अपनों का साथ – वीणा सिंह : Moral Stories in Hindi

 आज पेरेंट्स टीचर मीटिंग में फिर हमारी यानि मैं काव्या कुहू की मम्मी और नमन के पापा संजय की फिर से मुलाकात हो गई.. पिछले रविवार को भी मैं काव्या को लेकर मॉल गई थी… गेम जोन ले जाने का प्रॉमिस पूरा करने और संजय भी नमन के साथ वहीं मिल गए… मैने एक चीज नोटिस की संजय दोनो बार नमन के साथ हीं थे पत्नी साथ नही थी… मैं तो सिंगल मदर हूं इसलिए..

                      मैं इस शहर में एक कंपनी का सीईओ बन कर छः महीने पहले आई हूं.. अपनी व्यस्तता के बीच समय निकाल कर कुहू के स्कूल आ जाती हूं… महीने में एक बार…15 अगस्त को कुहू भारत माता बनी थी, फॉरेन डेलीगेट्स के साथ जरूरी मीटिंग थी पर मैंने उस में से भी थोड़ा समय चुरा कर कुहू के स्कूल आ गई…अपनी बिटिया को भारत माता के रूप में देखने की ललक लिए..

                              और ऐसे हीं हमारी मुलाकातें कई बार हो चुकी.. पर हर बार नमन अपने पापा के साथ हीं होता…

                             ऐसे हीं कई बार संजय से हमारी मुलाकातें होती रही… हेलो हाय कैसे हैं, के साथ हम आगे बढ़ जाते… मुझे भी संजय को हमेशा नमन के साथ देखने पर उत्सुकता बढ़ती जा रही थी… खैर मौका मिल हीं गया… कुहू और मैं गणपति उत्सव में शामिल होने गए थे… संजय उस  पूजा कमिटी के अध्यक्ष थे… संजय ने कहा अगर आप दस मिनट के लिए कुहू के साथ मेरे घर चलती तो नमन खुश हो जाता.. बगल में हीं मेरा बंगलो है… कुहू मचलने लगी चलो ना मम्मा..

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                           बहुत सुंदर बंगलो था संजय का… गार्डेन में लगे तरह तरह के फूल और सजावटी पौधे खुबसूरती को द्विगुणित कर रहे थे.. हम ड्राइंग रूम में पहुंचे.. भव्य और बेजोड़ सजावट को देख हीं रहे थे तब तक नमन और उसकी दादी आई. कुहू नमन के साथ खेलने लगी.. मैं संजय और नमन की दादी से थोड़ा बहुत औपचारिक बातें कर रविवार का लंच नमन और संजय के साथ फिक्स कर वापस आ गई…

           रविवार को नियत समय पर संजय नमन के साथ आए.. दोनो बच्चे बाहर लॉन में चले गए… मैने सीधे संजय से नमन की मां के बारे में पूछा… संजय बोले हमारा तलाक सात साल पहले हो गया है… नमन से बड़ा एक बेटा और है जिसे सौम्या अपने साथ ले गई… वो 15 साल का है… सौम्या ने शादी भी कर ली है… नमन तीन साल का था.. मैने और मां ने मिलकर इसे संभाला… मां के लिए बहुत रोता था.. मैं माइनिंग डिपार्टमेंट में जीएम के पोस्ट पर कार्यरत हूं… हमारे विचार नहीं मिले इस लिए… मां हमेशा मेरी दूसरी शादी के लिए परेशान रहती है पर मैं टाल जाता हूं… पहली शादी का अनुभव हीं ऐसा है…

         

            लंच रेडी है शीला और रमेश दो बार आ कर बता गए थे…  डाइनिंग टेबल पर खाना लग चुका था.. खाने के बाद हमलोग आइस्क्रीम पार्लर गए… बच्चों ने खूब मस्ती की… धीर गंभीर संजय लगभग 50 साल केआयु के थे.. आकर्षक व्यक्तित्व  के धनी… जाते जाते संजय ने कहा मैंने तो अपनी सुना दी. इस बार आपकी सुनेंगे.. मशीन की तरह ऑफिस में काम करते करते दिल और दिमाग इतना थक जाता है की लगता है छुट्टी के दिन सिर्फ आराम करें..

