“मां, आज पेरेंट्स टीचर मीटिंग है”
“हां, मुझे याद है, चलूंगी, वैसे भी तेरी शिकायतें सुनने से ज्यादा कुछ नहीं होता वहां…तुझे कितना भी समझा लो कि शैतानी मत किया कर, पढ़ाई में मन लगा लेकिन तुझे समझ ही नहीं आता…तैयार हो जाना 9 बजे तक…”
वरुण और उसकी मां माधवी जैसे ही विद्यालय में अध्यापिका के पास पहुंचते हैं तब
“वेरी गुड वरुण…”
“थैंक यू मैम”
“लगता है आजकल आप वरुण पर बहुत अधिक ध्यान दे रहीं हैं मिसेज अग्रवाल…अब यह अधिक शैतानी भी नहीं करता और इस बार इसके मार्क्स भी बहुत अच्छे आए हैं….आगे भी इसी तरह ध्यान दीजियेगा….ये लीजिए इसकी मार्कशीट….” अध्यापिका ने कहकर जैसे ही वरुण की मार्कशीट वरुण की मां माधवी को दी वह मुस्कुरा दीं और आश्चर्यचकित रह गईं कि जिस वरुण की हर बार सिर्फ शि
कायतें सुनने को मिलती थीं इस बार उसकी इतनी तारीफ और इतने अच्छे मार्क्स।
जैसे ही वो दोनों स्कूल से घर आए तब माधवी ने ध्यान दिया कि वरुण तुरंत मार्कशीट लेकर दादा जी दादी जी कहते हुए मां बाबूजी के कमरे में भागा।
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उसे ध्यान आया कि 4 महीने पहले जब मांजी की तबियत खराब हो गई थी तब अनूप उनका इलाज करवाने के लिए गांव से शहर ले आए थे, तबियत तो मांजी की 1 महीने में ठीक हो गई थी लेकिन यह तय हुआ था कि मां बाबूजी इस बार सर्दियों में यहीं रहेंगे जिससे उन्हें ठीक से आराम मिल सके क्योंकि गांव में ज्यादा सुविधाएं भी नहीं थीं और दूर होने की वजह से बार बार गांव से आना जाना भी मुश्किल था….हालांकि बिना मन के ही सही किंतु उसने अनूप के इस फैसले पर सहमति तो जता दी थी किंतु खुद उनसे दूरी बनाए रखती…
शायद ही अब तक 2–3 बार वह मां बाबूजी का हालचाल लेने उनके कमरे में गई हो वरना तो व्यस्तता का बहाना बनाकर कामवाली के भरोसे ही उनको छोड़ रखा था वो बात अलग है कि वरुण और अनूप उनके पास ज्यादातर चले जाते थे और वह ये सोचकर कुछ नहीं कहती थी कि कुछ ही महीनों की तो बात है फिर तो वे दोनों गांव चले ही जाएंगे…..उसने कभी इस बात की परवाह नहीं की कि मां बाबूजी को कितना बुरा लगता होगा कि उनकी बहू न तो कभी गांव आती है और न ही यहां बोलती है…
.वह भी तो अभी तक इतने सालों में 2–3 बार ही गांव गई है वो भी तब जब जाना बहुत ही जरूरी हो और इससे पहले जब कभी मां बाबूजी यहां आए तब वह कितना बुरा व्यवहार करती थी कि 4–5 दिनों में ही चले जाते थे लेकिन इस बार शायद वह अपनी मजबूरी की वजह से रुक गए थे या फिर अनूप ने उन्हें किसी तरह समझाकर रोक लिया था और फिर इस बार वरुण की वजह से भी उनका मन लग गया होगा जिससे वह इतने महीने रुक गए थे…
उसने और अधिक ज्यादा अपने दिमाग पर जोर डालना उचित नहीं समझा क्योंकि उसे भी देर हो रही थी और वह अपने ऑफिस निकल गई लेकिन आज उसका मन ऑफिस में नहीं लगा…उसकी नजर बार बार घड़ी की तरफ जा रही थी उसे लग रहा था जैसे आज घड़ी की सुइयां कुछ धीरे चल रही हैं….खैर जैसे तैसे उसने 5 बजे तक काम किया और अगले दिन की छुट्टी लेकर ऑफिस से निकल गई।
घर पहुंचकर उसने देखा कि अनूप और वरुण मां बाबूजी के कमरे में ही हैं और कामवाली ने खाने की सारी तैयारी करके रखी है।
“कमला आज रोटियां में बना लुंगी वैसे भी तुझे देर हो गई है आज इसलिए तू अब घर चली जा और हां कल से सुबह का नाश्ता भी मैं बना दिया करूंगी केवल तू किचिन साफ करके सुबह का खाना बना दिया कर और शाम के खाने की तैयारी कर दिया कर बस…”
“जी ” कहकर कमला अपने घर चली गई।
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माधवी मां बाबूजी के कमरे में प्रवेश करते हुए और उनकी तरफ दो बैग बढ़ाते हुए, ” मां जी ये लीजिए ये आपकी साड़ी और ये बाबू जी आपके लिए…”
