बावन वर्षीय मनोहर बाबू हाथ में लिये अपने परिवार की तस्वीर को एकटक निहारे जा रहे थे और उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहे जा रही थी।अपने बच्चों के नाम बुदबुदा रहे थे तभी घर का पुराना नौकर रामू काका आकर बोले,” बड़े बाबू… खाना खा लीजिए…सात दिन हो गये हैं… आपने अन्न का एक दाना तक मुँह में नहीं डाला है..बहुत कहने पर पानी-जूस ले लिया…बस सबन का फोटू देखकर रोते रहते हैं।ऐसे तो आप बीमार पड़ जाएँगे और…।”
” ठीक है काका..आप टेबल पर लगाइये।इच्छा तो नहीं है लेकिन फिर मेरे पीछे आप भी भूखे रह जाएँ…ये पाप तो मेरे ही सिर ही आयेगा ना…।” कहते हुए मनोहर बाबू तस्वीर को पलंग के साइड टेबल पर रख कर डाइनिंग टेबल से लगी कुरसी पर बैठ गये।रामू काका ने मूँग की तड़के वाली दाल परोसी और चपाती उनके हाथ में दी तो उनकी नज़र सामने की कुरसी पर पड़ी..लगा जैसे पराग बैठा हो और कह रहा हो कि पापा..दाल तो मेरी फेवरिट है।साथ वाली कुरसी पर मयंक भी…।रोटी उनके हाथ से छूट गई…वे फूट-फूटकर रोने लगे।रामू काका ने उनके कंधे पर हाथ रखकर दिलासा दिया तो वो बोले, ” काका..ज़िंदगी सुख कम दुख ज़्यादा देती है।मेरे फूल-से कोमल बच्चे…अभी खिल ही तो रहे थे….।”
मनोहर बाबू की सीमेंट-फ़ैक्ट्री थी।पिता द्वारा शुरु की गई इस फ़ैक्ट्री को उन्हें पंद्रह साल की उम्र में ही संभालना पड़ा जिसकी वजह से उनकी पढ़ने की इच्छा अधूरी ही रह गई थी।उनकी पत्नी नंदिता सुशील और सुघड़ गृहिणी थी।बड़े बेटे के जन्म पर तो उनकी खुशी का ठिकाना ही न था।उन्होंने न जाने कितने ही सपने बुन डाले थे।
उनका बेटा पराग जब तीन वर्ष का हुआ तब उन्होंने शहर के सबसे अच्छे स्कूल में उसका दाखिला करवाया।स्कूल जाकर पराग बहुत खुश था लेकिन कुछ ही महीनों बाद उसकी सेहत खराब रहने लगी।उसे अक्सर सर्दी-खाँसी और सिर-दर्द रहने लगा।मनोहर बाबू बेटे को लेकर कभी एक अस्पताल तो कभी दूसरे अस्तपताल दौड़ते जिसके कारण पराग का स्कूल छूट गया और कारोबार भी मंदा पड़ गया।
नंदिता फिर से गर्भवती हुई।नौ महीने बाद उसने फिर से एक बेटे को जन्म दिया जिसका नाम उसने मयंक रखा।कुदरत का करिश्मा देखिये कि पराग के स्वास्थ्य में भी सुधार होने लगा।पति-पत्नी ने भगवान को धन्यवाद दिया कि उनके कुल के दीपक को बुझने नहीं दिया।
पराग फिर से स्कूल जाने लगा…तीन साल बाद मयंक भी अपने भाई की ऊँगली पकड़कर स्कूल जाने लगा।मनोहर बाबू के कारोबार में भी फिर से मुनाफ़ा होने लगा।बच्चों के शोर से उनका घर चहकने लगा था।
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पराग बारहवीं पास करके दिल्ली चला गया और मंयक ने दसवीं के बाद ग्यारहवीं कक्षा में एडमिशन ले लिया था।मनोहर बाबू अक्सर पत्नी से कहते,” बच्चे छोटे ही अच्छे थें…उनके बिना तो घर…।लेकिन छुट्टियों में जब पराग आता तो फिर से कभी खाने के लिये तो कभी टीवी के रिमोट के लिये भाईयों के बीच मीठी लड़ाई होती जिसे देखकर उनके ओंठों पर मुस्कान आ जाती थी।
