चाह -मीता जोशी

“क, की, कु, छ, घ अक्षर से नाम निकला है जोशी जी। आओ आकर पोती के कान में उसका नाम सुना दो। “

     शंख को पीले कपड़े में लपेट, पंडित जी ने जोशी जी के हाथ में दे दिया। उन्होंने उसे पकड़ धीरे से कान के पास जा पुकारा “मेरी प्यारी कृष्णकली। “

दादा जी के मुँह से कृष्णकली सुनते ही ग्यारह दिन की बच्ची ने तुरंत आँखें फरका दी। ईजा (माँ) ने तभी सोच लिया था सांवली-सलोनी बिटिया का नाम ‘कृष्णकली’ ही होगा।

     भाग्यहीन थी बेचारी। पैदा होने के दो महीने पहले ही पिता चल बसे। कोई मनुहार करने वाला न था। दादाजी ने माँ को सहारा दिया। उसकी हिम्मत बने। बेटी पैदा होने पर उन्हें तनिक भी दुःख नहीं था। लड़का-लड़की में भेद करने जैसी कोई भावना उस प्रांत के लोगों के दिलों में है ही नहीं।

     कृष्णकली जल्दी ही किशनुली बन गई। चंचल इतनी कि चलना सीखा तो जमीन पर नहीं टिकती। सारे घर में फुदकती रहती। जोशी जी उसमें अपने बेटे का बचपन जीते थे। घर खर्च छोटा बेटा ही चलाता। बहुत अधिक नहीं था पर घर में किसी चीज़ का अभाव भी न था।

     जल्द ही देवर की शादी हो गई। किशनुली की ईजा अब किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती थी। उसने किसी और के खेत में काम करने का निश्चय किया। देवर बहुत गुस्सा हुआ, “उच्च कुल की हो, किसी दूसरे के खेत में काम करोगी तो हमारी क्या इज्जत रह जाएगी? “

     जोशी जी बहुत समझदार इंसान थे। उनकी पूरी सहानुभूति किशनुली की ईजा के साथ रहती। वो उसे छोटी-बहू के आगे दबते नहीं देखना चाहते थे। लोक-लाज सब एक तरफ रख बोले, “काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। उसके पीछे का मकसद बड़ा होता है। ” उन्होंने बहू को काम के लिए हामी भर दी। किशनुली की ईजा(माँ) किसी और के खेत में काम पर जाने लगी। कमाई कर घर खर्च में सहयोग कर स्वाभिमान से जीती।

     छोटी सी, दुबली-पतली काया वाली, सांवले रंग की किशनुली सारा दिन अकेले में चिड़-चिड़ करती रहती।

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नाम की भी सुंदरता नहीं थी, तब भी एक आकर्षण था जो किसी को भी मोह में बाँध लेता। अब माँ उसे अपने साथ खेत ले जाने लगी। अपनी ईजा के साथ खेत-खलिहान में जा खुले आसमान के नीचे उसका मदमस्त बचपन बीत रहा था। खिलौनों की जगह दातुल, कुटल, फावड़ा, दराती, हसिया(खेती में काम आने वाले पहाड़ी उपकरण)ने ले ली। छोटी सी किशनु जिद्द करती तो ईजा घास काट, डलिया में डालने को कहती। बचपना था, जब तक मन लगता वो नित-नए काम के जरिए समय बिता लेती। उन्हीं खेत-खलिहानों के बीच बड़ी होती गई। उसकी ईजा शांत और शालीन स्वभाव की थी। जबसे देवरानी आई है घर में उसकी हैसियत, महज़ एक नौकरानी जितनी रह गई है।

     जिस सेठ के खेत में काम करती हर पंद्रह दिन से अपना मेहनताना लेने उसके घर जाती थी। सेठानी ही हिसाब किया करती क्योंकि पति शहर में कमाने गए हुए थे।

     सेठानी बच्ची को बड़ा प्यार करती। किशनुली उसके आते ही शरमाकर, ईजा का पल्लू पकड़ उसके पीछे छुप जाती। उसे छुपा देख,  बड़े प्यार से सेठानी कहती, “अरे कहाँ गई! किशनु, आज क्या लेगी? “और उस दो मिनट में किशनु सारे नखरे दिखा डालती। शरमाती, नजर बचाती, मनुहार करवाती। एक वही तो थीं जो उससे पास आने को मनुहार करतीं।

     सेठानी के पास पैसों की कोई कमी न थी, बस भगवान ने संतान सुख नहीं लिखा था। शादी के नौ-बरस बीत चुके थे पर संतानहीन थी।

     धीरे-धीरे किशनुली बड़ी होने लगी अब वो अपनी ईजा के पहुँचने से पहले भागकर हवेली में जा सेठानी को आवाज़ लगाती, “ताई हम आ गए। आज मुझे क्या दोगी?” 

