धड़ाम! – श्वेता अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

दोपहर का काम खत्म करके रमा अपनी जेठानियों के साथ गप्पें मार रही थी। सासू माॅं मालादेवी भी अपने कमरे में आराम कर रही थी। तभी किचन से खूब जोर की धड़ाम! की आवाज आई।आवाज़ सुन मालादेवी और उनकी बहुऍं किचन की ओर दौड़ पड़ी।

वहाँ रमा के ससुर जी(बाबूजी) मुँह में लड्डू ठूँसे दोनों हाथों से दराज पकड़े ऊपर लटके हुए थे। जिस स्टूल पर चढ़कर वे ऊपर दराज से लड्डू निकल रहे थे वो नीचे गिरी पड़ी थी और बाबूजी के ‘लड्डू चोरी’ कारनामे की पूरी चुगली कर रही थी। ये देखकर रमा हँसते-हँसते लोटपोट हो गयी। उसने तुरंत बाबूजी को नीचे उतारा, उनके हाथों में दवाई लगाई।

वहीं दूसरी ओर मालादेवी गुस्से में आग-बबूला हो रही थी, “एकदिन मीठे बिना नहीं रह सकते। आग लगे इस जीभ को।शुगर बढ़ी जा रही है लेकिन मीठा तो खाना है। अभी गिर-पड़ जाते तो! मुझे क्या जो करना है वह करो।”मालादेवी गुस्से में भुनभुना रही थी और बाबूजी छोटे बच्चे की तरह सिर झुकाये बैठे थे, “बस एक लड्डू ही तो खाया है|”

“अब झूठ तो ना बोलो हमसे, पूरा मुँह तो लड्डुओं से ठूँस रखा था।” मालादेवी ने नाराज होते हुए कहा।

एकतरफ जहाँ छोटी बहु रमा दोनों की प्यार भरी नोक-झोंक देखकर मुस्कुरा रही थी, वहीं दोनों बड़ी बहुएँ चिड़चिड़ा रही थी, “लो फिर दोनों की बकझक शुरू हो गयी। एक दिन भी ना खुद शांति से रहते हैं ना हमें रहने देते हैं।”

उनकी चिड़चिड़ाहट को नज़रअंदाज करते हुए रमा माँ-बाबूजी के पास जाकर प्यार से बोलती है “माँ, अब बाबूजी को माफ़ भी कर दो ना।कोई इतनी बड़ी भी गलती नहीं की है बाबूजी ने।”

फिर बाबूजी से बोली “बाबूजी, मैं आपके लिए शुगर फ्री के लड्डू बना के लायी हूँ, जी भर के खाइए।”

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ये सुनकर बाबूजी खुश होकर लड्डू खाने लगे और मालादेवी मुस्कुराते हुए चली जाती है।

कुछ देर बाद मालादेवी ने बहुओं को आवाज़ लगाई “मैं बाजार जा रही हूँ सब्ज़ियाँ लाने।तुम सबको कुछ मंगवाना है तो बता दो।”

ये सुनते ही बाबूजी ने बाहर आकर थैला छीनते हुए कहा “कोई जरूरत नहीं है, सड़ी-गली सब्ज़ियाँ उठा लाओगी| मैं ले आऊँगा।”

“हाँ-हाँ खुद तो खेत से ताज़ी-ताज़ी तोड़कर लाओगे ना?” मालादेवी ने झुंझलाते हुए कहा।

“नहीं मैं जाऊँगा” बाबूजी ने उन्हें रोकते हुए कहा।

“माँ-बाबूजी आप दोनों आराम से बैठकर अदरक वाली चाय का मज़ा लीजिए, सब्जियाँ अखिल (रमा का पति) ले आएँगे,ऑफिस से आते हुए।” रमा ने चाय का कप दोनों के हाथ में देते हुए कहा।

छोटी बहु, आज खाने में लौकी के कोफ्ते बना लेना। बहुत दिनों से नहीं खाए।”

