नाश्ता करते-करते उसकी फाइलें बैग में रखीं  उसके कपड़े तैयार कर दिये। अंकुर गुस्से में अनुष्का को देखते हुये तैयार हुआ और अनुष्का से बात किये बगैर बैग लेकर चला गया।

अनुष्का बहुत देर तक रोती रही फिर कमरे से बाहर आकर किचन जा रही थी तो सासू माँ बरस पड़ीं

“क्या हुआ है तुमको!!  कितनी लापरवाह पत्नी हो अंकुर को समय से जगा नहीं पायी वो कितने गुस्से में बाहर निकला है।मैंने भी तीन-तीन बच्चों की परिवरिश की है ऊपर से सास-ससुर की देखभाल और घर के सारे काम भी”..

“अरे बेचारी बहू को क्यों कोस रही हो तुम्हीं कुछ मदद कर दिया करो किचन में” बीरेंद्र जी बोले।

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 “हां अब यही तो बचा है बहू की गुलामी करना वो भी करवा लो” बीना तुनकते हुये बोलीं..

सास-ससुर की नोक-झोंक के बीच अनुष्का चुपचाप किसी अपराधी की तरह सर नीचे झुकाए हुये उनका नाश्ता मेज में रखकर चली गयी। दिनभर उसने कुछ नहीं खाया बस अनमने मन से काम करती रही।

शाम को अंकुर आया तो बहुत खुश था लेकिन अनुष्का का चेहरा गमगीन और आंसुओं से भीगा हुआ था।

कमरे में बैग रखते हुये अंकुर बोला “अनु डिअर! क्या हुआ?सुबह की बात को लेकर नाराज हो क्या”??

अंकुर के इतना कहते ही अनु के अश्कों का ज्वार सारे बांध तोड़कर बाहर आ गया।

मुझे माफ़ कर दो अनु! मैं अपने गुस्से में कंट्रोल नहीं कर पाता अनु को सीने से लगाकर उसके आँसू पोंछते हुये अंकुर बोला..

 “क्या आपके माफ़ी मांगने से मेरे मन के घाव भर जायेंगे अंकुर! जो आपके शब्द बाणों ने मेरे मन की गहराई तक किये हैं। क्या मुझे कोई दर्द नहीं होता?5 साल का साथ है मेरा आपका!! जब देखो तब आप अपनी सारी अपेक्षाओं का बोझ मेरे ऊपर ही डाल देते हैं।मैं आपसे सिर्फ इतना ही पूछना चाहती हूँ क्या सभी अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों से सिर्फ हम औरतों को ही बांधा गया है?? आदमी की कोई जिम्मेदारी नहीं है??क्या एक पत्नी अपने पति से कोई अपेक्षा नहीं कर सकती!! मैं अब इन अपेक्षाओं के बोझ से मुक्त होना चाहती हूँ मैं भी उन्मुक्त हो कुछ पल ही सही अपने लिये जीना चाहती हूँ अनुष्का बोलने के साथ-साथ दुःख के अथाह सागर में डूबती उतराती रही।

 

“आगे से तुम्हारी अपेक्षाओं में खरा उतरने की कोशिश करूँगा अनु!  और कुछ जिम्मेदारियों का बोझ खुद भी उठाऊंगा…अंकुर प्यार से अनु के बालों को सहलाता हुआ बोला।

 

हम नारियों को आजादी जरूर मिली है लेकिन वो नाकाफी है क्योंकि घर-परिवार की सारी अपेक्षाएं सिर्फ हम स्त्रियों से ही होती हैं। स्त्री-पुरूष अगर परिवार के दो पहिये हैं तो सारी अपेक्षाएं केवल स्त्रियों से ही क्यों???

 

         कहानी स्वरचित एवं मौलिक है

 

              लेखिका-अनीता सिंह तोमर

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