     आज जब ताई नीचे उतर के आई तो उनकी सुंदरता देखते बनती थी। नाक में बड़ी सी नथ जो कि कुमाऊँ प्रांत की संपन्नता की प्रतीक है, उसने अन्य गहनों के साथ वो भी पहनी हुई थी, जिससे उनकी सुंदरता-संपन्नता निखर कर बाहर आ रही थी। किशनुली को देखते ही बोलीं, “अरे किशनुली आ गई!आज क्या चाहिए तुझे? “

     मासूम बचपन ने तुरंत नथ की तरफ हाथ बढ़ा दिया। सेठानी और माँ उसकी इस मासूम हरकत पर हँस दिए पर किशनुली, वह तो आज पहली बार हठ कर बैठी। बहुत समझाया गया पर अड़ी रही। सेठानी उसे हर बार कुछ न कुछ जरूर देती, कोशिश यही रहती कि वो माँगे और सेठानी उसकी माँग को पूरा कर दे लेकिन सेठानी के सामने तो किशनुली के नखरे ही खत्म नहीं होते थे।

     आज जो चीज़ सेठानी ने उसे दी वह भी अनोखी थी। उसके आगे स्लेट-पेंसिल करते हुए बोली, “इसमें लिखाई- पढ़ाई करेगी हमारी किशनु। अब कल से ईजा के साथ खेत मत जाना। “

     किशनुली की ईजा रो पड़ी, “ऐसे इसके भाग कहाँ। यही सब किस्मत में होता तो भगवान पिता का साया ही न छीनता। “

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    सेठानी ने उसका हाथ पकड़ वादा किया, “अब तू जब भी खेत जाएगी, किशनुली मेरे पास पढ़ने आया करेगी। आज से इसकी पढ़ाई की जिम्मेदारी मेरी।

     अब किशनु रोज सेठानी के पास जाने लगी। माँ ने देखा वो जबसे सेठानी से मिली है बड़ी खुश रहती है। बड़ी हवेली में जा बड़ी-बड़ी बातें करने लगी है।

     आठ साल की हुई तो एक दिन अड़ गई, “ईजा मेरी भी नाक छिदवा दो। “दादा ने उसकी यह हठ जल्द ही पूरी कर दी। नाक छिदवा वह बहुत खुश थी।




    माँ देखती, खेत में जाकर तिनका ले, उसे गोल-रिंग बना, लोंग में फंसा लेती और ईजा से कहती, “ईजा देख कैसी है किशनुली की नथ!लग रही हूँ ना बिल्कुल सेठानी जैसी। “

     अपनी कल्पनाओं के चित्र में जब अपनी ईजा की फोटो बनाती तो वो भी हमेशा बड़ी नथ के साथ ही होती।

     ईजा से कहती, “जब तू खूब सारा पैसा कमा लेगी, तू मुझे नथ दिलाएगी ना, ईजा!बड़ी सी, बिल्कुल सेठानी जैसी। “

     पढ़ाई में भी कुछ कम नहीं थी किशनुली। अच्छे नंबरों से मैट्रिक पास कर कॉलेज में आ गई । सेठानी ने उसका पूरा सहयोग किया पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। सेठानी का पति खेत बेचकर, पत्नी को ले शहर का रुख कर गया। किशनुली अकेली पड़ गई लेकिन उसने हिम्मत ना हारी। बच्चों को पढ़ा अपनी पढ़ाई का खर्चा निकाल ही लेती। दादाजी चल बसे, अब अपना कहने को बस माँ साथ थी। चाचा को पहले ही कोई मतलब न था और रिश्तेदार! कभी देखे ही न थे, पहाड़ों में साधन कम और दूरी अधिक होने की वजह से किसी का मिलना जल्दी संभव नहीं होता।

