रसोई यानि कि वह जगह जहां एक स्त्री, अपने परिवार के लिए भोजन बनाती है,और नई नई ब्याही तो अपनी पाक कला आजमा कर ( या फिर उसका भरपूर प्रदर्शन कर) अपने पति के मन को प्रसन्न करने का उपाय ही ढूंढती रहती थी।
हां भाई, हमारे समय की बात है ना, फिर कहते हैं ना कि पुरुष के दिल का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है। यानि कि आपने ( अच्छा-अच्छा बना कर)खिला पिला कर उसका पेट भर दिया तो,पेट तृप्त होने के साथ-साथ उसकी आत्मा और फिर दिल के भी संतुष्ट, हो जाने में ज्यादा देर नहीं लगती!
और एक पत्नी ( औरत) के दिल का रास्ता?…. जिसमें पहुंचने के लिए पहले मन का रिश्ता बनता है….
उस तक पहुंचने का क्या कोई रास्ता होता भी है?
कोई कैसे पहुंच सकता है वहां तक? कोई वहां तक पहुंचना चाहता भी है या … नहीं…
और जेवर ,कपड़ों और बड़े बड़े महलों में रहने वालियों का भी जो कोना अछूता….. रिक्त ही रह जाता है
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बातें सिर्फ उन्हीं दिनों की नहीं मायने रखती, जिनके साथ आपकी मधुर यादें जुड़ी हों, वरन् उन दिनों की भी बहुत या कहीं ज्यादा मायने रखती हैं जब ईश्वर ने आपकी परीक्षा ली हो, अथवा आपके परीक्षा का समय चल रहा हो।
ऐसा ही ( कुछ खराब) समय मेरी जिंदगी में भी आया था। मेरी तबियत कतिपय कारणों से बिगड़नी शुरू हुई… फिर कुछ और समय बाद और बिगड़ती गई…. धीरे धीरे मेरे दाहिने हाथ का मूवमेंट भी कम होता जा रहा था।
मेरी बिटिया हास्टल में रह कर पढ़ाई कर रही थी और मैं और मेरे पतिदेव ही घर पर थे।
पतिदेव सुबह नौ बजे खा पीकर आफिस के लिए तैयार हो जातें हैं और कभी बाहर जाने पर, बिल्कुल सुबह निकलते, मैं जल्दी ही उठकर टिफिन वगैरह तैयार करके रख देती….. परंतु अब तो?…. फिर डॉ साहब ने भी कहा कि अब दाएं हाथ से कोई काम नहीं करना है, क्योंकि तकलीफ बढ़ती जा रही थी।
घर का काम अब बहुत कुछ पतिदेव के ऊपर आ रहा था।
मगर ये बहुत धैर्य से घर आफिस और मेरे इलाज़ में जुटे थे।
हम लोग अपने घर से बहुत दूर ही हमेशा रहे,इनकी सर्विस, पोस्टिंग के कारण।
पतिदेव ने बोला,” हम अभी किसी को नहीं बताएंगे, क्योंकि परिवार के सभी लोग तुम्हारी बीमारी की खबर सुनकर आ जाएंगे, मैं अपने आफिस के साथ सिर्फ तुम्हारी देखभाल कर सकता हूं,इतने सारे लोगों को नहीं संभाल सकता।
मैं हास्पिटल में एडमिट थी,छोटे से आपरेशन के लिए।
मैंने भी सहमति में सिर हिला दिया।
मैं तो असमर्थ हो गई थी कुछ करने में।
वो इनके जन्म दिवस का दिन था।
बिटिया ने हास्टल से चहकते हुए फोन किया और पूछा पापा, मम्मी आप लोग क्या ख़ास कर रहे हैं, मम्मी ने तो ढेर सारी अच्छी-अच्छी चीजें बनाई होगी पापा के जन्मदिन पर!
