दोस्ती की मिसाल – विभा गुप्ता : Moral Stories in Hindi

     ” चाची..मैं कल दोपहर तक पहुँच जाऊँगा..।घर में सब कैसे हैं? चाचा की तबीयत..।” मानव की बात पूरी होने से पहले ही उसकी कुमुद चाची प्रसन्न-स्वर में बोली,” खुद ही आकर देख लेना..दीदी नहीं आ रहीं हैं?”

   ” मानवी की परीक्षा खत्म होते ही मम्मी भी आ जायेंगी।अच्छा चाची प्रणाम!” कहते हुए उसने फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया।

      मानव का दादी घर सहारनपुर में था।उसका जन्म वहीं हुआ था।दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ और पड़ोस के असलम चाचा- सलमा चाची की गोद में ही तो खेलते हुए उसका बचपन बीता था।फिर उसके पिता की दिल्ली में नौकरी लग गई तो वो सपरिवार वहाँ शिफ़्ट हो गये।साल भर बाद वो एक बोडिंग स्कूल में पढ़ने चला गया।

छुट्टियों में घर आता और दोस्तों से मिलते-मिलाते ही उसकी छुट्टियाँ खत्म हो जाती।सहारनपुर जाना हो ही नहीं पाता था।इस बार उसने दसवीं बोर्ड की परीक्षा दी थी।लंबी छुट्टियाँ हुईं तो उसने अपने पापा से सहारनपुर जाने की ज़िद की तब वो बोले,” बेटा..अब पहले जैसा वहाँ कुछ भी नहीं है..तुम बोर जाओगे..।” तब वो तपाक-से बोला,” बोर क्यों पापा..मनीष तो है ही..और फिर आदिल-अरबाज़ भी तो..।” 

    ” हम्म…पर देखो..अपने घर में ही रहना..इधर-उधर मत जाना..।” उसके पिता गंभीर स्वर में बोले।अनुमति  मिलते ही वो खुशी-से उछल पड़ा और बैग में कपड़े रखने लगा।उसकी माँ मिठाई के पैकेट देती हुई बोली,” चाची को दे देना और देख..तेरे पापा ने जो कहा है, उसका ध्यान रखना।” 

   ” ओके माॅम…।” सबसे मिलने की खुशी उसके चेहरे पर झलकने लगी थी।सहारनपुर जाने वाली बस में बैठ कर तो वो अतीत में गोते लगाने लगा था, उसके दादू के मित्र रहमत भाई का परिवार पड़ोस में ही रहते थे।उसके घर के सभी बच्चे उन्हें छोटे दादू कहकर पुकारते थे।जब भी वो बाज़ार जाते तो अपने आदिल-अरबाज़ के साथ-साथ उसके लिये भी चाॅकलेट लाना कभी नहीं भूलते थे।ईद की सेवइयों पर वो टूट पड़ता तो उसकी माँ के हाथ की बनी गुज़िया को आदिल छीनकर खा लेता था।कितने मनभावन थे वो दिन..।अब तो वो सब भी मेरी तरह..।

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    ” सहारनपुर बस स्टैंड..।” कंडक्टर के आवाज़ लगाते ही मानव वर्तमान में लौटा।ऑटोरिक्शा पकड़कर वो घर पहुँचा जहाँ उसकी चाची और उसका चचेरा भाई मनीष उसकी राह ताक रहे थे।चाची के पैर छूकर उसकी गरदन स्वतः ही पास वाले घर की ओर मुड़ गई।लेकिन ये क्या! घर की जगह एक बड़ी दीवार खड़ी देखकर वो चौंक उठा,” चाची..ये क्या!..।” कहते हुए उसने दीवार की तरफ़ इशारा किया।कुमुद ने उसे चुप रहने का इशारा किया और बोली,” घर के भीतर तो चलो.. सब कुछ दरवाज़े पर ही..।”

