*असीम प्यार* – बालेश्वर गुप्ता : Moral Stories in Hindi

  इतनी बड़ी बात मुझसे छिपा ली।राजू एक बार कम से कम एक बार तो बताया होता।इतना बड़ा कदम उठा लिया,और मुझे पता भी चलने नही दिया।

       अपने आप से बात करते करते जगदीश प्रसाद जी रो पड़े।उनके आंसू रुकने का नाम ही नही ले रहे थे।

        जगदीश प्रसाद जी एक मध्यम वर्ग के सामान्य व्यापारी थे।घर मे खाने पीने की कोई कमी नही थी,पर रईस की श्रेणी में वे नही आते थे।इतना जरूर हुआ कि उनका बेटा राजू अपनी शिक्षा पूरी कर एक स्थानीय बड़ी फैक्टरी में जॉब पा गया।इस कारण घर की आय भी बढ़ गयी

और साथ ही बेटे को अपना नगर छोड़ कर नौकरी के लिये बाहर नही जाना पड़ा।राजू अपनी माँ और पिता से बेइंतिहा प्यार करता था।उसे अपने पिता के संघर्ष के दिन याद थे,कैसे वे उसकी पढ़ाई के लिये फीस व खर्च वास्ते अलग से मुनीमगिरी करते थे।

       अब तो सब ठीक हो ही गया था।राजू की शिक्षा भी पूरी हो चुकी थी और वह कमाने भी लगा था।कुछ दिनों से जगदीश जी की तबियत खराब रहने लगी थी।दिन प्रतिदिन वजन कम होता जा रहा था।कमजोरी के कारण पलंग से उठने को उनका मन भी नही करता था।राजू उन्हें डॉक्टर के पास लेकर गया

भी,पर डॉक्टर की बताई दवाइयों के सेवन से भी कोई अंतर नही पड़ रहा था।राजू अपने पिता को लेकर हॉस्पिटल गया, जहां उनका बॉडी चेकअप किया गया।पता लगा कि जगदीश जी की दोनो किडनी खराब हो गयी हैं, यदि दूसरी किडनी ट्रांसप्लांट नही की गयी तो उनका बचना संभव नही होगा।

राजू ने अपने पिता से उनकी इस गंभीर बीमारी के बारे में न बता कर बस इतना बताया कि बाबूजी पेट मे हल्का सा इन्फेक्शन है,छोटा सा आपरेशन होगा और आप ठीक हो जायेंगे।पिता को घर छोड़ राजू ने डॉक्टर से नयी किडनी की उपलब्धता और खर्च के बारे में जानकारी ली।उसे बताया गया

कि सामान्यतः नई किडनी मिलने में समय लगता है और मिल भी जाये तो 20-25 लाख खर्च आ ही जाता है।सुनकर राजू भौचक्का रह गया।यह रकम जुटाना उनके लिये असम्भव था।फिर क्या किया जाये?सोचते सोचते रात बीत गयी।फिर एक निश्चय कर वह फिर होस्पिटल पहुंचा।

और डॉक्टर साहब से बात कर पिता के ऑपरेशन की तिथि निश्चित कर ली।राजू ने अपनी एक किडनी पिता को ट्रांसप्लांट कराने का निश्चय कर लिया था।उसने माँ को और डॉक्टर साहब को विश्वास में लेकर उनसे पिताजी को कुछ न बताने का वायदा ले लिया था।

        निश्चित तिथि को राजू अपनी मां व पिता को लेकर हॉस्पिटल पहुंच गया।पिता को एडमिट करा कर उसने पिता से कंपनी के काम से एक दिन के लिये बाहर जाने और ऑपरेशन के समय वापस आने का बहाना बना कर उसी होस्पिटल में एडमिट हो गया।पहले राजू का ऑपरेशन हुआ और फिर उसकी किडनी को जगदीश जी को ट्रांसप्लांट करने को उनका ऑपरेशन किया गया।जगदीश जी ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले राजू की राह देखते रह गये।माँ ने कहा कि आने में देर हो गयी होगी,आ जायेगा।ऑपेरशन सफल रहे।

        राजू द्वारा अपने पिता को किडनी देने की बात छुपने वाली तो थी नही,डॉक्टर साहब भी अति उत्साह में बयान दे बैठे कि कैसे एक बेटे ने अपने पिता को अपनी किडनी देकर उनकी जान बचायी है।ये बयान समाचार पत्रों में भी छप गया।जगदीश जी जैसे ही यह पता चला तो वे फूट फूट कर रोने लगे।वे बस यही बड़बड़ा रहे थे कि मुझसे छिपा कर इतना बड़ा कदम उठा लिया,मेरे बच्चे मेरी कितनी उम्र बची थी,जो तूने अपने को दांव पर लगा दिया?

       तभी राजू अपने पिता के पास आ गया,बोला बाबूजी बताओ तो क्या राजू आपका बेटा इतना गया गुजरा है जो आपको यूँ ही मरने को छोड़ देता?ना बाबू जी ना,ऐसी तो कल्पना भी नही हो सकती थी।आप पर सौ राजू कुर्बान बाबूजी।देखना आप सौ बरस जियेंगे।

      मेरा राजू कहते कहते जगदीश जी ने उसे गले लगा लिया और फिर सुबक पड़े।आंखों में पानी लिये माँ दोनो के मिलन को देख रही थी।

बालेश्वर गुप्ता,नोयडा

मौलिक एवम अप्रकाशित

*अंधेरे में रखना* मुहावरे पर आधारित लघुकथा:

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