दादाजी का नाटक – इंदु निगम : Moral Stories in Hindi

ग्राम सहारा में रहने वाले दीनदयाल चौधरी, जिन्हें सभी प्रेम से  दादाजी; कहते थे, गाँव के सबसे

बुजुर्ग व्यक्ति थे। उनकी उम्र अस्सी के करीब थी, लेकिन वे आज भी चुस्त-दुरुस्त और हँसमुख

स्वभाव के व्यक्ति थे। उन्होंने जीवनभर खेती-बाड़ी की, अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए, और

समाज सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहे।

उनके दो बेटे, राकेश और सुभाष, शहर में काम करते थे और अपने-अपने परिवारों के साथ वहीं

बस गए थे। दोनों ही बेटे अच्छे थे, मगर अपनी व्यस्तता के कारण गाँव आने का समय नहीं

निकाल पाते थे। दादाजी का परिवार अब केवल उनके साथ रह रही एक पुरानी नौकरानी और

कुछ पड़ोसियों तक ही सीमित हो गया था।

शुरू में दादाजी को अपने अकेलेपन का खास एहसास नहीं होता था, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी,

उन्होंने महसूस किया कि घर में सन्नाटा बढ़ने लगा है। बेटे कभी-कभार फोन कर लेते, लेकिन

उनके पास अपने बूढ़े पिता के लिए समय नहीं था। दादाजी को यह खलने लगा था कि अब

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उनके जीवन में जो कुछ बचा है, वह सिर्फ इंतजार है—उनके बेटों के लौटने का, उनके घर की

रौनकें फिर से खिलने का।

एक दिन, दादाजी ने गाँव के कुछ बुजुर्गों से यह बात साझा की। उनमें से एक ने हँसते हुए

मजाक किया, ;दादाजी, कभी-कभी इन बच्चों को अपने पास बुलाने के लिए थोड़ी बीमारी का

बहाना करना पड़ता है। तब ही वो सेवा के लिए आ पाएंगे।

यह बात सुनकर दादाजी थोड़ा अचरज में पड़ गए, लेकिन फिर उनके मन में विचार आया कि

शायद यह सचमुच सही तरीका हो सकता है। अगले ही दिन, उन्होंने अपने बड़े बेटे राकेश को

फोन किया और धीमी आवाज में कहा, ;बेटा, कुछ दिनों से मेरी तबीयत बहुत खराब है। लगता

है, अब शरीर का साथ नहीं चल पाएगा। तुम लोग मुझे देखने आओ, तो मन को शांति मिलेगी।

राकेश यह सुनकर थोड़ी देर चुप रहा, लेकिन उसके बाद उसने व्यस्तता का बहाना बनाते हुए

कहा, "पिताजी, आप चिंता मत कीजिए। मैं अगले महीने तक आकर आपसे मिलूँगा। अभी काम

का बहुत दबाव है।

दादाजी ने धीरे से फोन रख दिया। उन्होंने सोचा, अब यह बच्चों को आकर सेवा का भाव जगाने

के लिए कुछ और उपाय करना पड़ेगा।; इस बार उन्होंने कुछ ज्यादा गंभीरता से योजना बनाई

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और अपने छोटे बेटे सुभाष को भी उसी तरह से फोन कर बीमार होने का संदेश भेजा। लेकिन

सुभाष ने भी काम के बहाने से टाल दिया।

अगले दिन, दादाजी ने डॉक्टर को बुलवाया और गाँव में यह अफवाह फैलाई कि उनकी तबीयत

काफी गंभीर है। डॉक्टर ने गाँव के लोगों को बताया कि दादाजी को आराम और देखभाल की

जरूरत है, और यदि उनके बेटे जल्द नहीं आए, तो उनकी हालत और खराब हो सकती है।

इस अफवाह का असर कुछ ऐसा हुआ कि दोनों बेटों को गाँव आने का संदेश मिलने में देर नहीं