     अब कृष्णकली को एक नया शौक चढ़ा था शहर जाने का। पर कैसे! तो माँ से कहती, “जब रिश्ता देखेगी ना तो शहर का लड़का देखना। चाहे में कितनी भी बड़ी हो जाऊँ मुझे शहर ही विदा करना। “

     M.A. अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण किया तो ( कुमाऊँ क्षेत्र में स्त्री शिक्षा पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं रहा है। हाँ साधन और व्यवस्था न होने के कारण लड़कियाँ प्राइवेट पढ़ाई करतीं पर लड़कियाँ पढ़ी-लिखी ही मिलती)किशनुली की पढ़ाई के चर्चे पूरे गाँव में थे।

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     किसी ने उसके लिए रिश्ता बताया, “शहर में मकान है। घर का सबसे छोटा बेटा है। संपन्न परिवार है। सब बेटे अलग-अलग हैं। गाँव की सुशील पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए ताकि माँ-बाप की सेवा कर सके। “

     माँ के लिए इतना जानना ही काफी था। किशनुली ने देखा सास-ससुर का रहन-सहन अच्छा है, लड़का शहर में ही अपना बिजनेस करता है, उसने तुरंत हामी भर दी। देने को ईजा के पास कुछ नहीं था। बड़ी सी नथ का ख्वाब अधूरा ही रह गया। मामा की स्थिति भी मजबूत न थी।

     ईजा ने समझाया, “अच्छा परिवार है। तेरे भाग में नथ होगी तो वो लोग ही चढ़ा देंगे। (कहते हैं जितना संपन्न परिवार उतनी वजनी और आकार में बड़ी नथ होती है। जैसे-जैसे संपन्नता बढ़ती जाती है उसके साथ नथ का आकार और वजन भी बढ़ता चला जाता है। इसे वहाँ की महिलाएँ किसी विशेष पूजा या वार त्यौहार पर पहनती हैं)किशनु अपने अरमानों को मन में दबाए विदा हो गई। वहाँ जा समय बीतते-बीतते पता चला पति का किसी और के साथ संबंध है। तब तक किशनुली की बेटी हो चुकी थी। सास-ससुर ने इतना बड़ा धोखा देने के कारण बेटे को घर से निष्कासित कर दिया।

     मन से हारी हुई किशनू ने ससुर को ढाँढस बंधा कहा, “पिताजी भाग्यशाली होती तो पिता का साया ही न होता! विधाता ने मेरे भाग्य में चाहे जो लिखा हो वो मैं सहर्ष स्वीकार करती हूँ, पर अपनी बेटी का भाग्य तय करने का अधिकार मैं किसी को नहीं दूँगी। स्वयं भगवान को भी नहीं। अपनी बेटी का भाग्य मैं ख़ुद लिखूँगी। बस आप अपना आशीर्वाद, साथ और विश्वास मुझ पर बनाए रखें। “इतने सालों में किशनुली ने कभी अपने भाग्य की दुहाई न दी।

     ईजा से मिली तो ईजा के आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बच्ची को देख बोली, “यह बेचारी भी दूसरी किशनुली तैयार हो गई। “

     किशनुली माँ की बात का विरोध करते हुए बोली, “ईजा तू पराश्रित थी। परिस्तिथियाँ अलग-अलग हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार तुमने जो किया बहुत था। आज जो कुछ हुआ उसमें मेरी बेटी का कोई दोष नहीं मैं इसका भाग्य इतनी आसानी से किसी को लिखने का हक नहीं दूँगी। “

     ससुर जी ने भी उसका समर्थन कर कहा, “मैं तेरे साथ हूँ। अपनी बेटी के भविष्य का सोचो। अपनी अधूरी पढ़ाई वापस शुरू कर दो और एक दिन इतना नाम कमाओ कि मेरे बेटे को अपनी गलती पर शर्म महसूस हो। जब कभी भविष्य में माफी भी माँगे, तो भी उसे माफ न करना। “

     किशनुली ने पढ़ाई शुरू कर दी। एम. ए किया, पीएचडी फिर लेक्चरर, प्रोफेसर और साथ ही साथ एक प्रसिद्ध लेखिका।




     बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाई और जब वो अपने पैरों पर खड़ी हो गई तो उसका विवाह उसी के साथ कार्यरत एक योग्य लड़के से तय कर दिया।