“जी बाबूजी” रमा ने कहा।

“क्या जी बाबूजी? जब देखो तला-भुना, अभी कल ही तो समोसे खाये थे। कोफ्ते नहीं लौकी की सादी सब्जी बनेगी” मालादेवी ने कहा।

“नहीं, यदि कोफ्ते नहीं बने तो मैं खाना नहीं खाऊँगा” बाबूजी ने रूठते हुए कहा।

“हाँ, तो मत खाना। पेट को भी थोड़ा आराम मिलेगा” मालादेवी गुस्से में बोली।

“अरे! अरे! माँ, बाबूजी आप दोनों शांत हो जाइए। कोफ्ते ही बनेंगे लेकिन तले हुए नहीं बेक किए  हुए। ठीक है ना बाबूजी?” रमा ने हँसते हुए कहा।

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“हाँ-हाँ ठीक है, मुझे मंजूर है” बाबूजी ने खुश होते हुए कहा।

“ये क्या रमा, खाना तो बन चुका है फिर तुमने बाबूजी को मना क्यों नहीं किया?” बड़ी भाभी ने पूछा।

“भाभी, बाबूजी का बहुत मन हो रहा था कोफ्ते खाने का। मैं बना दूँगी” रमा ने कहा।

“हाँ, तुम ही बनाओ हमसे तो ना होगा इतना झमेला” ये कहते हुए मंझली औऱ बड़ी भाभी किचन से निकल गई। रमा ने कुछ नहीं कहा चुपचाप कोफ्ते बनाने लगी।

थोड़ी ही देर में उसके कानों में बाबूजी की आवाज पड़ी।

“मैंने कहा ना, नहीं जाना शन्नो भाभी के यहाँ। पहले कैरम का मैच खत्म करो”।

जब रमा ने बाहर आकर पूछा तो पता चला कि माँ शन्नो ताई के यहाँ जाना चाहती हैं लेकिन बाबूजी नहीं जाने दे रहे।

“वहाँ जाकर क्या करोगी? अपनी-अपनी बहुओं की बुराई करोगी। इससे तो अच्छा यहाँ मेरे साथ कैरम खेल लो।” बाबूजी ने छेड़ते हुए कहा।

ये सुनकर मालादेवी रोने लगी “देख रही है रमा, क्या मैं बाहर जाकर तुम सबकी बुराई करती हूँ? वो तो शन्नो की कुछ दिन से तबीयत ठीक नहीं है, इसीलिए मिलने का मन कर गया।”

मालादेवी को रोता हुआ देखकर बाबूजी उन्हें मनाने लगे।

“अरे! मैं तो मजाक कर रहा था, जा तू चली जा।”

“नहीं मुझे नहीं जाना” मालादेवी ने रूठते हुए कहा।

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“माँ अब चले भी जाइए ना बाबूजी आपको छेड़ रहे थे और रहा कैरम का मैच तो बाबूजी आप मुझे हरा कर दिखाए तो मैं जानूँ।” कैरम की गोटियाँ सजाते हुए रमा ने कहा।

कैरम खेलने के बाद बाबूजी न्यूज़ सुनने लगे और रमा कमरे में आराम करने चली गई। तभी दोनों भाभियाँ कमरे में आई।

“हमसब एक हफ़्ते के लिए कुल्लू मनाली का प्रोग्राम बना रहे हैं। तुम भी चलोगी ना?” बड़ी भाभी ने पूछा।

“सभी चल रहे हैं तो मैं भी जरूर चलूँगी भाभी” रमा ने कहा।

“ठीक है तो फिर मैं तुम्हारे भैया को तीन रूम बुक करने के लिए बोल देती हूँ” मँझली भाभी ने फोन मिलाते हुए कहा।

“एक मिनट भाभी, तीन क्यों? चार रूम बुक होंगे ना, तीन हमारे लिए औऱ एक माँ-बाबूजी के लिए!” रमा ने चौंकते हुए कहा।

