” भाई साहब हमे तो आपकी बेटी बहुत पसंद आई। जैसी बहू की हमने कल्पना की थी बिल्कुल वैसी है आपकी काशवी!” अपने बेटे के लिए लड़की देखने आई मधु जी लड़की यानी की काशवी से मिलकर बोली।
” जी बहनजी ये तो बहुत अच्छी बात है अब काशवी की मां तो है नही सास के रूप में मां मिल जायेगी इसे बस आप लोग सक्षम बेटा से पूछ लो उन्हे ये रिश्ता मंजूर हो तो बात आगे बढ़ाएं !” काशवी के पिता सचिन बोले।
” अंकल कोई भी फैसला लेने से पहले मैं काशवी से अकेले में बात करना चाहूंगा अगर आपकी इजाजत हो तो?” सक्षम सचिन से बोला।
” बिल्कुल बेटा जाओ काशवी सक्षम को बाहर गार्डन में ले जाओ !” सचिन बोले तो काशवी सक्षम के साथ चल दी।
चलिए कहानी को आगे बढ़ाने से पहले आपको थोड़ा सा अपने पात्रों से मिलवाते हैं।
सचिन जी काशवी और किंशुक के पिता जिनकी पत्नी का कुछ साल पहले स्वर्गवास हो गया था। उन्होंने अपने बच्चों को खुद से पाला और उच्च शिक्षा के साथ साथ अच्छे संस्कार भी दिए हैं । काशवी एमबीए करके एक एमएनसी फर्म में नौकरी करती है। किंशुक की शादी हो चुकी है और वो और उसकी पत्नी सचिन जी का एक्सपोर्ट का बिजनेस संभालते है
जिसके लिए वो फिलहाल लंदन गए हुए हैं। दूसरी तरफ सक्षम अपने माता पिता का इकलौता बेटा जो सॉफ्टवेयर इंजीनियर है अच्छी खासी नौकरी है उसके पिता का अपना व्यापार है। कुल मिला कर दोनो परिवार टक्कर के हैं।
ये है दोनो परिवारों का संक्षिप्त परिचय..!
चलिए अब सक्षम और काशवी के पास गार्डन में चलते हैं।
” देखो काशवी आप अपने भावी जीवनसाथी में क्या चाहती हो वो मुझसे कह सकती हो अगर मैं आपकी कसौटियों पर खरा उतरूं तभी आप हां बोलना !” गार्डन में आ सक्षम बोला।
” सक्षम मैं ज्यादा कुछ नही चाहती बस मेरे लिए मेरे पापा भाई भाभी सब कुछ है और मैं यही चाहती हूं मेरा जीवनसाथी उनको उतना ही मान सम्मान दे जितना अपने परिवार को देता है !” काशवी ने अपने दिल की बात कही।
” बहुत अच्छी बात है ये तो कि आप अपने परिवार को इतनी एहमियत देती हैं उम्मीद है शादी के बाद ससुराल पक्ष के लोगों को भी वही मान सम्मान देंगी !” सक्षम बोला।
” जी बिल्कुल !” काशवी बोली कुछ और औपचारिक बातों के बाद दोनो बैठक में आ गए।
दोनो बच्चों की हां होते ही रिश्ता पक्का कर दिया गया और शादी का मूहर्त भी जल्द ही आ गया।
” फेरों और सात वचनों की रस्म पूरी हुई वर और कन्या अपना स्थान ग्रहण करें!” सात फेरे होते ही पंडित जी बोले।
” रुकिए पंडित जी अभी आठवां फेरा और आठवां वचन बाकी है !” सक्षम पंडित जी की बात सुनकर बोला।
सक्षम के ऐसा बोलते ही जनवासे में खुसर फुसर शुरू हो गई …भला आठवां फेरा या आठवां वचन भी होता है कही।सबकी जुबान पर बस यही बात थी।
” बेटा फेरे और वचन बस सात ही होते है यही शास्त्रों में लिखा है यही सनातन से चला आ रहा है !” पंडित जी सक्षम से बोले।
” पंडित जी ये सात फेरे तो हमने एक दूसरे को सात वचन देकर लिए है जो हमारे आने वाले जीवन मजबूरी प्रदान करेंगे एक पति पत्नी के रूप में !” सक्षम बोला काशवी भी थोड़ा सा असमंजस में थी कि सक्षम कहना क्या चाहता है।
” हां तो आप दोनो पति पत्नी के रिश्ते में बंध रहे हैं तो एक दूसरे को ही तो सात वचन देंगे !” पंडित जी बोले।
” पंडित जी हम पति पत्नी के रिश्ते में बंधने के साथ और भी कई रिश्तों में बंध रहे हैं मेरी पत्नी किसी की बहू भी होगी और मैं किसी का दामाद भी तो मैं आठवां वचन अपनी पत्नी को ये देता हूं कि जैसे तुम मेरे मां बाप की सेवा करोगी उनका ध्यान रखेगी उनकी बेटी बनकर रहोगी वैसे ही मैं भी तुम्हारे पिता का बेटा बनकर उनका ख्याल रखूंगा।
साथ ही तुमसे ये वचन चाहता हूं कि जीवन के किसी मोड़ पर तुम्हारा मेरे माता पिता से मतभेद भी हो तो भी मुझे उनसे अलग होने को या उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ने को नही कहोगी ना उनसे दुर्व्यवहार करोगी और अगर तुम्हारे पिता को कभी किसी मोड़ पर जरूरत हो तो वो अपने इस बेटे के पास बेझिझक आ सकते हैं हमारा घर जितना हम सबका होगा उतना उनका भी होगा। क्या तुम इस अग्निकुंड को साक्षी मान मुझे ये वचन देकर आठवां फेरा लोगी मेरे साथ ?” सक्षम ने ये बोल काशवी से पूछा।
” पर सक्षम जब हमारी बात तभी हो गई थी कि हम दोनो परिवारों को मान देंगे फिर अब ये सब !” काशवी ने सक्षम से कहा।
” काशवी मैंने अपने दोस्तों की पत्नियों को देखा है उनके माता पिता से दुर्व्यवहार करते मेरे दोस्त इसके लिए परेशान भी रहते हैं ऐसा कुछ मैं अपने घर में नही चाहता और इस आठवें फेरे को निभा सको तभी लेना ये फेरा वरना तुम मेरी पत्नी तो बन जाओगी पर अर्धांगिनी नही !” सक्षम बोला।
” मुझे आपका आठवां फेरा मंजूर है सक्षम जिंदगी के किसी मोड़ पर आपको लगे मैं ये वचन नही निभा पा रही तो ये फेरा और इससे जुड़ा वचन टूटते ही मेरा आप पर कोई हक नही रहेगा !” ये बोल काशवी आठवें फेरे के लिए बढ़ गई।
मंडप में बैठे हर इंसान की आंख नम हो गई। सक्षम के मां बाप की आंख में खुशी के आंसू से उनका बेटा तो उनका था ही अब बहू के रूप में बेटी भी मिल गई थी। वही काशवी के पिता ऐसा दामाद पाकर खुद को भाग्यशाली समझ रहे थे।।
आज पूरा मंडप गवाह था उस आठवें फेरे का जिसने रिश्तों की एक नई परिभाषा गढ़ी थी साथ ही केवल दो दिल नही दो परिवारों को एक किया था।
आपकी दोस्त
संगीता