बड़ों का साया – शिव कुमारी शुक्ला : Moral Stories in Hindi

हर्षा नाम के अनुरूप एक बहुत ही मस्त , खुश रहने वाली, सौम्य साधारण नैन-नक्श गेहूंआ रंग की संस्कारी लड़की थी।उसका ये मस्त स्वभाव ही उसकी मम्मी की चिन्ता कारण था। जैसे -जैसे वह बड़ी हो रही थी उनकी चिंता यह सोचकर बढ़ रही थी कि ससुराल में कैसे निभा पायेगी। सामने वालों को यदि यह मस्तमौला अन्दाज नहीं भाया तो कैसे सामंजस्य बिठा पायेगी। कहीं यह बात उसके शादी शुदा जिंदगी में बिखराव का कारण न बन जाए। यही सब सोच कर आशंकित रहती और यदा-कदा उसे परोक्ष रूप से समझाने का प्रयास करतीं। बेटा अब तुम बड़ी हो रही हो अपने व्यवहार को संयमित करना सीखो।

वह मस्ती में बोलती मेरा स्वभाव जो है जन्म जात है उसे मैं कैसे बदल सकती हूं। मैं तो ऐसी ही रहूंगी जो मेरे इसी स्वभाव के साथ सामंजस्य बिठाये तो बिठाये नहीं तो अपने अपने रास्ते अलग।

उसकी यह बात सुन कर वे कांप उठती यह तो पहले से ही अलग-अलग रास्ते के लिए तैयार है। क्या होगा इसका।

हर्षा बड़ी बहन थी एक छोटा भाई तरूण माता मधु पिता सचिन के साथ -साथ दादा-दादी के साथ सुखपूर्वक रह रही थी।वे उच्च मध्यम वर्गीय परिवार से थे सो भौतिक सुख साधनों की कोई कमी नहीं थी। आंनद पूर्वक जीवन व्यतीत हो रहा था। दादा-दादी की जान थी हर्षा।वह उन्हें बहुत प्यार करती एवं उनकी जरूरतों का ध्यान रखती।

उसकी इंजीनियरिंग पूरी होते ही मम्मी-पापा को उसकी शादी की चिन्ता हुई और वे एक सुयोग्य वर के साथ -साथ ऐसा परिवार भी चाहते थे जो थोड़ा खुले विचारों का हो ताकि उनकी बेटी वहां सुखी रह सके।

इसे मात्र संयोग ही कहें इतना बड़ा काम जिसमें मम्मी-पापा को बहुत ही भागम-भाग करनी होती है। कई परिवारों से मिलने भटकाना पड़ता है चुटकी बजाते  हो गया।

 हुआ यूं कि सचिन जी अपने बहुत ही निकट संबंधी  के यहां सपरिवार शादी में सम्मिलित होने गये थे । वहीं एक दूसरा परिवार भी आया हुआ था।उस परिवार की गृहस्वामिनी स्वाति जी की नजर हर्षा पर पड गई। पहली ही नजर में हर्षा उन्हें भा गई।अब हर समय उनकी नजर उसके क्रिया कलापों पर रहती। कैसे वह हंसती हंसाते रहती है बड़ों का ध्यान ,सम्मान रखती है। अपने दादा-दादी का कितना ख्याल रखती है। उन्हें नाश्ता , खाना अन्य जरूरत की चीजें लाकर देती। उनके आराम का पूरा ध्यान रखती साथ ही उसका भाई तरूण भी उसका सहयोग करता।कुल मिलाकर पूरा परिवार ही उन्हें सभ्य, संस्कारित, ऊपरी चमक -दमक दिखावे से दूर लगा।

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धीरे-धीरे उन्होंने मधुजी से मेलजोल बढ़ाया। तीन दिन में ही वे एक दूसरे के काफी नजदीक आ गये।तब स्वतीजी ने मौका देखकर मधुजी को अपने मन की बात बताई ।

वे बोलीं मुझे यहीं किसी से पता चला है कि आप अपनी बेटी के लिए रिश्ता तलाश रहीं हैं यदि आपको सही लगे तो मेरा बेटा है जिसके लिए मैं हर्षा बेटी को पंसद करतीं हूं। बेटा इंजीनियर हैं और मल्टी नेशनल कम्पनी में मैनेजर है।हमारा भी आपकी तरह छोटा परिवार है एक छोटी बेटी जो अभी स्कूलिंग कर  रही है और दीपक के माता-पिता भी हमारे साथ ही रहते हैं। ये अपने माता-पिता के इकलौते बेटे जो हैं। यदि आपको बेटे-बेटि का यह रिश्ता पंसद हो तो मैं तपन  बेटे को यहीं बुला लूं ताकि बच्चे भी आपस में मिल लें।