“ना बाबा ना, उनकी रोज-रोज की आपसी चिकचिक औऱ बकझक से बचने के लिए ही तो बाहर घूमने का प्रोग्राम बनाया है। अगर उन्हें साथ ले गए तो वहाँ भी दोनों यहाँ की तरह आपस में लड़ते-झगड़ते ही रहेंगे और सबका मज़ा किरकिरा कर देंगे जैसे पिछली बार गंगटोक में किया था। मैंने मीना दीदी से बात कर ली है वो एक हफ्ते के लिए माँ-बाबूजी के पास आ जायेगी। परसों निकलना है पैकिंग कर लेना” बड़ी भाभी ने कहा।

“नहीं भाभी, आप सब घूम आइए। मैं औऱ अखिल फिर कभी चले जायेंगे। मैं यहाँ माँ-बाबूजी के साथ ही रुकूँगी” रमा ने दृढ़ता से कहा।

“जैसी तुम्हारी मर्जी, हम तो इनकी रोज-रोज की चिकचिक से पक गए हैं। तुम कैसे बर्दाश्त करती हो तुम ही जानो!” मँझली भाभी ने व्यंग्य करते हुए कहा।

“भाभी सिर्फ नज़रिये का फर्क है। जो आप सबके लिए झगड़ा है वह मेरी नज़र में माँ-बाबूजी की प्यार भरी नोंक-झोंक है, एक-दूसरे के लिए परवाह है। माँ बाबूजी को खाने के लिए इसीलिए टोकती है क्योंकि उन्हें उनकी सेहत की चिंता है। बाबूजी शुगर मरीज हैं उनके लिए ज्यादा मीठा औऱ तला-भुना खाना सही नहीं है। वहीं दूसरी ओर बाबूजी माँ को ज्यादा बाजार-हाट नहीं जाने देते क्योंकि माँ के घुटनों के दर्द की चिंता सताती है उन्हें। अब दोनों अपनी जिंदगी के आखिरी मुकाम पर है। जीवन की इस ढलती साॅंझ में यह मीठी नोंक-झोंक, एकदूसरे की यह परवाह ही उन दोनों के जीने की, मुस्कुराने की वजह है। याद है

जब पिछले महीने माँ को टायफॉइड के चलते दो दिन हॉस्पिटल में रहना पड़ा था, बाबूजी कितने गुमसुम और उदास हो गए थे बिल्कुल चुपचाप। मीठे को तो उन्होंने छुआ भी नहीं था जबकि उन्हें टोकने के लिए आसपास माँ थीं भी नहीं। मेरी समझ में तो भाभी जितना हो सके हमें माॅं-बाबूजी की सेवा करनी चाहिए, उनका ध्यान रखना चाहिए क्योंकि यह ढलती साॅंझ तो हम सबके ही जीवन में आनी है। और, हाॅं रही घूमने जाने की बात तो आप और बड़ी भाभी आराम से निश्चिंत होकर जाइए। मैं यहाॅं माॅं-बाबूजी के साथ घर पर ही रहूॅंगी। रमा ने मुस्कुराते हुए कहा।

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“नहीं, रमा कोई घर पर नहीं रुकेगा। हम सभी साथ में घूमने जाऍंगे और माॅं-बाबूजी की मीठी नोंक-झोंक का मजा लेंगे। उनका ध्यान रखेंगे। क्यों ठीक है ना मंझली?” बड़ी भाभी बोली।

“जी, बड़ी भाभी।” मंझली ने मुस्कुराते हुए हामी भरी।

तभी बाहर से मालादेवी की आवाज़ आई “अरे! रमा, देख ले अपने बाबूजी को छिप-छिपकर नत्थूमल हलवाई की कचौड़ियाँ खा रहे हैं। फिर तू कहेगी कि मैं तेरे बाबूजी पर बेकार ही गुस्सा करती हूँ।”

“हाँ माँ, आ रही हूँ” कहती हुए रमा हँसते हुए रूम से बाहर आ गई दोनों की नोंक-झोंक सुलटाने, लेकिन इस बार अकेले नही दोनों भाभियों के साथ।

धन्यवाद।

साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता-#ढलती साॅंझ

शीर्षक-धड़ाम!

लेखिका-श्वेता अग्रवाल

धनबाद, झारखंड।

#ढलती साॅंझ

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