उधर मुझे आपरेशन के लिए ले जाने की तैयारी हो रही थी।
दरअसल हमारी बिटिया की परीक्षाएं चल रही थी और उन्हें पूरा होने में चार दिन ही शेष बचा था, अतः हम दोनों ने तय किया था कि उसके इक्जाम के बाद ही उसे कुछ बताएंगे।
वरना वो घबरा कर घर आ जाएगी, मैंने कहा कि वो डाक्टर तो नहीं है ना ,जो आकर मेरा इलाज शुरू कर देगी, इसलिए एक्जाम के बाद ही बताएंगे।
हां, तो मैंने उसे फ़ोन पर ज़वाब दिया” हम कुछ खास नहीं कर रहे हैं बेटा, तुम्हारे घर आने पर ही पार्टी करेंगे… तुम्हारे बिना तो कुछ अच्छा नहीं लगेगा…”
फोन काट कर ये अपनी आंखों से आंसू पोंछ रहे थे। शायद बिटिया से झूठ बोलने का दुख हो रहा था।
मेरा आपरेशन हो गया। तीसरे दिन बिटिया ने कहा कि एक्जाम खत्म होने पर वो अपने फ्रेंड्स के साथ कहीं घूमने जाना चाहती है… तो मेरे मुंह से अचानक निकल गया कि,” नहीं तुम कहीं नहीं जाना, तुम्हारे एक्जाम के बाद पापा तुम्हें लेने आ रहे हैं”
क्यों क्या हुआ मम्मी? उसने घबराकर पूछा, मैंने कहा कुछ नहीं बस घर आ जाओ।
अभी मैं हास्पिटल में ही थी।
मेरी बेटी हास्पिटल आ कर नाराज़ हुई कि मुझे क्यों नहीं बताया, फिर समझाने पर समझ गई कि ऐसा उसकी पढ़ाई के लिए ही ऐसा किया गया।
अब मेरी बेटी और मेरे पतिदेव दोनों ने मिलकर सब संभाल लिया था।
एक दिन मेरे पतिदेव ने मुझसे कहा
” अगर तुम्हारा हाथ कभी नहीं उठेगा तब भी मैं जिंदगी भर मैं तुम्हें खाना बना कर खिला सकता हूं, बेटी तो वापस हास्टल चली जाएगी, मैं खुशी खुशी दो लोगों का खाना बना कर आफिस चला जाया करूंगा, इतनी जिंदगी तुमने मुझे बना कर खिलाया है,अब मेरी बारी है।
मैं आंखों में आंसू भरे बस अवाक इनकी ओर देख रही थी
आप समझ सकते हैं ये शब्द……, ये भरोसा कितना बड़ा था।
मेरी काफी देखभाल करके बिटिया भी अपने हास्टल गई। पतिदेव खाना बना कर, ख़ाना, दवाएं, पानी,फल… सभी कुछ मेरे पास एक टेबल पर रख कर आफिस जाते थे, जिससे मुझे कोई असुविधा ना हो।
शाम को आफिस से आकर किचन में जाकर फिर काम करते थे, इन्हें किसी नौकर के हाथ का खाना नहीं पसंद है, अतः,सब कुछ खुद किया, मुझे गर्मागर्म, पतली पतली रोटियां सेंक कर खिलाते थे…… और क्या क्या बताऊं, बहुत कुछ कहने को हैं…. आज इस चैलेंज में लिखते समय सब कुछ याद आ रहा है,… या फिर कहूं कि ये सब कभी भूली ही नहीं तो ज्यादा उचित होगा।
अरे भाई,भूली नहीं, तभी तो आप सबके साथ अपनी यादें साझा कर रही हूं!
मैं भगवान से नित्य प्रार्थना करती थी कि मुझे वापस अपनी गृहस्थी संभालने में सक्षम कर दें।
सभी देखने वालों को लगता था कि शायद…….
मैं समय के साथ स्वस्थ होती गई।
बहुत सी पत्नियां बताती हैं कि कैसे विषम परिस्थितियों में उन्होंने अपने पति की सेवा करके, अपने पति को वापस अपने हाथ, पैरों से पुनः सक्षम किया।
ये कहानी है,एक पति के …….
अरे वो ही एक पति के ,अपनी पत्नी के मन ….( थोड़ा और अंदर दिल तक पहुंचने की!!
अब मौका मिला तो हमने सुना दिया, अपने विचार भी हमें अपने लाइक कमेंट के माध्यम से बताएं
पूर्णिमा सोनी
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कहानी प्रतियोगिता # मन का रिश्ता, शीर्षक — दिल का रिश्ता जरा पुराना है…….