पूरा घर फूलों की लड़ियों और रंग-बिरंगी बिजली की झालरों से सजा हुआ था बेला और गुलाब के फूलों की महक से पूरा वातावरण सुगंधित हो रहा था। चारों ओर खुशियों का माहौल दिखाई दे रहा था हो भी क्यों ना!!आज ठाकुर प्रताप सिंह के बेटे की शादी थी। ठाकुर प्रताप सिंह की पत्नी सुजाता अपनी बहू के स्वागत की तैयारियों में लगी हुई थीं थोड़ी देर में ही बारात आने वाली थी।तभी सुजाता को अपनी सास बड़ी ठकुराइन की कड़कदार आवाज सुनाई दी अरे बहू तुम्हारे सिर पर पल्लू क्यों नहीं है?
इस हवेली की परम्पराओं को तुम भूल गईं हो क्या!?अभी मैं जिंदा हूं मेरे जीते-जी हवेली की परम्पराओं को सबको मानना पड़ेगा यह तुम अच्छी तरह जानती हो तुम्हारा बेटा बहू लेकर आ रहा है इसलिए मैंने तुम्हें घुंघट न करने की इजाजत दे दी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं की तुम अपने सिर से पल्लू ही हटा दो आज के बाद ऐसी ग़लती नहीं होनी चाहिए वरना ठीक नहीं होगा कहीं बुढ़ापे में तुम्हें इस हवेली से निकलना न पड़ जाए”।सुजाता ने जल्दी से अपने सिर का पल्लू ठीक किया सुजाता की दोनों जेठानियों ने भी जल्दी से अपने पल्लू ठीक करने लगीं
सुजाता ने किसी की ओर नहीं देखा उसकी आंखों में आंसू थे वो वहां से सीधे हवेली के मंदिर में चलीं गईं। वहां पहुंचकर उन्होंने सिर झुकाकर भगवान को प्रणाम किया और कहा ईश्वर मुझे शक्ति दीजिए जिससे मैं अपने प्रण को पूरा कर सकूं जो मैं सहा है वो मैं अपनी बहू को नहीं सहने दे सकती। फिर वहीं बैठकर अतीत की गहराइयों में उतरती चली गई,,,,,,,,,,,ठाकुर प्रताप सिंह तीन भाई थे तीनों का अपना बिजनेस था।इस परिवार की शहर में अमीर और प्रतिष्ठत लोगों में गिनती होती थी।
इस खानदान पर लक्ष्मी की असीम कृपा थी घर में धन-संपत्ति का अंबार था। परन्तु इस घर में बहुओं को कुछ कहने की स्वतंत्रता नहीं थी।ऐसा नहीं था कि, इस घर में बहुओं पर कोई अत्याचार होता था।इस हवेली की बड़ी ठकुराइन ठाकुर प्रताप सिंह की माता जी के विचारों के कारण हवेली की बहुओं पर कठोर बंधन लगे हुए थे।इस हवेली की बहूओं पर शारीरिक अत्याचार नहीं होता था पर मानसिक रूप से वे स्वतंत्र नहीं थीं।क्योंकि बड़ी ठकुराइन पुरानी परंपराओं को मानती थीं।उनके विचार से घर की औरतों को पुरूषों की बराबरी नहीं करनी चाहिए,
पति की प्रत्येक आज्ञा को मानना पत्नी का कर्तव्य है, औरतों को बहस नहीं करना चाहिए, उन्हें जोर से हंसना नहीं चाहिए, उन्हें परदे में रहना चाहिए, उन्हें घर के किसी भी फ़ैसले पर अपनी राय नहीं देनी चाहिए, और सबसे बड़ी बात अपने से बड़ों की हर बात सिर झुकाकर चुपचाप मान लेनी चाहिए।हवेली में बड़ी ठकुराइन जी ने बहूओं के लिए जो नियम बनाए थे उन्हें मानना उनकी मजबूरी थी क्योंकि बड़ी ठकुराइन बात- बात पर अपने बेटों से यह कहती थीं कि, तुम हमारे बेटे हो मैंने तुम्हें जन्म दिया है इसलिए तुम्हें और तुम्हारी पत्नियों को मेरी बात माननी पड़ेगी।
