बचुआ! इक छोटा-सा ‘मुबैल’ हमें भी दिला दो.. – उमा महाजन : Moral Stories in Hindi

 आज शनिवार है। पूरे एक हफ्ते बाद दादी पहले वाली दादी बन गई हैं। इतनी कड़कती ठंड में भी , पापा के मना करने के बावजूद, उन्होंने सुबह-सुबह अपना बिस्तर छोड़ दिया और नहा-धोकर, हाथ में माला लेकर वे पुनः अपने बिस्तर में विराजमान हो गईं और अपनी चिर-परिचित ऊंची आवाज में बहू को इतनी देर तक चाय न मिलने का उलाहना दे दिया।

माँ  ने तुरत- फुरत चाय बना कर उनके हाथ में पीतल का गिलास पकड़ाया तो उन्होंने माँ को उनके हाथ जलाने और साथ में रुमाल न देने के लिए डांट दिया।मां  के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई थी कि दादीी ने फिर से उन्हें चाय में चीनी कम होने का उलाहना दे मारा। माँ,पापा को मुस्कुराते देख कर,स्वयं भी मुस्कुराते हुए, रसोईघर में चीनी लेने चली गईं।

      असल में पिछले शनिवार को, अपने लाड़ले पोते रोहन के विदेश चले जाने पर दादी एकदम गुमसुम हो गईं थीं।उस दिन न कुछ खाया,न पीया और न ही किसी से कोई बातचीत ही की ,बस छत की ओर देखते हुए बिसूरती रहीं। सबने बहुत समझाया कि रोहन अपना भविष्य संवारने गया है लेकिन वे लगातार रोती रहीं। फिर एकाएक न जाने क्या हुआ कि उनकी मोबाइल के प्रति चिड़चिड़ाहट प्रकट होने लगी। 

      वैसे तो यह उनकी लंबे समय से शिकायत थी कि हर समय हाथ और जेब में मुबाइल रखना सिर्फ अमीरी और दिखावे के चोंचले हैं। घर में जितने लोग उतने मुबाइल-सिर्फ पैसे की बरबादी है। पोते-पोती के अलावा उनके अपने बेटे ने भी उन्हें समझाने की कोशिश कि माँ इसके बहुत फायदे हैं। हम सब दूर रह- रहकर भी आपस में जुड़े रह सकते हैं।

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अब चिट्ठी-पत्रियों का जमाना नहीं है और लैंड लाइन फोन तो हर जगह पर नहीं होते न, लेकिन मोबाइल पास में रहने से हम कभी भी, कहीं से भी, किसी को भी फोन कर सकते हैं या संदेश भी भेज सकते हैं। इसके अलावा भी हम इससे हर तरह की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। किंतु दादी माँ का एक ही जवाब होता

कि यह सब बहाने  तुम लोगों के हम बुजुर्गों से दूर- दूर रहने के चोंचलें हैं। इस ‘मनहूस मुबैल’ के कारण अब कोई मेरे पास बैठना पसंद नहीं करता और यदि बैठता भी है तो मुझसे बात कम और ‘मुबैल’ पर उंगलियां अधिक चलाता है।         

       लेकिन रोहन के जाने के बाद से तो दादी परिवार में जिस किसी के हाथ में मोबाइल देखतीं,भड़क उठतीं।उनके अनुसार इस ‘निगौड़े मुबैल’ ने ही रोहन को विदेश जाने का रास्ता दिखाया था । वह सारा- सारा दिन अपने बाप के साथ इस पर कुछ न कुछ ढूँढता रहता था और फिर सहसा सब को छोड़ कर विदेश चला गया।

अगली सुबह, जब उन्होंने अपनी पोती को हाथ में मोबाइल लिए अपने कमरे से बाहर निकलते हुए देखा तो ‘सुबह के संदेश भेजने के चोंचलों’ पर  ऐसी डांट पिलाई कि बेचारी के ‘गुडमोर्निग मैसेजज’ धरे के धरे रह गए। उनका कहना था कि इस ‘नासपीटे मुबैल’ के ही कारण वह घर गृहस्थी के कार्यों में ध्यान नहीं देती है। यहां तक कि परसों सुबह,

सब्जी में थोड़ा नमक कम होने पर ,उन्होंने माँ को भी, रसोईघर में हमेशा हाथ में ‘मुबैल’ रखने पर खरी-खोटी सुना दी थी। मैं तो इस मामले में बहुत सतर्क हो गया था।

      आज रोहन की, ‘वीडियो कॉल’ के जरिए, परिवार के सभी सदस्यों के साथ बातचीत करने की योजना थी। कल रात, जब मैंने दादी को इस बारे में बताया कि सुबह वे मोबाइल पर रोहन को सामने से चलते-फिरते देख पाएंगी, तो वे हैरान रह गईं। सारी रात उन्होंने करवटें बदलते हुए बिताई और आज मुंह अंधेरे ही उठ गईं।

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     पापा के मोबाइल की घंटी बजते ही दादी एकदम सीधी हो कर बैठ गईं। जैसे ही उन्हें मोबाइल स्क्रीन पर रोहन दिखाई दिया, वे झरझर बह उठीं। रोहन दादी-दादी पुकारता रहा ,हम सब बोलते-सुनते रहे, लेकिन दादी सिर्फ टप-टप रोते हुए उसकी बलाएं लेती रहीं। कॉल समाप्त हो गई,  दादी  सन्न रह गईं । सब लोग प्रसन्न मन से उठकर अपने- अपने कामों में व्यस्त हो गए । पापा भी उठने लगे। तभी दादी ने, धीरे से फुसफुसाते हुए, अपने पोपले मुंह से, पापा के सामने एक फरमाइश रखी,

    ‘बचुआ ! इक छोटा-सा ‘मुबैल’ हमें भी दिलवा दो।’

  ‘अच्छा माँ’ कहते हुए बेटे के मुख पर मुस्कान आ गई।

 

उमा महाजन 

कपूरथला 

पंजाब।

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