  ” नहीं चाची..।” कहते हुए वो मनीष को देखकर मुस्कुराया और बैग लेकर अंदर चला गया।लेकिन उसके दिमाग में अभी भी वो ऊँची दीवार घूम रही थी।शाम को जब उसके चाचा आये तो उनसे भी पूछना चाहा, तब भी कुमुद ने न पूछने का इशारा कर दिया।उसकी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी।रात्रि-भोजन के बाद वह बिस्तर पर लेटे-लेटे अपने बचपन को याद कर रहा था कि तभी कुमुद आ गई।

  ” क्या सोच रहे हो मानव..इतने सालों बाद आये हो ना इसीलिये सब…।”

    ” चाची…ये दीवार क्यों है? प्लीज़ बताइये ना…।”अपनी चाची का हाथ पकड़कर वो विनती करने लगा।

   तब कुमुद उसे बताने लगी,” तुम तो जानते ही हो कि लोग बाबूजी और रहमत चाचाजी की दोस्ती की मिसाल देते थे।तुम्हारी बुआ भी राखी पर अशफ़ाक भाई और असलम से गिफ़्ट लेने के लिये खूब झगड़ा करती थी।”

  ” हाँ चाची..सब याद है।ईद पर तो मैं आदिल के हिस्से की सेवइयाँ भी चट कर जाता था।” बचपन के दिन याद करते ही मानव के चेहरे पर प्रसन्नता झलकने लगी थी।

     कुमुद कहने लगी,” तुम लोगों के जाने के बाद यहाँ का माहौल बदलने लगा।छोटी-छोटी बातों पर लोग एक-दूसरे का गला काटने पर उतारु हो जाते थे।दोनों परिवारों की आत्मीयता उनकी आँखों में खटकने लगी थी।वे बाबूजी और रहमत चाचाजी को अलग करने के बहाने ढ़ूँढते रहते थे।इसी बीच असलम की अम्मी चल बसीं।कुछ समय बाद अम्मा जी भी चलीं गईं।

      बाबूजी बीमार रहने लगे थे।तुम्हारे पापा आये हुए थे उन्हें देखने।एक शाम वो दवा लेकर लौट रहे थे कि किसी ने उन्हें स्कूटर से टक्कर मार दी।उनके सिर से खून बहने लगा।एक आदमी ने उन्हें अस्पताल ले जाकर पट्टी करवाई..घर भी छोड़ने आया लेकिन जाते-जाते वो तुम्हारे चाचा के कान में ज़हर उड़ेल गया

कि स्कूटर वाला तुम्हारे असलम का ख़ास यार है..।’ तुम्हारे चाचा ठहरे गरम मिज़ाज…तुरंत भड़क गये।बाबूजी ने बहुत कहा,” महेश..रुक जा..लेकिन वो दौड़ते हुए गये और जाकर असलम भाई का काॅलर पकड़ लिया।फिर तो दोनों ज़बान-हाथ चलाने लगे।बड़ी मुश्किल-से घर वालों ने उन्हें अलग किया।

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अगले ही दिन तुम्हारे चाचा को मालुम हुआ कि कुछ लोगों ने असलम के खिलाफ़ साजिश रची थी।वो माफ़ी माँगने जा ही रहे थे कि अशफ़ाक भाई का एक्सीडेंट हो गया और वो…।घर में मातम छा गया।असलम ने उनकी मौत के लिये तुम्हारे चाचा को कसूरवार मानकर उनपर केस कर दिया।रहमत चाचा ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन उन पर तो जूनून सवार था।उसी रात उसने मज़दूर बुलाकर# नफ़रत की दीवार खड़ी कर दी।रहमत चाचाजी ये सदमा सह न सके।अपने मित्र से बिछड़ने का दुख बाबूजी की मौत का कारण बन गया।”

    ” फिर चाचाजी का..।” 

   ” कुछ दिनों बाद असलम को सच्चाई मालुम हुई कि अशफ़ाक भाई की दुर्घटना एक इत्तेफ़ाक था।उसने केस वापस ले लिया।”