मां शारदा देवी ने जैसे ही उसके हाथ से बैग लिए माधवी ने उन दोनों के चरण स्पर्श करते हुए कहा, ” चलिए आप सब डायनिंग टेबल पर बैठिए, मैं गरम रोटियां सेक देती हूं ..आप सभी वहीं एक साथ बैठकर खाना खा लीजिए…”
मां बाबू जी दोनों के साथ अनूप और वरुण भी उसके इस बदले हुए व्यवहार को देखकर आश्चर्यचकित थे।
दूसरे दिन माधवी ने देखा सुबह सुबह मांजी स्नान कर पूजा पाठ कर रही है और वरुण अपने दादाजी से उनके कमरे में पढ़ रहा है। दोपहर में भी वह मोबाइल, कंप्यूटर आदि से दूर ज्यादातर समय उन्हीं के साथ व्यतीत करता है, सांय 4 बजे जब बाबूजी रामायण का पाठ करते हैं तो मां जी और बाबू जी उनके पास बैठते हैं और वह भी बड़े ध्यान से सुनता है और फिर अपनी पढ़ाई करता है, रात को दादा दादी से प्रेरणादायक कहानी सुनता है।
आज माधवी ने मां बाबूजी के आने के बाद उसकी दिनचर्या को ध्यान से देखा था क्योंकि मान बाबूजी के यहां आने के बाद या तो वह अपने ऑफिस में व्यस्त रहती या फिर छुट्टी में भी मां बाबूजी की वजह से किसी न किसी बहाने बाहर सहेलियों आदि के साथ पार्टी आदि में समय व्यतीत करती क्योंकि उसे मां बाबू जी के साथ पसंद ही नहीं था….मां बाबूजी के आने से पहले वरुण देर तक सोता और उसे जबरदस्ती जगाकर स्कूल भेजना पड़ता था, दोपहर में स्कूल से आने के बाद वह कंप्यूटर और मोबाइल पर गेम खेलता या दोस्तों के साथ घूमने चला जाता बहुत पीछे पड़ने पर वह पढ़ने बैठता था….
आज माधवी को घर के बड़े बुजुर्गों की अहमियत समझ आ रही थी और उसने महसूस किया कि उनकी सेवा करने से मन को कितनी शांति मिलती है…आज उसे उनका साथ अच्छा लग रहा था।
ऐसे ही कुछ दिन व्यतीत हो गए तब मांजी ने कहा, “अनूप बेटा अब तो सर्दियां भी निकल गईं और मेरी तबियत भी ठीक है…कल हमें गांव छोड़ आ।”
इतना सुन अनूप के बोलने से पहले ही माधवी बोली, ” मांजी, मैं जानती हूं कि मैंने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया लेकिन मां जी अब मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया तो मैं प्रायश्चित करना चाहती हूं…. प्लीज आप कुछ दिन और रुक जाइए, फिर चली जाना…।”
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“बेटा हमें तुमसे कोई शिकायत नहीं है, और हमें खुशी है कि तुम्हें अपनी गलतियों का अहसास हो गया है, अभी हमें जाने दो बाद में फिर कभी हम दुबारा आ जाएंगे और यदि तुम लोगों को छुट्टी मिलें तो तुम आ जाना गांव प्राकृतिक वातावरण में घूमने….”
“बिल्कुल, इस बार हम कहीं और न घूम कर गांव में छुट्टियां बिताने आयेंगे।” माधवी ने खुश होते हुए कहा।
दूसरे दिन उसके मां बाबूजी जब गांव चले गए तो इस बार वह बहुत उदास हो गई लेकिन इस बार उसकी दिनचर्या बिल्कुल बदल गई , वह प्रतिदिन जल्दी उठ भगवान की पूजा कर स्वयं नाश्ता बनाकर वरुण और अनूप को करवाती उसके बाद ऑफिस जाती, ऑफिस का कार्य ऑफिस में ही खत्म करने का प्रयास करती और घर पर वरुण और अनूप के संग समय व्यतीत करती, छुट्टियों में भी फिजूल की पार्टियों में ध्यान न देकर अपने परिवार के बीच रहकर ही अब उसे सुकून मिलता था।
अब वरुण भी मम्मी मम्मी कह उसके आगे पीछे घूमता और उससे हर बात शेयर करता, बिना कहे अपना होमवर्क पूरा कर लेता था।
इसी प्रकार कुछ महीने बीत गए कि अचानक गांव से फोन आया कि मां जी अब इस दुनिया में नहीं रहीं…इतना सुनकर माधवी की आंखों के आगे अंधेरा छा गया, उसने बड़ी मुश्किल से अपने को संभाला और तुरंत ही गांव निकलने की तैयारी कर अब गांव के लिए निकल पड़े।
रास्ते भर माधवी के आगे मां बाबूजी का चेहरा और अपना व्यवहार घूमता रहा वह सोचने लगी सच ही तो है बड़े बुजुर्ग ढलती सांझ के समान होते हैं इनकी शीतल छांव में जितनी देर बैठ कर जितना अनुभव प्राप्त कर सको कर लेना चाहिए वरना आगे तो काली रात की तरह जीवन में अंधकार ही अंधकार है।
प्रतिभा भारद्वाज ‘प्रभा’
मथुरा (उत्तर प्रदेश)