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पूरी हवेली पर बड़ी ठकुराइन का दबदबा था उनके तीनों बेटे उनकी हर आज्ञा का पालन आंख बंद करके करते थे तो उनकी पत्नियों के विरोध का प्रश्न ही नहीं उठता था।ठाकुर प्रताप सिंह के दोनों बड़े भाइयों की शादियां हो गई थीं उनके बच्चे भी बड़े हो रहे थे। फिर भी घर में बड़ी ठकुराइन का ही शासन था वह अपने पोतो पर भी अपना हुकूम चलातीं थीं।ठाकुर प्रताप सिंह की पत्नी सुजाता को अपनी सास (बड़ी ठकुराइन)की दकियानूसी सोच से चिढ़ थी।
सुजाता जी ने कई बार अपनी जेठानियों से इस विषय पर बात करने की कोशिश की भाभी हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए नहीं तो हम जीवन भर कठपुतलियों की तरह मां जी के इशारों पर नाचते रहेगें और आगे चलकर हमारी बहुओं को भी यहीं सब सहना पड़ेगा पर उन लोगों ने बड़ी ठकुराइन के डर से सुजाता जी की बात नहीं मानी।सुजाता की बड़ी जेठानी ने कहा कि”हमें तुम्हारी बातों में आकर अपने अच्छे भले जीवन में आग नहीं लगानी है। हमें जो एशो-आराम का जीवन मिला है उसके बदले हम को यह पाबंदियां मंजूर हैं
तुम्हारी बात मानकर हम अपने हंसते खेलते जीवन में आग नहीं लगाना चाहते अपनी क्रांतिकारी सोच तुम अपने पास रखो अगर हमने मां जी का विरोध किया तो वे हमारा जीवन नर्क से भी बत्तर बना देगी ऐसा भी हो सकता है कि,वे हम लोगों को हमेशा के लिए इस हवेली से बाहर निकाल दें इसलिए हम लोग भूलकर भी ऐसी ग़लती नहीं करेंगे तुम आज के बाद हम लोगों को मां जी के खिलाफ भड़काने की कोशिश न करना” सुजाता की जेठानियों ने गुस्से में कहा अपनी जेठानियों की बातें सुनकर सुजाता जी हैरान रह गई।
पर सुजाता जी ने हार नहीं मानी और कुछ बातों का विरोध करने लगी पर उनके विरोध का नतीज़ा उनके लिए घातक सिद्ध हुआ वो बड़ी ठकुराइन की आंखों की किरकिरी बन गई। बड़ी ठकुराइन बहुत ही शातिर औरत थीं उन्होंने एक शातिराना चाल चली ठकुराइन ने सुजाता के विरोध को अपने सम्मान पर ले लिया और अनशन पर बैठ गई उन्होंने खाना पानी छोड़ दिया और अपने को अपने कमरे में बंद कर लिया जब उनके बेटों ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने अपने बेटे प्रताप से कहा कि, तुम्हारी पत्नी ने मेरा अपमान किया है
अब तुम्हें मां और पत्नी में से एक को चुनना होगा अगर तुम्हें अपनी मां से प्यार है तो अपनी पत्नी को हमेशा के लिए उसके मायके भेज दो वरना मैं ये हवेली छोड़कर चली जाऊंगी” !!? मां की बात सुनकर ठाकुर प्रताप असमंजस में आ गए उन्होंने अपनी मां को समझाने की कोशिश की। क्योंकि वह जानते थे कि, सुजाता की इतनी गलती नहीं है जितनी उसकी मां बता रहीं हैं पर बड़ी ठकुराइन कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थीं ठाकुर प्रताप के समझाने के बाद बड़ी ठकुराइन इस बात पर तैयार हुई की सुजाता उनके सामने घुटने टेक कर माफ़ी मांगे
और वादा करे की वो उनका विरोध नहीं करेगी”। अपनी मां की ज़िद्द के आगे ठाकुर प्रताप हार गए और उन्होंने सुजाता को समझाते हुए कहा कि तुम मां से माफ़ी मांग लों और उनसे कहो कि, अब तुम उनकी किसी बात का विरोध नहीं करोगी अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो मजबूरन मुझे अपनी मां का साथ देना पड़ेगा। क्योंकि हम तीनों भाइयों ने अपने मरते हुए पिता को यह वचन दिया था कि, हम लोग अपनी मां को जिंदगी में कभी दुःख नहीं देंगे। सुजाता मैं मां के स्वाभाव को तो बदल नहीं सकता पर तुम्हें कह सकता हूं कि, तुम ही अपने आपको बदल लो वरना लोग
