‘ अपनों ने ठोकर मारी तो गैरों ने गले लगाया ‘ – विभा गुप्ता 

 मंच पर संचालक महोदय ने जब पचहत्तर वर्षीय देवकीनन्दन मिश्रा जी का नाम पुकारा तो पूरा हाॅल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।उन्हें ‘बेस्ट टीचर ऑफ़ द इयर ‘ के सम्मान से नवाज़ा जा रहा था।

          ये सम्मान उन्हें लम्बे समय तक शिक्षण कार्य करते रहने के लिए नहीं बल्कि सेवानिवृत्त होने के पश्चात दस वर्षों तक गरीब और नीचे तबके के होनहार बालकों को मुफ़्त शिक्षा देने के लिए दिया जा रहा था।

           ग्रेजुएट होने के बाद उन्होंने बीएड किया और एक सरकारी विद्यालय में अध्यापन करने लगे।अनंत ज्ञान के साथ-साथ ईश्वर ने उन्हें सरल स्वभाव भी वरदान में दिया था, इसीलिए वे विद्यार्थियों को बहुत प्रिय थें।उनकी पत्नी एक सुघड़ गृहिणी थी, दो बेटे थें जो उन्हीं के विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहें थें।समय के साथ-साथ उनकी पदोन्नति होती गई और वे विद्यालय के प्रिसिंपल बन गये।उनके दोनों बच्चे भी अपनी-अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी करने लगे।बड़े बेटे के विवाह के दो साल पश्चात ही उन्होंने छोटे का भी विवाह कर दिया और उसके छह माह बाद ही वे विद्यालय से सेवानिवृत्त भी हो गये।सोचा कि अब बाकी ज़िंदगी पत्नी के संग पोते-पोतियों को खेलाते हुए आराम से बिताऊँगा लेकिन इंसान का सोचा हुआ कब पूरा होता है।

        हृदयाघात से पत्नी की मृत्यु हो जाने से वे अंदर से काफ़ी टूट गए थें, तब मित्रों ने समझाया कि भाभी तुम्हारे लिए भरा-पूरा परिवार छोड़ गईं हैं,उनमें अपना मन रमाने का प्रयास करो।उन्होंने सलाह मान ली परन्तु अब वे अपने ही बच्चों को अखरने लगे थें।अपनी पेंशन उनके हवाले कर देने के बावजूद भी उन्हें सूखी रोटियाँ ही खाने को मिलती थी।अब बेटे-बहू द्वारा प्रताड़ित होने की बात भला कैसे किसी से कहते।

           एक दिन सब्ज़ी का थैला लेकर वापिस आ रहें थें कि उन्हें चक्कर आ गया और वे एक गाड़ी से टकरा गए।गाड़ी चलाने वाला उनका ही एक विद्यार्थी था।उसने उन्हें पानी पिलाया और उन्हें घर पहुँचाने जब गया तो छोटी बहू ने अतिथि का भी मान न रखा और उनके विद्यार्थी के सामने ही अपने ससुर को खरी-खोटी सुना दी।उस दिन देवकीनन्दन बाबू अपमान का घूँट पीकर रह गए थें।फिर एक दिन बड़े बेटे ने यह कहकर उन्हें घर के बाहर का रास्ता दिखा दिया कि अब हम आपका वहन नहीं कर सकते हैं।



          किस्मत की बात थी कि उसी वक्त गाड़ी वाला उनका विद्यार्थी आशीष उनसे मिलने आया हुआ।आशीष उन्हें आदर सहित अपने घर ले आया।प्यासे को पानी की एक बूँद भी मिल जाए तो वह प्रसन्न हो जाता, उसी तरह से देवकी बाबू भी आशीष और उसके परिवार से स्नेह व सम्मान पाकर तृप्त हो गए।

        एक दिन आशीष के तेरह वर्षीय बेटे आर्यन ने देवकी बाबू से गणित का एक सवाल पूछा।उन्होंने उस सवाल को हल कर दिया और समझा भी दिया।आशीष को जब मालूम हुआ तो वह बहुत खुश हुआ और उनसे आर्यन को गणित पढ़ाने के लिए आग्रह किया।वे हिचकिचाने लगे,बोले कि इतने लम्बे अंतराल के बाद पढ़ाना तो…।लेकिन फिर आशीष के ज़िद के आगे सिर झुका दिया और पढ़ाने लगे।एक तरफ़ आर्यन का गणित विषय पर पकड़ अच्छी होने लगी तो दूसरी तरफ़ उनका खोया हुआ आत्मविश्वास भी लौटने लगा।अब वे स्वयं को फ़्रेश फ़ील करने लगे।उनका ये परिवर्तन आशीष की पत्नी ने नोटिस किया और उसने उन्हें बच्चों को फिर से पढ़ाने का सुझाव दिया।

             अंधे को क्या चाहिए, दो आँखें जो देवकी बाबू को मिल गई।मगर उन्होंने शर्त रखी कि वो मुफ़्त शिक्षा देंगे।आशीष ने दो सरकारी विद्यालयों से बात किया जो उसके घर से ज़्यादा दूर नहीं था।रोज सुबह आशीष देवकी बाबू को स्कूल छोड़ देता, वहाँ दो क्लास लेकर वो पैदल ही दूसरे स्कूल चले जाते।वहाँ दसवीं कक्षा की एक क्लास लेकर वे घर आते, थोड़ा आराम करते और फिर आर्यन को पढ़ाने लगते।इसी दिनचर्या में उनके साल दो साल निकलते चले गए।अपनों ने उन्हें जिस बेदर्दी से ठुकराया था, गैरों ने उन्हें उतने ही प्यार से गले लगा लिया था।उनकी एक दुनिया आशीष था तो दूसरा स्कूल और उसके विद्यार्थी।स्कूल के कई बैच पास होते चले गए, आर्यन भी काॅलेज की पढ़ाई पूरी करके ट्रेनिंग के लिए अहमदाबाद चला गया।इस बीच दोनों विद्यालयों में जब भी कोई आयोजन अथवा वार्षिक समारोह होता तो उन्हें तथा आशीष को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता था।

          उनकी उसी निस्वार्थ सेवा के लिए आज उन्हें  पारितोषित किया जा रहा था।आशीष उन्हें मंच तक ले जा रहा था और उनके विद्यार्थी पुष्प-वर्षा करते हुए उनकी जयकार कर रहें थें।मंच पर माला पहनाकर उनका अभिनंदन किया गया और जब उन्हें ‘बेस्ट टीचर’ का ट्राफ़ी देते हुए दो शब्द बोलने को कहा गया तब भावावेश में उनकी आँखें भर आईं।इतने आदर और अपनेपन की तो उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।माइक को हाथ में लेकर उन्होंने इतना ही कहा, ” आपलोगों से इतना प्यार मिला कि मेरी डिक्शनरी से पराया शब्द ही मिट गया।” उनके दो शब्द सुनकर फिर से तालियाँ बजने लगीं।उनके अपनों की इस भीड़ में सबसे पीछे खड़े उनके बेटे-बहू पराये-से बनकर नम आँखों से अपने पिता की अप्रतिम उपलब्धि को देख रहें थें।

#पराये _रिश्ते _अपना _सा _लगे 

                   ——— विभा गुप्ता 

 

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