अदृश्य अन्याय – रजनी श्रीवास्तव अनंता

जब से दोनों चाचा शहर जाकर बसें और दोनों बुआ की शादी हो गई, तब के बाद ऐसा पहली बार हुआ था कि बिना किसी तीज-त्योहार के परिवार के सारे लोग गांव में इकट्ठा हुए थे। कोई और दिन होता तो बड़ी अम्मा चहकती हुई सब की आवभगत में लगी होतीं। 

मगर… आज वह बिल्कुल चुपचाप सी एक कोने में बैठी हुई थी। एक अजीब सा सन्नाटा माहौल में पसरा था। सिर्फ गेस्ट रूम से साउंड आ रहा था, जिसमें सारे बच्चे जमा होकर टीवी देख रहे थे। 

यह सन्नाटा इस वजह से नहीं था कि कल बड़े पापा की तेरहवीं है, बल्कि इस सोच में सब लोग थे कि बड़ी अम्मा अब, किसके साथ रहेंगी। पहले तो बड़े पापा- बड़ी अम्मा साथ थे, तो सब उन्हें यहां गांव में छोड़कर  निश्चिंत थे। लेकिन बड़े पापा के जाने के बाद बड़ी अम्मा को अकेला छोड़ना सही नहीं था। इसके पीछे प्यार या ममता भले न हो, लेकिन दुनिया-समाज में जवाबदेही तो बनती हीं है। इसके साथ ही बड़ी दिक्कत यह थी कि कोई भी उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नहीं था। किसी के स्टेटस के साथ वे मैच जो नहीं करती थीं। 

          उनकी आंखें दरवाजे पर लगी थी और बार-बार उन्हें अपनी चचेरी ननद रमा बुआ की बातें याद आ रही थी। रमा बुआ को घर में कोई पसंद नहीं करता था। फूफा जी से लड़कर वे महिने भर बड़ी अम्मा के पास रही थीं। उन्होंने नौकरी छोड़ने से इनकार कर दिया था। जिसकी वजह से फूफा जी ने उन्हें छोड़ने की धमकी दी थी। उनके माता-पिता इस दुनिया में नहीं थे। बड़ी अम्मा ने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं मानीं। आखिरकार फूफा जी को समझा-बुझाकर दोनों में सुलह करवाई गई थी।

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एक बार बड़ी अम्मा ने उन्हें समझाते हुए कहा था- “मैं भी तो घर में रहती हूं, पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर सारे काम करती हूं! सब मुझे कितना आदर-सम्मान देते हैं। मुझे कभी किसी चीज की दिक्कत नहीं हुई। बाहर का कोई काम मुझे करना नहीं पड़ता है। सारे काम घर के मर्द या फिर बच्चे कर देते हैं। तो क्या मैं कोई खराब जिंदगी जी रही हूं। औरत जात को समझौते करने हीं पड़ते हैं।”

“समझौते करने से मैं नहीं भागती भाभी! लेकिन सारे समझौते, हम औरतें ही क्यों करें! सारी जिम्मेदारियां निभाते हुए मैं अपना काम नहीं कर रही हूं, हां कभी-कभी देर-सबेर हो जाती है। थोड़े से समझौते पुरुषों को भी करने चाहिए कि नहीं। तुम जानती हो भाभी! मेरे सर पर कोई नहीं। ज्यादा दिन तक तो मैं यहां भी नहीं रह सकती! कभी अगर बुरे दिन का सामना करना पड़ा तो, मेरी इसी नौकरी से मुझे सहारा मिलेगा।”

रमा बुआ ने अपना पक्ष रखते हुए गौर से बड़ी अम्मा की तरफ देखते हुए पूछा-

“रही आपकी बात तो, बुरा न मानो भाभी तो एक बात कहूं?”

“बोलती तो तुम बहुत कड़वा हो, लेकिन तुम्हारे मन में जो है, वह बोल हीं डालो।” बड़ी अम्मा ने हंसते हुए उन्हें छेड़ा। लेकिन वह सीरियस थीं।



 ” जानती हैं भाभी, आपके साथ ऐसा अन्याय हो रहा है, जो खुद आप हीं को दिखाई नहीं दे रहा।” उस समय उन्हें ठीक से समझ में नहीं आया लेकिन बहुत बुरा लगा, लेकिन आज उनकी बातें बिल्कुल सच लग रही थीं।

बुआ का डर बिल्कुल सही निकला। दो बच्चों के बाद जब असमय हीं, फूफा जी उन्हें छोड़ कर चले गए तो नौकरी से उन्हें बहुत सहारा मिला। बच्चों का हीं नहीं सास-ससुर की भी जिम्मेदारी उठा रही थीं। आराम से उनकी जिंदगी कट रही थी।

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सबकी बातें सुनकर उन्हें रमा बुआ की वही बात बार-बार याद आ रही थी।

दरवाजे पर आहट सुनकर वे चौंक गईं। रमा बुआ उनके सामने खड़ी थीं। उनसे लिपट कर वे बच्चों की तरह बिलख कर रोने लगीं।

“पैकिंग कर लो भाभी! सिर्फ़ 2 दिनों की छुट्टी लेकर आई हूं।” उनको चुप कराते हुए बुआ ने कहा।

सब आश्चर्य में पड़ गये, लेकिन किसी ने कोई विरोध नहीं जताया। 

वही बुआ सबको आज बहुत प्रिय लग रही थीं।  सारा काम खत्म होने के बाद, बड़ी अम्मा का पैकिंग कराने में सब हेल्प करना चाह रहे थे। तभी वो पूजा घर की तरफ मुड़ गई और वहां से गीता उठाकर उन्होंने बैग में डाल लिया जो रमा बुआ ने हीं उन्हें गिफ्ट में दी थी। जिसको घर के तमाम कामों की वजह से वे कभी नहीं पढ़ पाई थीं।

#अन्याय 

रजनी श्रीवास्तव अनंता 

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