   ” गलतफ़हमी तो दूर हो गई, फिर..।

   ” फिर क्या…गलती तो दोनों से हुई थी..दोनों ही अपने आपे से बाहर हुए थे लेकिन अब पहल कौन करे…।बड़ा मन करता है आदिल-अरबाज़ को देखने का लेकिन…।अब तो बेटा, किसी त्योहार का उत्साह ही नहीं रहा..।इधर होली-दीवाली फ़ीकी और उधर ईद..।” कहते हुए कुमुद की आँखें नम हो गईं।

        मानव समझ गया कि बुझी हुई राख में अभी भी तपिश बाकी है…।बस उसने दोनों परिवारों को फिर से एक करने का ठान लिया।

       एक दिन वो सड़क पार कर रहा था कि सामने आती साइकिल से टकराकर वो मुँह के बल गिर पड़ा।पास ही एक पान की दुकान पर असलम खड़े थे।वो मदद के लिये दौड़कर गये।उन्होंने जब गिरने वाले का चेहरा देखा तो उनके मुँह से निकल पड़ा,” मानव…।” उन्होंने तुरंत एंबुलेंस बुलाई और उसे लेकर हाॅस्पीटल पहुँच गये।

       डाॅक्टर मानव की मरहम-पट्टी करने लगे, तब तक असलम ने अनजान बनकर उसके घर फ़ोन कर दिया।महेश हाॅस्पीटल पहुँचे..उसे सही-सलामत देखकर उन्हें तसल्ली हुई।पास खड़ी नर्स को वो थैंक यू कहने लगे तब नर्स बोली,” मुझे नहीं, आप इन्हें कहिये..।” तभी दवाई लेकर असलम आये तो उसे देखकर महेश चकित रह गये।बरसों बाद दोनों मित्रों का आमना-सामना हुआ था।जुबान खामोश थी लेकिन आँखें सब कुछ कह रही थी।महेश ने असलम को रुपये देने चाहे तो वो बोले,” मानव मेरा भी भतीजा है।” कहते हुए उसकी आँखें नम हो आईं थीं।

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      महेश मानव को लेकर घर आ गये।उनका मन बेचैन था।चाहते थे कि असलम के घर जाकर उसे थैंक यू बोलूँ और पिछले व्यवहार की माफ़ी माँग लूँ लेकिन फिर सोचने लगे कि अगर उसने मेरी बेइज्ज़ती कर दी तो..।इसी ऊहापोह में वो बाहर निकल ही रहे थे कि दरवाज़े पर असलम खड़े मिल गये।

   ” वो मैं…मानव…।” दोनों एक साथ बोल पड़े और हँसते हुए एक-दूसरे के गले लग गये।दोनों की आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे।उसी समय दोनों घरों की बीच बनी#नफ़रत की दीवार भी गिर गई।फिर से दोनों घरों में बच्चों की खिलखिलाहट गूँजने लगी।

     दो दिन बाद मानव के माता-पिता भी मानवी को लेकर आ गये।दोनों परिवारों को एक होते देख मानव की माँ ने कुमुद से पूछा,” ये सब कैसे?” कुमुद मानव की तरफ़ देखकर मुस्कुराई तो वो सब समझ गई और मानव से बोली,” शाबास बेटा! लेकिन अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो…।” अपनी माँ के गले में बाँहें डालते हुए मानव बोला,” मेरी अच्छी माँ..आप ही तो कहतीं हैं कि नेक काम में भगवान हमेशा साथ देते हैं तो बस…।”

     समय बीतता गया..बच्चे सयाने हो गये।कुमुद ने दुनिया को अलविदा कह दिया।असलम भी अल्लाह को प्यारे हो गये लेकिन दोनों परिवारों के बीच आज भी वही प्यार व मोहब्बत है जैसी उनके दादाजी के वक्त थी।समाज के लिये दोनों परिवार दोस्ती की मिसाल बन गये थे।

                                         विभा गुप्ता 

# नफ़रत की दीवार            स्वरचित, बैंगलुरु 

            कभी-कभी एक गलतफ़हमी गहरी मित्रता के बीच नफ़रत की दीवार खड़ी कर देती है लेकिन समय रहते वो दीवार गिर जाती है और फिर से वो मित्रता एक मिसाल बन जाती है।

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