चनाचूर गरम – संध्या त्रिपाठी : Moral Stories in Hindi

  अंकुर …. अंकुर ….मेला लग गया….? मालूम , नवरात्रि आते ही मुझे मेला घूमने की उत्सुकता बढ़ जाती है… अपन चलेंगे ना….तुम भी ना , बच्चों के समान करती हो आकृति …..आजकल के जमाने में मेला देखने कौन जाता है ….अरे वो तो आसपास के गांव वालों के लिए होता है भाई…!

    ठीक है …? आप मत जाइएगा…. मैं अकेले चली जाऊंगी…. पर जाऊंगी जरूर अपना ” आखिरी फैसला ” सुनाते हुए आकृति ने कहा….?

      हां तो चली जाना ….कौन सा दूर है  ,पता नहीं तुम्हें मेला में जाते ही क्या हो जाता है….एकदम से बच्ची बन जाती हो….!

     पिछली बार बेवजह …लाई लप्पा , गुब्बारे, चनाचूर जैसी बिना जरूरत की कितनी सारी चीजें खरीद कर ले आई थी ….दो दिनों के बाद सब बेकार होकर फेंक दिए गए थे…!

और आकृति …..वो ₹500…. जो तुमने मेरा चुना लगवाया था…. वो मैं कैसे भूल सकता हूं…..? गजब बेवकूफ बनी थी  तुम….देखो भाई सावधानी से रहना , इस बार इस तरह की कोई गलती मत करना ….उस चनाचूर वाले की तो लॉटरी ही लग गई होगी उस दिन…! बहुत खुश हुआ होगा , तुम्हारी बेवकूफी पर ……।

अभी तक आकृति अंकुर द्वारा कहे गए बातें और हंसी उड़ाने पर खामोश थी , फिर बड़े धैर्य पूर्वक धीरे से कहा….

आइए अंकुर…. आपको आज मैं अतीत की एक घटना सुनती हूं….

ओ चनाचूर वाले भैया…..₹50 का बना दीजिए….. 

मिर्च रहेगा….?

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 हां – हां भैया ….एकदम तीखा चटपटा बनाइए ….

ये मूली क्यों डाल रहे हैं …?

मूली मत डालिए  ,प्याज डाल दीजिए.. प्याज…. प्याज आजकल बहुत महंगा चल रहा है… इसीलिए तो मूली डाल रहा था….

 अच्छा तो प्याज के विकल्प के रूप में मूली ….मैंने कुटिल मुस्कान के साथ कहा….!

 अरे मेम साहब , आप चिंता ना करें… स्वाद में बिल्कुल फर्क नहीं पड़ेगा ..?आप खा कर तो देखिए…

 मैं , उन्हें नमक ,मिर्च ,मुर्रा और कई चीजें मिलाकर पेपर के टुकड़े को तिकोना मोड ऊपर  उछाल ..उछाल कर अच्छे से मिलाते हुए बड़े गौर से देख रही थी…।

    फिर अचानक मैंने पूछा …अच्छा भैया , आप ये बताइए आप चनाचूर विक्रय करने वाले सभी लोगों के छोटे से गोल से ठेले में ये चिमनी ( बाती) क्यों जलता है..?

   मेरे अचानक पूछे सवाल पर चनाचूर वाले भैया पहले तो मुस्कुराए  फिर बोले….. ताकि अंधेरे में भी चिमनी की लौ चमके…और लोगों को दिखाई दे कि अंधेरे में चनाचूर बेचने वाले भी हैं…

     वरना हम और हमारा व्यवसाय नजर अंदाज नहीं हो जाएगा मेम साहब…?

हूं…. तो ये बात है…मुझे बड़ी जिज्ञासा होती थी …कि सिर्फ चनाचूर वाले भैया के ही ठेले में , ये चिमनी क्यों जलता है … अब समझ में आया….

   अच्छा भैया एक बात और बताइए… आप लोग ऐसा चना बनाते कैसे हैं…? मेरा मतलब उबाल के चना को  कूटते हैं…..एक-एक चना को कूटा जाता है क्या …? या कोई और विधि ….

मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही उन्होंने कहा…

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      बस …मेम साहब…. अब ये ना पूछिए….. मेरा मतलब ..पेट में लात मत मारिए….कुछ काम हमारे लिए ही छोड़ दीजिए ना ….. आजकल तो लोग साफ सफाई के नाम पर गोलगप्पे भी घर में ही बनाकर खा लेते हैं,….।

 क्या है ना मेम साहब  ..?हम गरीब लोग हैं ….ऊपर से हमारा तो रंग भी  सांवला.. कपड़े भी…… बस उसी से हमारे सामान की शुद्धता भी मापी जाती है ….और हमारे सामान को शक की निगाहों से देखा जाता है ..!

    हां कुछ लोग ऐसे जरूर है जो सफाई का ध्यान नहीं रखते ….पर सब नहीं…?

घर में पत्नी है ,बच्चे हैं…पत्नी सारा दिन काम में लगी रहती है …हम दोनों ही मिलकर बनाते हैं .. फिर मैं बेचने के लिए निकल जाता हूं …।

     और क्या है ना मेम साहब… आजकल सारी चीजें पैकेट में मिलने लगी है ….तो लोग खरीद कर घर में ही बना लेते हैं …. वो तो कुछ कमाई मेला में हो जाता है….।

कम से कम लोग मेला के बहाने ही तो चनाचूर खरीद कर खाते हैं..।

   हां ये तो है…कहकर मैने 100 रूपये का नोट पकड़ाया और तेज गति से चलती हुए अंधेरे में गुम होती गई ….एक बार पीछे से आवाज भी आई… मेम साहब आपके पैसे…

पर मैंने तेज कदमों से दिशा बदल ..भीड़ में खो जाना ही उचित समझा…. !

एक इतमीनान के साथ निकल पड़ी थी घर के लिए… ये सोचकर कि मैने 50 की जगह ₹100 दिए थे चनाचूर वाले भैया को…

बड़े इत्मीनान से सारी बातें सुनने के बाद धीरे से आकृति का हाथ पकड़ कर अंकुर ने कहा…

ओह… तभी जब भी चनाचूर या ऐसे कोई भी ठेले वाले घर के सामने से गुजरते हैं तो क्या है ..देखने की… खरीदने की तुम्हें बड़ी जिज्ञासा रहती है…. और वो परसों किटी पार्टी में तुमने एक चनाचूर वाले को भी बुलाया था ना…

 अब समझ में आ रहा है…..

 वो तुमने पिछले साल₹500 जानबूझकर चनाचूर वाले को दे दिया था….और मैने तुम्हें कितनी बातें सुनाई थी… बेवकूफ भी कहा था…।

शाम को तैयार रहना आकृति…अपन मेला घूमने चलेंगे ….

अंकुर आप…? 

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पर वो तो …गांव ….आगे आकृति कुछ कहती  अंकुर ने तपाक से कहा ….

हां चलेंगे ना ….चनाचूर , लाई लप्पा गुब्बारे खरीद कर …अंधेरे में गुम होने के लिए …अंकुर और आकृति दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर मुस्कुरा दिए….।

आकृति ने तो पहले से ही ऐसे वर्ग विशेष की मदद करने का  “आखिरी फैसला ” ले ही लिया था….पर आज अंकुर और आकृति दोनों ने मिलकर … बिना बोले ही एक “आखरी फैसला” ले ही लिया था …. सोच और नजरिया बदलने का फैसला…

   साथियों… कभी-कभी हम बड़े-बड़े मॉल , होटल और न जाने कई ऐसी जगहों पर कितने पैसे खर्च कर डालते हैं….पर छोटे-मोटे ठेले वाले,  सब्जी बेचने वाले को नजर अंदाज कर .. मोलभाव कर… या उनसे सामान ना खरीद कर.. उनकी उपेक्षा कर जाते हैं… जिन्हें वाकई में पैसे की सख्त जरूरत होती है.. यदि हम सक्षम है तो उनके प्रति थोड़ा उदार होना हमारा कर्तव्य बनता है…।

साप्ताहिक विषय #आखिरी फैसला

संध्या त्रिपाठी

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