मधु, मालती दोनों पक्की सहेली थी। लगता था जैसे इन दोनों के बीच में “और” लगाना ही नहीं है,एक का नाम लो तो दूसरे का नाम अपनेआप मुँह पर आ जाता था। उनका कोई भी काम एक दूसरे के बगैर होता ही नहीं था। जब सहेलियाँ है तो स्कूल कॉलेज तो साथ जाएंगी ही परन्तु ये बाजार भी साथ जाएंगी, घूमने भी साथ जाएंगी।
कितनी पक्की दोस्ती है आप समझ ही गए होंगे। अमूमन बचपन में सबकी एक ऐसी दोस्त होती ही है, परन्तु समय की धूल उसे धुंधला कर देता है और हम सभी उसे भूल कर अपने घर परिवार मे व्यस्त हो जाते है, लेकिन इनकी दोस्ती ऐसी नहीं थी। संयोग कहिये या ईस्वरीय कृपा दोनों की शादी ऐसे लड़को से हो जाती है
जो एक ही कम्पनी में काम करते है और एक ही शहर में रहते है। यानि की शादी के बाद भी दोस्ती का चलना पक्का हो जाता है। दोस्ती चलती भी है। दोनों एक ही जगह किराया के मकान मे रहने लगती है। समयानुकूल दोनों को बच्चे होते है। मधु को बेटा होता है और उसके कुछ दिनों बाद मालती को बेटी होती है।
मालती की बेटी के जन्मोत्सव में मधु के पति हँसते हुए कहते है – भगवान चाहते है कि यह दोस्ती अब रिस्तेदारी में बदल जाए, तभी तो आपको बेटी हुई है। सभी कहते है अच्छा ही है दोस्ती रिटायरमेंट के बाद भी पक्की रहेगी। रिटायरमेंट के बाद दोनों अपने-अपने गृह शहर चले जाते और बुढ़ापा में बच्चो पर आश्रित हो जाते तो
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दोस्ती टूटने का खतरा रहता, लेकिन इससे रिटायरमेंट के बाद भी दोस्ती चलेगी यह पक्का हो जाएगा। इतनी पक्की दोस्ती को एकदिन शायद किसी क़ी नजर लग गई। हुआ कुछ भी नहीं बस बात का बतंगड़ बन गया और दोनों की दोस्ती में दरार पड़ गई। घटना ऐसा घटित हुआ कि मधु की बहन आई थी और मधु को उसके लिए उपहार लेना था।
जाहिर सी बात है कि मधु बाजार जाएगी तो मालती भी उसके साथ जाएगी ही। मधु, मालती और मधु की बहन, तीनों बाजार गईं। खूब खरीदारी की गई, मधु की बहन बेटी जो की मालती की बेटी के हमउम्र थी उसके लिए एक फ्राक लिया गया, मालती ने भी अपनी बेटी के लिए एक फ्राक लिया।
सारा सामान लेकर वे मधु के घर गई। पता नहीं कैसे मालती जब अपने सारे सामान को लेकर अपने घर गई तो उसकी बेटी का फ्राक मधु के घर में ही छूट गया। शायद मधु की बहन की बेटी को फ्राक अच्छा लगा या उसने यह सोचकर कि फ्राक है तो मौसी मेरे लिए ही लाई होंगी क्योंकि मधु को बेटी नहीं थी,
अपने सामान मे रख लिया। मधु की बहन दूसरे दिन अपने घर चली गई। इधर मालती को अपने सामान में जब फ्राक नहीं मिला तो वह मधु के पास जाकर पूछी कि देखो ना फ्राक नहीं मिल रही है तुम्हारे यहाँ है क्या? मालती की बात सुनकर मधु ने कहा कि नहीं यहाँ तो नहीं है। फिर मालती ने कहा “ज़रा अपनी बहन से फोन कर के पूछो ना,
शायद उसके साथ चला गया हो।“ इस पर मधु बोली “यह क्या कह रही हो कैसा लगेगा यह पूछना, मेरी बहन क्या सोचेगी।“ “नहीं ऐसी कोई बात नहीं है मैं तो बस ऐसे ही” सोची मालती ने कहा। इतना सुनते ही मधु ने कहा “क्या सोचा कि मेरी बहन चोर है या उसकी बेटी ने तुम्हारी बेटी का फ्राक चुरा लिया है।
“ “नहीं, ऐसा क्यों कह रही हो, मै तुम्हारी बहन या उसकी बेटी के लिए ऐसा क्यों सोचूंगी?” फिर से मालती ने कहा। परन्तु मधु को बहन को फोन कर पूछने वाली बात का इतना बुरा लग गया कि वह कुछ सुनने को तैयार ही नहीं हो रही थी। थक हार कर मालती अपने घर चली आई और दोनों में बातचीत बंद हो गई।
दो तीन दिन बाद जब मधु की बहन ने अपने पड़ोसी को दिखाने के लिए कि दीदी ने क्या-क्या दिया है, अपने बैग को खोला तो उसमे उसे मालती की बेटी वाला फ्राक दिखाई दिया, वह समझ गई कि यह गलती से मेरे बैग में रखा गया है। वहाँ वे सब इसे ढूंढ रहे होंगे यह सोचकर उसने तुरंत अपनी दीदी को कॉल लगाया
और बताया कि मालती की बेटी का फ्राक उसके पास चला आया है। अब मधु की हालत काटो तो खून नहीं वाली हो गई थी। उसे समझ नहीं आ रहता कि किस मुँह से जाकर मालती को यह बात बताए। लेकिन उसने तुरंत ही यह निर्णय लिया कि चाहे मालती कुछ भी उसे बोले वह तुरंत उसके पास जाकर यह बात बताएगी
तथा टूटते हुए रिश्ते को जोड़ लेगी। यह सोचकर वह मालती के घर गई और बोली “तुम सही कह रही थी वह फ्राक मेरी बहन के साथ चला गया है। मैंने पता नहीं तुम्हे क्या-क्या सुना दिया इसके लिए मुझे माफ कर दो।
“ एक माफी ने टूटते रिश्ते को फिर से जोड़ दिया। मालती मधु को गले लगाते हुए बोली “रिश्ता ऐसे ही टूटेगा भला, अभी तो हमें सहेली से समधन भी बनना है” मातली ने कहा और फिर से दोनों सहेलियों की हँसी से घर गूंजने लगा।
लतिका पल्लवी
वाक्य – एक माफी ने बिगड़ने से पहले रिश्ते सुधार दिए।