पर ये रविवार तो ऊर्जा से भर दिया… कुहू भी थक के सो गई थी पर मेरी आंखों से नींद गायब थी.. स्मृतियों के झोंके बार बार बंद दरवाजे खोल रहे थे और फिर मैं….. मेरा और आयुष का अफेयर ग्रेजुएशन से हीं चल रहा था… घरवाले भी जानते थे.. पीजी के बाद हम दोनों को विदेश की एक यूनिवर्सिटी से पीएचडी के लिए चयन हो गया.. घरवालों ने तय किया शादी कर दो फिर दोनो साथ साथ जायेंगे.. हमारा परिवार इतना एडवांस नही था कि लिव इन की इजाजत देता…

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नए सपनों के साथ हम दोनों शादी के पंद्रह दिन बाद दूसरे देश में चले गए…. वक्त अच्छे से गुजर रहा था… हमे जो पैसे मिलते थे, नई शादी थोड़ा घूमना फिरना थोड़ी बहुत शॉपिंग के लिए कम पड़ जाते थे… मैने पार्ट टाइम में कुछ कुछ काम करना शुरू कर दिया… पैसे की जरूरत पड़ती तो आयुष मुझसे हीं पैसे मांगता.. मुझे अब बहुत गुस्सा आता.. दो साल ऐसे हीं गुजर गए.. मैं आयुष को कहती तुम भी कुछ करो पर…

                         हम दोनों का पीएचडी पूरा हो गया.. हमे डिग्री मिल गई… मैं नौकरी के लिए कोशिश करने लगी.. और मुझे एक कॉलेज में जॉब मिल भी गई… आयुष को भी मैने जॉब अप्लाई करने बोला तो बोले मुझे अभी और पढ़ाई करनी है… मुझे बच्चे की बहुत चाह थी पर आयुष के लिए बच्चे लैबलिटी थे…

ऐसे हीं हमारे दस साल बीत गए…मेरी कमाई पर आयुष की जिंदगी कट रही थी… मेरी भावनाओं की कोई कद्र नहीं थी आयुष के पास.. मैं पैंतीस साल से अधिक की हो गई थी… अब बच्चा नहीं प्लान करेंगे तो फिर कब.. मैं पैसे छापने की मशीन बन गई थी.. मेरे पैसे मेरा शरीर आयुष की जरूरत थी.. जो सहज उपलब्ध था…

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मेरी भी कोई जरूरत है कभी न पूछा न जानना चाहा… प्रेमी जब पति बन जाता है तब पत्नी उसकी प्राइवेट प्रॉपर्टी हो जाती है.…मन को समझाती आयुष को अहसास होगा जल्दी हीं पर… मैं चालीस साल की हो गई… अब मुझे निर्णय लेना हीं होगा… जो इंसान न आर्थिक जिम्मेदारी में सहयोग दे रहा है ना हीं मुझे मां बनने की इच्छा का कद्र कर रहा है

उसे छोड़ना हीं उचित है… और मैं इंडिया वापस आ गई… विदेश में रहते रहते मैने लिंगडेन पर जॉब के लिए देखना शुरू कर दिया था… मैने आयुष को तलाक के कागजात भी भेज दिए… थोड़े दिन और रहती तो डिप्रेशन में चली जाती… मैने नौकरी मिलते हीं बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया में लग गई…. प्यारी सी कुहू को मैंने गोद ले लिया… खुश हूं संतुष्ट हूं…

     

                   संजय से अक्सर मुलाकात होती रहती… दो साल बीत गए….. कभी संजय नमन हमारे यहां आ जाते कभी मैं और कुहू चले जाते… संजय के व्यवहार में गहराई गंभीरता और ठहराव था… नमन भी मुझसे बहुत घुल मिल गया था… कुहू भी संजय अंकल नही आते तो कॉल कर नही आने का कारण पूछती…. नमन की दादी भी हमारे साथ बैठती…

                एक दिन संजय ने मुझसे से कहा मां कई दिनों से आप से बात करना चाहती है… मैं बिना लाग लपेट के पूछना चाहता हूं आप मुझसे शादी करेंगी… दोनो बच्चे भी बहुत खुश हो जायेंगे… मां भी… पर आपकी सहमति सर्वोपरि है.. आप मुझे इस लायक समझती हैं तो… और मैने संजय के कंधे पर सर रख दिया…. एक महीने बाद हमारी कोर्ट मैरिज हो गई…# अपनो का साथ#पाकर मैं निहाल हो गई… सम्पूर्ण हो गई.. आज मुझे महसूस हो रहा है #अपनों का साथ# कैसा होता है.. संजय का केयरिंग नेचर मां जी की ममता भरा प्यार नमन और पीहू की मम्मा मम्मा पुकारना… नजर ना लगे मेरे #अपनों के इस साथ #को 

       Veena singh 

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