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तुम्हारे ही संस्कारों पर उंगली उठाएंगे तुम्हें ये हवेली छोड़कर जाना पड़ेगा तुम मेरे बच्चे की मां बनने वाली हो।उस समय सुजाता मां बनने वाली थी इसलिए उसने अपने पति की बात मानते हुए बड़ी ठकुराइन से माफ़ी मांग लीं। बड़ी ठकुराइन ने ऊपरी तौर से माफ़ तो कर दिया पर उसके बाद बड़ी ठकुराइन जब भी मौका मिलता सुजाता का अपमान करने से बाज़ नहीं आती।घर के बाकी लोगों से सुजाता को प्यार और सम्मान मिलता था इसलिए वह भी बड़ी ठकुराइन की बातों पर ध्यान नहीं देती थीं।
पर उस दिन सुजाता ने अपने आपसे एक वादा किया था कि वह अपनी बहू को हवेली की दकियानूसी परंपराओं की बेड़ियों में नहीं बंधने देगी।वह अपनी बहू को मन की आजादी देंगी वह आगे की पीढ़ी के लिए इन सड़े गले बीजों की फसल नहीं उगाएगी वह नए बीजों से नई फसल रूपी संस्कारों को उगाने का काम करेंगी। जिससे आने वाली पीढ़ियों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अपने बड़ों से डरना न पड़े।वह खुलकर अपनी बातों को कह सकें और ग़लत बातों का विरोध भी करें।सुजाता ने अपने बेटे को भी ऐसे ही संस्कार दिए थे
सुजाता के बेटे ने अपनी मां की भावनाओं का हमेशा सम्मान किया उसने अपनी मां से वादा किया था कि वो इस हवेली में उनका छिना हुआ मान सम्मान वापस दिलवाएगा सुजाता जी के बेटे को पता था की उसकी मां को दकियानूसी सोच और कुप्रथाओं से नफ़रत है। बहुरानी आप यहां बैंठी हैं बड़ी बहुरानी आप को बुला रही हैं बारात आने वाली है हवेली के पुराने नौकर शंभू की आवाज से सुजाता की तंद्रा भंग हुई वह अतीत से वर्तमान में लौट आईं।शंभू काका आप चलिए मैं आ रहीं हूं सुजाता ने कहा,आज इतने वर्षों बाद सुजाता को वह मौका मिलने वाला था कि,
वह अपनी बहू का खुले दिल और विचारों से स्वागत करें। आज उसे किसी का डर नहीं था क्योंकि उसका बेटा उसके साथ था।सुजाता ने आत्मविश्वास से मुस्कुराते हुए भगवान की और देखा जैसे वह कह रही हो कि, आप को मेरा साथ देना होगा, क्योंकि मैं आज एक नई फसल का बीजारोपण करने जा रही हूं। फिर वह आत्मविश्वास के साथ आरती का थाल लेकर मंदिर से बाहर आ गई।
सुजाता जी आरती का थाल लेकर सीधे हवेली के बाहर आईं वहां बारात आ चुकी थी उनका बेटा और बहू कार में बैठे थे सुजाता जी ने दोनों की आरती उतारी और कार का दरवाजा खोलकर अपनी बहू को बाहर निकाला बहू ने लम्बा घुंघट निकाल रखा था सुजाता जी ने अपनी बहू के घुंघट को उलटते हुए कहा,” बहू तुम्हें आज के बाद घुंघट में रहने की जरूरत नहीं है पर्दा घुंघट से नहीं नजरों से होता है तुम सर पर पल्लू रखना बस इतना काफी है तुम इस घर की बहू हो गुलाम नहीं तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें भी बहुत प्यार दुलार से पाला है