     बिटिया की शादी है। खरीदारी करने गई कृष्णकली ने सबसे पहले वह खरीदा जो कभी बचपन में उसका सपना हुआ करता था। जी हाँ, बड़ी सी नथ, वजन वाली। वह नथ जो कि आज उसकी मेहनत, जज़्बे व उसकी हिम्मत की प्रतीक थी पर आज भी बिटिया के लिए। ख़ुद के लिए तो वो आज भी ख्वाब था।

     अपने बचपन के ख्वाब को अपनी बिटिया के चेहरे पर लगा निहार रही थी, बिल्कुल वैसे-जैसे वो बचपन में गुड़िया को, तिनके की नथ से सजा, निहारा करती थी। इतने में शीशे में किसी का जाना-पहचाना प्रतिबिंब दिखाई दिया। पलट कर देखा तो सफेद बालों में से झाँकती मनमोहक छवि और उसे देख अनायास ही मुँह से निकल पड़ा, “सेठानी जी!”

     सेठानी जी भी छोटी सी किशनुली को बड़े रूप में देख आश्चर्यचकित रह गईं। रहन-सहन रुतबा सब देखते बनता था पर चेहरे का तेज और मासूमियत आज भी वही थी बस अपने सांवले रंग को करीने से ढकना सीख गई थी। दोनों एक दूसरे को देख बहुत खुश थीं।

     सेठानी का पता ले कार्ड देने उनके घर पहुँची तो सेठानी ने एक उपहार आगे कर कहा, “बहुत सालों से तुम्हारे लिए रखा था। पूरा विश्वास था एक दिन तुम जरूर मिलोगी। वहाँ से अचानक निकल आना हुआ। तुम्हारी माँ का कुछ पैसा भी मेरे पास पड़ा था वो तुम्हारे लिए जमा करवाया करती थी। मैंने उसमें कुछ पैसे मिलाकर तुम्हारे लिए कुछ खरीद रखा है। “

     किशनुली ने देखा तो उसमें वही नथ थी, बड़ी सी, कितनी वजनी होगी! ना जानती थी और ना जानना चाहती थी। मुस्कुरा दी और बोली, ” आपको मेरी पसंद आज भी याद है!माफ कीजिएगा अब आपके द्वारा प्रेम से दिए इस अमूल्य तोहफे को, मैंअपना नहीं सकती क्योंकि नथ पहनाने वाला ही नहीं रहा सेठानी जी। अब सब चाहत खत्म हो चुकी है। उसको तो नथ क्या, मेरे चेहरे में कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। शायद मेरा चेहरा ही नहीं। साल भर में मुझे छोड़ चला गया। “उसने सेठानी जी को सारा वाकया सुनाया।

     उसकी किस्मत पर सेठानी को बड़ा तरस आ रहा था। निःशब्द सोचती रही कहते हैं, ‘भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं’ पर यह सब क्या है।

     हिम्मत कर सेठानी जी बोलीं, “तू मेरी बेटी है। मैंने हमेशा तुझे अपना माना है। मुझे मातृत्व-सुख तुझसे मिला। जब अपनी बेटी के विवाह में बैठेगी तो ये नथ जरूर पहनना क्योंकि तुम्हें भी तो अरमान पूरे करते, तुम्हारे अपने देखना चाहेंगे। आज अपने लिए नहीं मेरी खुशी के लिए तुम्हें ये पहननी होगी। वो नथ जो कभी तेरी और आज तेरे लिए हमारी चाह है।”

ऐसा ही हुआ जब उसने नथ पहनी तो अपने बचपन के गहने को, अपने शौक को, उसकी चाहत को पूरा होते देख ईजा के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। कृष्णकली भी आज सालों बाद शीशे के आगे खड़ी होकर ख़ुद को निहार रही थी। बड़ी सी नथ, बचपन की चाहत पहन जब ख़ुदको देखा तो शायद पहली दफा इतना फूट-फूटकर रोई होगी।

     यदि हम जज्बा रखें तो किस्मत में लिखा भी मिटा सकते हैं। जरूरत है कर्म करने की, मौजूदा हालात से लड़ने की और फिर से खड़ा होने की। किस्मत के आगे हार मानने वाले कभी तरक्की नहीं कर पाते। परिस्थितियों चाहे जो भी हों उनके आगे घुटने टेक देने से कभी समस्या का हल नहीं निकलता। मजबूती से आगे बढ़ना ही जिंदगी है।

मीता जोशी

जयपुर (राज.) 

 

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