लगी। जैसे ही राकेश और सुभाष को गाँव से उनके पिता की गंभीर हालत का पता चला, वे दोनों

अपने-अपने परिवारों के साथ तुरन्त गाँव पहुँचे।

गाँव पहुँचते ही उन्होंने देखा कि दादाजी बिस्तर पर लेटे हुए हैं, उनका चेहरा थका हुआ दिख रहा

था। बेटों को देखकर दादाजी के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई, लेकिन उन्होंने अपनी थकावट

दिखाते हुए आँखें बंद कर लीं।

बेटों ने उनके पास बैठकर हाल-चाल पूछा। सुभाष ने उनकी सेवा में खुद को पूरी तरह समर्पित

कर दिया—उनके लिए खाना बनाना, दवाई देना और उन्हें सुकून देने के लिए बातें करना। राकेश

ने घर के बाकी काम सँभाल लिए और अपनी पत्नी और बच्चों से कहा कि दादाजी के साथ

अधिक से अधिक समय बिताएं।

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धीरे-धीरे दादाजी की तबीयत में सुधार होने लगा। उन्होंने अपने पोते-पोतियों के साथ समय

बिताना शुरू कर दिया और उन्हें अपने किस्से-कहानियाँ सुनाने लगे। बच्चों के साथ हँसी-मजाक

करते हुए दादाजी का मन खिल उठा, और उनके जीवन में जैसे नई ऊर्जा आ गई।

एक दिन, दादाजी अपने बेटों के पास बैठे थे, और अचानक उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ;बेटा, मैं

तुम लोगों को यहाँ बुलाने के लिए ही थोड़ा बीमार होने का नाटक कर रहा था। असल में मुझे

किसी बीमारी की जरूरत नहीं थी, बल्कि मुझे तो बस तुम सबके साथ की जरूरत थी।

बेटों के चेहरे पर यह सुनकर एक झिझक और अपने पिता के प्रति अपराधबोध उभर आया।

राकेश ने कहा, "पिताजी, आपने हमें एहसास कराया कि हम अपने परिवार की ज़िम्मेदारियों में

इतने खो गए कि आपके अकेलेपन को भूल गए।

सुभाष ने सिर झुकाते हुए कहा, "हमसे गलती हो गई पिताजी। हम आपके साथ बिताए हर पल

की कमी महसूस करते रहे, लेकिन समय नहीं दे पाए। अब हम हर महीने बारी-बारी से गाँव

आया करेंगे।

इस निर्णय के साथ ही बेटों ने दादाजी से वादा किया कि वे अब उन्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे।

उन्होंने दादाजी के घर को फिर से जीवंत बनाने का वादा किया और सुनिश्चित किया कि

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दादाजी का मन प्रसन्न रहे। गाँव के अन्य बुजुर्ग भी दादाजी के इस नाटक को जानकर हँसते

हुए बोले, आपने तो बच्चों को सही सबक सिखा दिया, चौधरी साहब।

समय बीतने के साथ, राकेश और सुभाष अपने पिता के पास नियमित रूप से आने लगे। गाँव के

बुजुर्गों के साथ बैठकर वे अब हँसी-मजाक भी करते, और उनके बच्चों ने भी गाँव की सादगी

और अपनापन सीख लिया। दादाजी का जीवन अब खुशहाल हो गया था, और उन्हें अपनी बीमारी

का नाटक फिर कभी नहीं करना पड़ा।

यह कहानी हमें सिखाती है कि बुजुर्गों को सिर्फ आर्थिक मदद की ही नहीं, बल्कि साथ, प्यार और

समय की भी आवश्यकता होती है। उनके जीवन में छोटी-छोटी खुशियाँ और हमारे साथ की

उपस्थिति ही उनकी असली सेवा होती है।

#”कभी कभी सेवा करवाने के लिए बीमार होने का दिखावा भी करना पडता है।

इंदु निगम

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