यह सुन मधुजी सोच में पड़ गईं  वे कोई भी निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थीं सबकुछ इतना अप्रत्याशित जो था। 

उन्हें असमंजस की स्थिति में देख स्वाति जी बोलीं बहन जी जल्दी नहीं है न आपके ऊपर कोई दबाव है आप आराम से सचिन भाई साहाब, दादा-दादी, हर्षा, सबसे सलाह-मशवरा करके जबाब दें हम प्रतीक्षा करेंगे।

शादी का घर था तो सबका एक साथ बैठना मुश्किल था। फिर भी उन्होंने समय निकाल कर विचार किया और सभी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि सामने से आया इतना अच्छा रिश्ता ठुकराने में कोई समझदारी नहीं है। तसल्ली से और जानकारी जुटा लेते हैं। फिर उन्होंने दोनों परिवारों के कुछ कॉमन परिवारों से परोक्षरूप से जानकारी ली। किन्तु किसी ने भी उनमें कोई बुराई नहीं बताई तो वे संतुष्ट गये और उन्होंने उनसे अपने बेटे को बुलाने का आग्रह किया।

शादी संपन्न हो चुकी थी, सभी मेहमान विदा हो रहे थे सो वह दोनों परिवार भी विदा हो कर एक होटल में रुक गये। दूसरे दिन बेटा भी वहां पहुंच गया। बेटा सुंदर, सुशील, एवं विनम्र स्वभाव का धनी था।उसका व्यक्तित्व इतना अच्छा था कि देखते ही मन को भा गया। पढ़ाई -नौकरी में भी कोई कमी नहीं थी सो किसी भी कोण से मना करने का सवाल ही पैदा नहीं हो रहा था। हर्षा और तपन को भी मिलवा कर उनकी भी इच्छा जानी गई। वे दोनों भी तैयार थे सो रिश्ता पक्का हो गया।एक बहुत बड़ा काम इतनी आसानी से सुलट जाएगा दोनों परिवारों ने इसकी  कल्पना भी नहीं की थी।

बाद में दोनों परिवार शादी की तारीख निकलवाने की कह अपने -अपने घर को रवाना हो गए।

तीन माह बाद का शुभ मुहूर्त निकला और उसी दिन शादी करने का निर्णय लिया।

शादी से पहले हर्षा ने अपनी नौकरी करने की बात रखी जिसे उस परिवार ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। 

सही तो है बच्ची ने इतनी मेहनत की, मम्मी-पापा ने इतना खर्च किया, योग्यता का उपयोग तो होना ही चाहिए हमें कोई आपत्ती नहीं ।है।

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शादी धूम धाम से हो हर्षा अपनी ससुराल आ गई। हमेशा मस्त रहने वाली हर्षा ससुराल आकर एक दम चुप हो गई।जब किसी पौधे को जड़ से उखाड़ कर अन्यत्र रोपते हैं तो शुरुआत में  वह थोड़ा कुम्हला जाता है बाद में जड़ें जम जाने के बाद लहलहा उठता है वही स्थिति हर्षा की थी वह अपनी जड़ों से (अपने घर से)उखड़ कर आई किंकर्तव्यविमूढ़ थी कहां आ गई। नया घर,नये लोग, नया वातावरण सामंजस्य बिठाने में समय तो लगेगा। दादी की याद आते ही वह रो पड़ी।तब नई दादी ने उसे प्रेम से अपने पास बिठा उसका सिर सहलाते पूछा क्या परेशानी है, कुछ तबियत खराब है बेझिझक बता दो।

वह बोली नहीं बस दादी, मम्मी-पापा सबकी बहुत याद आ रही है।

तो है न ये दादी बता क्या करुं जो मेरी बेटी खुश हो जाए।

दो चार दिन में ही वह दादी से खूब हिल मिल गई कभी उनसे पुराने किस्से सुनती कभी अपनी दादी की बातें हैं सुनाती।

धीरे-धीरे सब मेहमान विदा हो गए और ये लोग भी घूम फिर कर वापस आ गए।अब तपन ने ऑफिस जाना शुरू कर दिया। अभी उसकी जॉब नहीं लगी थी सो घर पर रहकर मम्मी जी का काम में हाथ बंटाती। दादी दादा जी का ख्याल वैसे ही रखती जैसे अपने दादा-दादी का रखती थी।

सब उसके व्यवहार से खुश थे। काम जरूर ज्यादा नहीं आता था पर जो आता था उसे मनोयोग से करती। उसने देखा यहां भी उसके घर की तरह ही दादा-दादी को बहुत प्यार और सम्मान से रखा जाता है। कोई भी नया काम करने से पहले उन्हें बताया जाता उनकी राय पूछी जाती इससे उन्हें परिवार में अपने अस्तित्व की सन्तुष्टि मिलती ।वो बात अलग है कि उनकी राय आजकल के हाइटेक जमाने में फिट नहीं बैठती