एक दिन मनोहर बाबू फ़ैक्ट्री जाने ही वाले थे कि अचानक उन्हें चक्कर आ गया।मयंक ने देखा तो बोला ,” पापा…आप रेस्ट कीजिये..आज मैं फ़ैक्ट्री चला जाता हूँ।” उन्होंने तुरंत कहा,” नहीं-नहीं…तुम दोनों भाईयों को अभी बहुत पढ़ना है…, मैं ठीक हूँ…।”
नंदिता तो प्रतिदिन अपने परिवार की सलामती के लिये ईश्वर से प्रार्थना करती रहती थी लेकिन होनी-अनहोनी पर तो किसी का वश नहीं चलता।
अचानक देश में कोरोना नाम की महामारी ने अपने पैर पसार लिये।आनन-फ़ानन में पराग घर आ गया..तब तक कोरोना-वायरस ने उसे अपनी चपेट में ले लिया था।उसे हाॅस्पीटल में एडमिट कराने के दो दिन बाद ही मयंक और नंदिता भी संक्रमित हो गये।मनोहर बाबू अस्पताल एक बेड से दूसरे बेड तक दौड़ते रहे।मरीजों की भरमार और ऑक्सीजन-दवाइयों की कमी…।कितनों की ही साँसें थम गयी थी..उन्हीं में से दो मनोहर बाबू के अपने थे।
नंदिता और मयंक की मृत्यु पर तो वे आँसू भी बहा न पाये…पराग को कहते कि दोनों का इलाज़ चल रहा है।पराग स्वस्थ होकर घर आया…तस्वीर पर माला देखी..सदमा सह न सका और फिर से बिस्तर पकड़ लिया।फिर एक दिन पिता का हाथ पकड़कर बोला,” पापा…मैं फिर से आऊँगा…।” और हमेशा के लिये उनका हाथ छोड़कर चला गया।बस तभी से वे बस रोते ही रह रहें हैं।
” मामा जी…ऐसे कैसे चलेगा..खाना रखा है और आप… ” मुदित ने उन्हें समझाया जो उनकी चचेरी बहन का बेटा था और फ़ैक्ट्री में भी काम करता था।उसने उन्हें किसी तरह से दो कौर खिलाया और मास्क पहनाकर अपने साथ बाहर ले गया।
दुकानें कुछ खुली कुछ बंद थी, तभी मनोहर बाबू ने देखा कि चार बच्चे एक रोटी के लिये झगड़ रहें हैं।उनके चेहरे पर मास्क भी न था।मुदित ने बताया कि ये वो बच्चे हैं जिनके माता-पिता को कोरोना लील गया है।घर पर रिश्तेदारों ने कब्ज़ा कर लिया और अब… वे इसी तरह भटक रहें हैं..पेट की आग बुझाने के लिए जद्दोजहद कर रहें हैं।
घर आने पर उनकी आँखों के सामने उन्हीं बच्चों की तस्वीर घूम रही थी।इन बच्चों का वर्तमान ऐसा है तो भविष्य…सच में, ज़िंदगी सुख कम दुख ज़्यादा देती है।उस रात वो करवट बदलते रहे और सुबह उठकर उसी जगह पर गये जहाँ वे चारों बच्चे बेहाल-से पड़े हुए थें।उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।उन्होंने अपनों को खोया है तो इन मासूमों ने भी अपने माता-पिता को…।उन्होंने अपनी बाँहें फैला दी और सभी को अपने अंक में समेट कर अपने संग घर ले आये।
अब मनोहर बाबू उन्हें नहलाते…अपने हाथ से खाना खिलाते…उनके साथ खेलते…और अपने दुख को भूलकर उनके सुख में ही अपनी खुशी ढूँढ ली।रामू काका ने उन्हें भरपूर सहयोग दिया।ऑनलाइन स्कूल खुले तो उनका एडमिशन करा दिया।अब उन्हें समझ आया कि ज़िंदगी दुख देती है तो सुख देने में भी कमी नहीं करती।
एक दिन जब मुदित मनोहर बाबू से मिलने आया तो अपने मामा को पहचान ही नहीं पाया।बच्चों के बीच उसके मामा भी एक बच्चा बने हुये थे।उसने रामू काका से कहा,” दोनों अलग-अलग अधूरे थे…मिलकर पूरे हो गये।”
विभा गुप्ता
स्वरचित
# ज़िंदगी सुख कम दुख ज़्यादा देती है “