जैसे मैंने अपने बेटे को प्यार दिया है आज के बाद तुम्हें भी मैं उतना ही प्यार और सम्मान दूंगी जितना अपने बेटे को देती हूं तुम अपने मन की हर बात और इच्छा मुझसे बेझिझक कह सकती हो जैसे अपनी मां से कहती थीं अब आगे बढ़कर चालव के कलश को अपने पैरों से गिराकर अपने जीवन की नई शुरुआत करो” सुजाता की बात सुनकर वहां खड़े सभी लोग आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे सुजाता की जेठानियों के चेहरे पर डर और घबराहट दिखाई दे रही थी ठाकुर प्रताप का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था तभी बड़ी ठकुराइन की कड़कदार आवाज सुनाई दी
” सुजाता बहू तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या जो तुमने पूरे समाज और रिश्तेदारों के सामने नई बहू का घुंघट हटा दिया क्या तुम्हें पता नहीं है की हमारे खानदान की नई बहुएं घुंघट में रहतीं हैं आज तुमने हमारे खानदान की मान मर्यादा को मिट्टी में मिला दिया है मैं तुम्हें इसके लिए माफ़ नहीं करूंगी “
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” दादी जी आज तक आपने जैसा चाहा वैसा आपकी तीनों बहूओं ने किया और आप के बेटों ने आपका की हर जायज़ नाजायज़ बातों का समर्थन किया तो आज के बाद मेरी मां भी जैसा चाहेंगी वैसा उनकी बहू करेगी और मैं अपनी मां का साथ दूंगा क्योंकि ये संस्कार मुझे इसी खानदान से मिला है ” तभी आगे बढ़कर सुजाता के बेटे ने गम्भीर लहज़े में अपनी दादी से कहा अपने पोते की बात सुनकर बड़ी ठकुराइन के चेहरे पर आश्चर्य फ़ैल गया क्योंकि आज वे खुद अपने बनाएं जाल में फंस गईं थीं।
अपने बेटे की बात सुनकर सुजाता के चेहरे पर एक गर्वीली मुस्कान फैल गई उन्होंने अपनी जेठानियों की तरफ देखकर गम्भीर लहज़े में कहा ” दीदी आप दोनों इस घर की बड़ी बहूएं हैं लेकिन आपने बड़ी बहू होने का फर्क कभी नहीं निभाया अगर आप लोगों ने गलत बात का विरोध किया होता तो आज आपके बहू बेटे भी आपके साथ होते बड़ों की अपनी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं तभी उन्हें बड़ों का सम्मान मिलता है जो अपने स्वार्थ के लिए जीते हैं उन्हें वो सम्मान कभी नहीं मिलता जो उन्हें मिलना चाहिए आप दोनों ने सिर्फ अपने बारे में सोचा ये बड़प्पन की निशानी नहीं है
यही कारण है आपकी बहूएं मन से आपका सम्मान नहीं करतीं क्योंकि आपने उन्हें भी वही बस सहने के लिए मजबूर किया जो गलत था जो कदम आज मैंने उठाया है वो आप दोनों को बहुत पहले उठाना चाहिए था लेकिन आप इस खानदान की बड़ी बहूएं नहीं कठपुतलियां बनकर रह गई अभी भी देर नहीं हुई है आगे आप दोनों की मर्जी अब निर्णय आप दोनों को लेना है मैंने तो ले लिया” इतना कहकर सुजाता ने आत्मविश्वास भरी मुस्कुराहट के साथ एक नज़र अपनी सास, जेठानियों और पति पर डाली फिर अपने बहू बेटे के साथ आगे बढ़ गई।
मेरी यह कहानी अगर आप लोगों को पसंद आए तो कमेंट्स ज़रूर कीजिएगा आप सभी का आभार और धन्यवाद।
डॉ कंचन शुक्ला
स्वरचित मौलिक सर्वाधिकार सुरक्षित अयोध्या उत्तर प्रदेश
26/2/2025
#बड़ी बहू