अरमान निकालना – रंजीता पाण्डेय : Moral Stories in Hindi

रुचि ने अपने पति रोहित से पूछा  ,रोहित  मां पापा  का बहुत मन है , कुंभ जाने का ,मै ले के चली जाऊ क्या? आप  दो दिन मम्मी जी और पापा जी ,ध्यान रख लेते तो ठीक था ।

रोहित ने बोला पागल तो नहीं हो गई? किसी और के साथ भेज दो , उनका इतना मन है तो , तुमको जाने की क्या जरूरत है , यहां मम्मी पापा कैसे रहेंगे? उनकी दबा? उनका खाना ?

वैसे भी मेरी मम्मी के पैर मै बहुत दर्द रहता है।  तुमने सोचा भी कैसे?

रुचि रोती हुई कमरे में चली गई।रुचि की बेटी सब सुन रही थी , उसको अपने नाना , नानी के लिए बहुत बुरा लग रहा था । 

रात को सब खाना खाने  एक साथ बैठे थे, रुचि की बेटी ने बोला पापा ,आप और मम्मी अपने” सारे अरमान निकल  लो “सारे तीर्थ धाम अभी कर लो ।

रोहित ने बोला , अरे बेटा हम लोगों  की उम्र नहीं है ,अभी तीर्थ धाम करने की, जब हम बूढ़े हो जायेगे  तब जायेगे ।तुम ले चलना अपने बूढ़े मम्मी पापा को , हंसते हुए रोहित ने बोला।

नहीं पापा आप की सब इच्छाएं अधूरी रह जाएगी, बेटा तुम ऐसे क्यों बोल रही हो? क्यों की पापा मै आपकी बेटी हूं,बेटा नहीं हूं।

देखो आप बेटा हो ,तो दादी दादा जी को हर साल आप तीर्थ धाम करा लाते हो। नाना नानी कही नहीं जा पाते , क्यों की,उनको कोई बेटा नहीं है। रोहित को समझ आ गया ।

बेटी क्या कहना चाह रही है ।रोहित बहुत शर्मिन्दा हो गया । 

रोहित ने रुचि को बोला, मै गाड़ी बुक कर देता हूं तुम अपने मां पापा को ले के चली जाओ कुंभ । रुचि बहुत ज्यादा खुश हो गई ।

रुचि अपने मां पापा को ले के कुंभ चली गई , स्नान कराया । रुचि की  मां ने बोला बेटा तुमने मेरी सारी इच्छाएं पूरी कर दी। 

रुचि ने गंगा मईया को प्रणाम किया । और बोला  हे गंगा मईया जैसे मैने अपनी मां पापा के अरमान पूरे किए । वैसे मेरी बेटी भी मेरे सारे अरमान पूरे करे।

रंजीता पाण्डेय

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