सो उन्हें समझाया जाता कि अब काम नये तरिके से होते हैं और वे मान जाते।उनका खाना -पीना भी सबके साथ डाइनिंग टेबल पर ही होता उन्हें अलग कमरे में नहीं दिया जाता जैसा कि उसने अपनी सहेली के घर देखा था उसकी दादी को कमरे में थाली दे दी जाती थी और उसमें पूरा खाना जो बना होता था,वह भी नहीं होता था। केवल रोटी और सब्जी ही दी जाती थी। उनके ऊपर कोई रोक -टोक  नहीं थी वे घर में कहीं भी आ -जा सकते थे,

बैठ सकते थे । दादा-दादी बड़े ही खुश रहते, सबके साथ बैठकर बातें करते, अपने जमाने के किस्से सुनाते। वे मन से मम्मी जी एवं पोत बहू को ढेरों आशीर्वाद देते। कहीं बाहर जाते समय भी पहले उनकी सुख -सुविधा के बारे में सोचा जाता। जहां जा रहे हैं वहां वे कोई कठिनाई अनुभव न करें ।

उनकी खुशी, संतुष्टि उनके चेहरे से झलकती। अपनी मित्रमंडली में वे अपने परिवार का दिल से गुणगान करते।

एक दिन वह बोली मम्मी जी दादा-दादी जी कितने खुश रहते हैं ।

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हां बेटा उनकी खुशी से ही हमारे परिवार में खुशियां हैं , अमन चैन है। बड़ों का साया सिर पर बना रहे इससे ज्यादा और क्या चाहिए। उनके अनुभव हमारा मार्गदर्शन करते हैं ठीक है पीढीयांन्तर की वजह से कभी -कभी  उनकी सोच हमसे नहीं मिलती, टोका टाकी भी करते हैं तो हमें इसे अन्यथा नहीं लेना चाहिए वे हमारी भलाई ही सोचते हैं। इसलिए हमें उनका पूरा ध्यान रखना चाहिए। उनकी आत्मसंतुष्टि ही हमरा सबसे बड़ा धन है। हमारे घर में  उनके कारण ही भगवान का वास है  उनके आशीष बचन ही हमारे सुख एवं वैभव के कारण हैं ।

हां मम्मी जी उन्होंने भी तो अपने जीवनकाल में अपने बच्चों के लिए

 क्या -क्या नहीं किया।कितने संघर्ष झेले होंगें तब अपने बच्चों को योग्य बना पाए 

होंगे ।अब  उनके जीवन के संध्याकाल में हमारी बारी है उनका ध्यान रखने की।

हां बेटी तू सही कह रही है माता-पिता संतान के लिए क्या कुछ नहीं करते अपनी जरूरतों को नजर अंदाज कर बच्चों की सुख-सुविधाएं पहले जुटाते हैं और जब उन्हें बच्चों के सहारे की जरूरत होती है तब बच्चे यदि उनसे मुंह मोड़ लेते हैं तो उनका दिल टूट जाता है और वे बहुत दुखी होते हैं वे अपने बच्चों को कोस तो नहीं सकते किन्तु टूटे, दुखी मन से जो हाय निकलती है ऐसे बच्चों को कभी सुखी नहीं रहने देती।

ऐसे ही हंसी खुशी समय व्यतीत हो रहा था। उसने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन कर रखा था।चार माह हो गये थे कहीं से कोई जबाब नहीं आया था। और देखो आया तो एक साथ तीन -तीन 

कम्पनीज से आ गया।अब सब सोच रहे थे कि कहां ज्वाइन करना ठीक रहेगा।एक तो वही कम्पनी थी जहां तपन कार्य करता था सो सबकी एक राय यही बनी कि तपन के साथ आने -जाने में सुविधा रहेगी सो इसी कम्पनी में ज्वाइन करना चाहिए।

अब उसकी दिन चर्या बदल गई  थी।वह सुबह मम्मी जी के साथ चाय नाश्ता टिफिन बनाने में मदद करती और फिर निकल जाती।शाम को आकर भी जो उससे बना पड़ता करती।

आपसी सहयोग एवं मदद से सारे काम सुचारू रूप से चल रहे थे और पूरा परिवार हंसते मुस्कुराते जीवन यापन कर रहा था। तीन पीढ़ियां एक साथ सुखद अनुभवों के साथ जी रहीं थीं।

 

शिव कुमारी शुक्ला 

11-11-24

स्व रचित मौलिक एवं अप्रकाशित

जिस घर में बुजुर्ग हंसते मुस्कुराते*****

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