रसोई घर से राकेश की मम्मी की आवाज आती है राकेश तुम्हें स्कूल नहीं जाना है ? टिफिन बना दिया है फटाफट तैयार हो जाओ । राकेश स्नान के लिए तुरंत चला जाता है और स्कूल जाने के लिए वह रेडी हो जाता है ।मम्मी उसका टिफिन और पानी बोतल बैग में रख देती है। राकेश घर से बाहर बस का इंतजार करता है । इतने में ही उसके और दोस्त भी आ जाते हैं, बस में सभी दोस्त बातें करते हैं कि आज गणेश जी हम भी घर में पधारेंगे जिसके लिए तैयारी जोर शोर से करनी है। स्थल व मूर्ति के सजावट के साथ श्री गणेश जीके प्रिय पकवान की तैयारी भी करनी है। प्रतिदिन पूजा के साथ गणेश जी को प्रिय भिन्न भिन्न प्रकार के पकवानों की भी तैयारी करनी है जिसके लिए हम सभी इकट्ठा होकर प्लानिंग करेंगे सभी दोस्त इस तरह की बातें करने लगे। ।
राकेश भी चुपचाप सोचता रहा कि वह भी अपने घर में श्री गणेश जी पर्व में मूर्ति की स्थापना कर उसकी धूमधाम से उसकी पूजा-अर्चना करेगा, यह सोचते हुए स्कूल जाता है । स्कूल में अनेक बच्चे इसी तरह की बातें करते हुए प्रोग्राम बनाने हेतु चर्चा में व्यस्त रहते हैं। स्कूल की छुट्टी हो जाती हैं !
राकेश घर आता है । घर आते ही अपने मम्मी पापा से कहता है कि क्यों ना इस साल हम भी गणेश जी रखे उनकी पूजा करेंगे प्रसाद बनाएंगे। मोहल्ले वालों को भी बुलाएंगे । राकेश के मम्मी पापा को यह बातें बहुत पसंद आती है कि राकेश का ध्यान भगवान और पूजा की ओर जाने लगा है जो एक अच्छे संस्कार का प्रतीक है। उन्होंने भी गणेश जी रखने की खुशी खुशी सहमति दे देते है ।
राकेश बहुत खुश हो जाता है दूसरे दिन सुबह राकेश के पापा राकेश को घर के बाड़ी के तरफ ले जाते हैं वहां की मिट्टी लाकर छानते हैं मिट्टी साफ करते हैं राकेश पूरी तरह से अपने पापा का मदद करता है मिट्टी को गीला किया जाता है इतने में मोहल्ले के कुछ लोग गणेश भगवान के लिए निर्माण में प्रयोग होने वाले विभिन्न तरह के रंग पेंट लाकर देते हैं तो कुछ लोग आकर्षक वस्त्र आभूषण लेकर आते हैं। भगवान श्री गणेश जी की मूर्ति सुंदर व आकर्षक परस्पर सहयोग से तेयार जाती है ।
राकेश की मम्मी, भगवान जी के लिए मुकुट व फैटा तैयार करती है जो समय समय पर बदलकर पहनाने के लिए प्रस्तावित था । तरह-तरह के श्रृंगार के साथ गणेश जी बिठाने की कार्यवाही निर्धारित तिथि में संपन्न हो जाती है।
मोहल्ले के लोग आते हैं गाना – भजन होता है बहुत जोर शोर से उत्सव मनाया जाता है ।पंडित बुलाया जाता है पूजा की जाती है इसी प्रकार 10 दिनों तक रोज पूजा की जाती है। सुबह शाम गणेश जी की आरती किया जाने लगा। राकेश का मन गणेश जी में और पूजा में लग चुका था ।
धीरे-धीरे कैसे दिन बीतता चला गया , पता ही नहीं चला। 10 दिनों के बाद गणेश जी के विसर्जन करने की बारी आती है। राकेश काफी बेचैन व द्रवित हो जाता है। गणेश विसर्जन की तैयारी होने लगती हैं पंडित जी मंत्र पढ़ने लगते हैं और गणेश भगवान को उनके आसन से हटाकर पीठे पर बैठा कर पूजा की जाती है विसर्जन के लिए तालाब में ले जाया जाता है।
राकेश अपने पापा से कहता है कि क्यों ना हम गणेश जी को हमेशा के लिए अपने घर में रखें विसर्जन ही ना करें । कितना अच्छा होता।
पापा उन्हें समझाते हैं कि ऐसा नहीं होता यह 10 दिन की ही प्रथा है हम उसे मानने को विवश हैं , ऐसा करना ही पड़ता है , 10 दिन के बाद मिट्टी की मूर्ति को तालाब अथवा नदी में ही विसर्जित करना ही पड़ता है।
राकेश का छोटा सा मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि भगवान को विसर्जन क्यों किया जाता है , उन्हें और- भगवान की तरह अपने घर में क्यों नहीं रखा जाता उसके पापा उसे समझाते हैं कि हम मिट्टी के सिवाय और दूसरी मूर्ति रखते हैं तुम्हें हमेशा के लिए हम उसकी पूजा करते हैं परंतु मिट्टी की मूर्ति को हम विसर्जित करते हैं
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राकेश घर में आता है वह तालाब जा कर देखता है कि और भी लोग हैं जो बडी बड़ी मूर्ति रखे हैं और भगवान जी को बैंड बाजा बजाते हुए नाचते गाते ले जाते हैं और नदी तालाब में विसर्जन करते हैं, यह देख कर राकेश जो की 8 वर्ष की उम्र का था , उसका छोटा सा मन यह मानने को तैयार ही नहीं था कि भगवान को विसर्जन क्यों किया जाता है घर आकर वह बहुत रोता है और अपनी मां से कहता है की यह विसर्जन वाली प्रथा मुझे अच्छी नहीं लगती। इतना सुंदर गणेश जी की मूर्ति जिसकी मैं रोज पूजा करना चाहता था। केवल 10 दिन के लिए ही क्यों पूजा की जाती है? हमेशा के लिए क्यों नहीं ? क्यों ऐसी प्रथा मानने को हम विवश हो जाते है? यह सवाल राकेश के मन को झकझोर कर रख दिया हैं .
आरती झा
कुशालपुर रायपुर