“माई! सरदार जी आये हैं, तुम्हें ढूंढ रहे हैं”
“कौन सरदार जी?”
“वही गुरुद्वारे वाले, जो कभी कभी भंडारा रखते हैं”
इतने बड़े आदमी को मुझ गरीब औरत से क्या काम आन पड़ी, या कुछ गलती हो गई हमसे। मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था।
“अच्छा सुन तू ये भात उतार लेना, मुन्ना आता होगा स्कूल से, मैं जाकर देखती हूँ”
दरवाजे के बाहर उनकी गाड़ी लगी थी, मगर धीर गंभीर सरदार जी अकेले ही आये थे। मैं डरते डरते पहुंची
“जी सरदार जी, नमस्ते, मुझसे.. कोई काम था.!”
हां..आप ही से मिलने आया हूँ”
प्लास्टिक की एकमात्र कुर्सी मैंने उन्हें बैठने को दे दी। और बिटिया को पानी लाने के लिए आवाज लगाई।
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“इसी बिटिया की शादी कर रही हैं आप”?
“जी..अच्छा लड़का और अच्छा घर मिला है..पर आपको कैसे पता चला?
मैंने आश्चर्य से उन्हें देखकर पूछा तो वे उसी गंभीरता से बोल पड़े
“कल साहू जी की दुकान पर मैं भी था.. जब आप उसे बता रही थी, और कुछ पैसे मांग रही थी”
हालांकि सरदार जी ने झिझकते हुए कहा, पर फिर भी शर्मिंदा हो गई थी मैं, कल साहू के साथ बातचीत को याद कर।
“साहू जी, बिटिया की शादी है, कुछ पैसे उधार चाहिए, कुछ ही महीनों के लिए, सब इंतेजाम तो हो गया है, बस बारात के दिन खाने पीने और उनकी स्वागत के लिए”
ना सिर्फ उसने मना कर दिया था बल्कि ये कहा था कि
“पति तो अब रहा नहीं तुम्हारा, और बेटा इतना छोटा है..दो चार घरों में काम करती हो, ये पच्चीस हजार रुपये लौटाओगी कैसे, वो भी सूद के साथ?”
“क्या सोचने लग गई आप”?
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“जी कुछ नहीं, आपने सही सुना था। पति के जाने के बाद, दो चार घरों में काम पकड़ा है, उनसे कुछ मदद मिली नहीं, साहू जी से पुराना जान पहचान था, तो सोचा था..पर”
सरदार जी बीच में ही बोल पड़े
“देखिए, आप फिक्र मत कीजिये, हम उस दिन गुरुद्वारे में भंडारा करने वाले थे..पर उस दिन वो भंडारा आपकी तरफ से यहां आपके घर रख देंगे”
उनकी इस सोच पर बरबस ही मुँह से निकल पड़ा
“आप मुझ गरीब के लिए इतना कुछ..सरदार जी?”
ना जाने क्यों..सरदार जी की आँखें भर आईं
“आपकी कल की बेबसी में, मुझे अपनी माँ की मजबूरी दिखाई दी थी… आपका आज, हमारी माँ का भोगा हुआ अतीत है..!
विनय कुमार मिश्रा