आदरणीय पाठकों को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं, इस आधुनिक युग में भगवान और भक्त के सच्चे रिश्ते को दर्शाने वाली मेरी यह रचना अवश्य पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करें।
गंगश्याम जी मंदिर राजस्थान के जोधपुर शहर के परकोटे में स्थित प्राचीन व भव्य कृष्ण मंदिर हैं, और बाईमाँ जो अस्सी वर्षीय वयोवृद्ध औरत थी वो मेरी मम्मी की दादीजी अर्थात मेरी परनानी जी थी।
बाईमाँ रोज सुबह चार बजे उठ कर नहाने लग जाती थी, उनकी उम्र अब अस्सी साल से ऊपर हो गयी थी पर उन्होंने इतने वर्षो में अपना चार बजे उठकर नहाने का व साढ़े चार बजे गंगश्याम जी मंदिर में श्री कृष्ण भगवान अर्थात सांवरे की प्रथम आरती करना नहीं छोड़ा था।
बाईमाँ जिनका असली नाम श्रीमती किशनप्यारी देवी था उनका प्रचलित नाम ज्यादा पहचाना जाता था,बाईमाँ अपने नाम के अनुसार वो कृष्ण भगवान को प्रिय थी और उतने ही प्रिय उन्हें सांवरे अर्थात कृष्ण भगवान थे ।
मेरी उम्र उस समय दस साल की थी और बाईमाँ की चौथी पीढ़ी की मैं प्रतिनिधि थी।
बाईमाँ गंगश्याम जी अर्थात सांवरे की परम भक्त थी,सर्दी, गर्मी, बरसात, बीमारी चाहे कैसी भी परिस्थिति हो बाईमाँ घर से थोड़ी दूर बने ऊँचाई पर स्थित मंदिर जाना नहीं छोड़ती थी।
बाईमाँ जो मोतियाबिंद की मरीज थी, जिन्हें अपनी आखों से पास की वस्तु भी बड़ी कठिनाई से दिखती थी वो अकेली उस आयु में मंदिर तक का उबड़-खाबड़ रास्ता आसानी से पार कर लेती थी।
” अरे बिटिया!! ये सांवरा रोज मेरी लाठी पकड़कर मुझे मंदिर तक ले जाता हैं ” बाईमाँ भाव-विभोर होकर मुझे बोलती थी ।
मेरे बाल मन में यह सवाल और गहराता जाता था की क्या सच में सांवरा उनकी मदद करने रोज आता हैं या सांवरे की प्रेरणा से कोई व्यक्ति रोज बाईमाँ को मंदिर तक छोड़ देता हैं।
रास्ता बहुत सुनसान था और रात भी हो तब भी बाईमाँ उठकर मंदिर की और चल देती थी, नानीजी के रोकने पर बोलती थी ।
” मेरा सांवरा हर समय मेरे साथ रहता हैं, बहू तुम मेरी चिंता ना किया करों ” बाईमाँ की भक्ति अटल थी।
एक बार बाईमाँ चलते-चलते गिर पड़ी उस दिन सांवरे को पूरे हक से उन्होंने डांट भी दिया।
” सांवरे!! दुष्ट तुझे शर्म नहीं आयी आज तू मेरी लाठी पकड़ने नहीं आया, देख मैं गिर गयी,तूने मुझे गिराने के लिए अपनी गाय को प्रेरणा देकर भेजा,तू कभी यशोदा मैय्या को सताता था आज मुझे सता रहा हैं ” बाईमाँ एक माता के समान स्वंय भगवान को डांट रही थी, भक्ति की पराकाष्ठा देखकर सभी आश्चर्यचकित थे।
बाईमाँ का देहान्त नब्बे वर्ष की आयु में हुआ, वो एकदम स्वस्थ थी एक दो दिन बीमार होकर बिस्तर पर लगी और उनके मन में अपने सांवरे की मंगला-आरती में सम्मिलित नहीं हो पाने का अफसोस था,तीसरे दिन मंगला आरती के समय बाईमाँ ने करूण पुकार लगाई या यूँ कहिए सांवरे को फिर डांटा।
” अरे सांवरे दुष्ट !! इतना कठोर ना बन मैं दो दिन से तुझे मिलने नहीं आयी और तू मेरी कुशलक्षेम पूछने भी नहीं आया, ना जाने तू कब आकर मुझे अपने साथ ले कर जाएगा ?”
सुबह के साढ़े चार बजे थे, गंगश्याम जी मंदिर की मंगला आरती शुरू हो गयी, घंटियो की ध्वनि बाईमाँ के कानों में पड़ी और बाईमाँ ने नानाजी,नानीजी से कहा।
” अब मैं विदा लेती हूँ, मेरा सांवरा रोज की तरह मेरी लाठी पकड़कर ले जाने आया हैं ” बाईमाँ के चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी।
मंगला आरती समाप्त हुई और बाईमाँ ने प्राण त्याग दिए,जैसे सांवरे का हाथ पकड़कर बाईमाँ अनन्त यात्रा पर निकल गयी ,यह सच्ची घटना मेरे मानस पटल पर हमेशा के लिए अंकित हो कर रह गयी,आज भी बाईमाँ का दिया हुआ गंगश्याम जी मंदिर का प्रसाद व सांवरे के किस्से मुझे याद आते हैं।
मैं यह नहीं जानती की यह बातें कितनी सच हैं क्योंकि हम आधुनिकता और उच्च शिक्षा के प्रभाव में खोकर बहुत जल्दी हर विषय पर तर्क-वितर्क कर लेते हैं, और सच्ची भक्ति पर विश्वास नहीं कर पाते हैं, पर बाईमाँ जो एक अनपढ़ औरत थी वो तर्क-वितर्क से कोसों दूर थी वो सिर्फ सांवरे पर विश्वास करना जानती थी,मेरी नजर में यही सच्ची भक्ति थी जहाँ भक्त के विश्वास की लाज रखने स्वयं भगवान आते हैं।
जय श्री कृष्ण!!
आपकी प्रतिक्रिया के इंतजार में
पायल माहेश्वरी
यह रचना स्वरचित और मौलिक हैं
धन्यवाद।