” माँ..कहाँ हैं आप?” घर में घुसते ही स्नेहा ने चहकते हुए अपनी माँ को आवाज़ लगाई।
” मैं यहाँ हूँ स्नेहा…पर तू अचानक इस समय…” सुनयना की बात अधूरी रह गई क्योंकि स्नेहा ने उनके मुँह में मोतीचूर के लड्डू डाल दिये थे।
” बधाई हो माँ..तुम्हारा लाडला अब डाॅक्टर बन गया है।#गाढ़े दिनों में तुमने जो धैर्य रखा,उसी का परिणाम है।” अपनी माँ के कंधों पर अपने दोनों हाथ रखकर स्नेहा बोली तो सुनयना की आँखें खुशी-से बरसने लगी।
कितनी खुश थीं वो अपने छोटे-से परिवार में।पति एक फ़ैक्ट्री में काम करते थे।काम से थककर वो शाम को घर लौटते तो स्नेहा और आशीष उनसे लिपटकर दिनभर की बातें किया करते थें।उनके पति अक्सर कहा करते थें कि सुनयना..हम अपने दोनों बच्चों को खूब पढ़ायेंगे..आशीष को डाॅक्टर बनायेंगे..।
” जब कभी वो परेशान होतीं तो उनके पति समझाते,” सुनयना..गाढ़े दिनों में अपना हौंसला कभी मत खोना…हिम्मत रखना..संकट की घड़ी कठिन होती है लेकिन क्षणभंगुर भी…जल्दी ही बीत जायेगी।” पति की सकारात्मक सोच से उन्हें बहुत ऊर्जा मिलती थी।फिर एक दिन अस्पताल से खबर आई थी कि उनके पति का एक्सीडेंट हो गया है
और वे अंतिम साँस ले रहें हैं।वो बच्चों को लेकर दौड़ पड़ी थी।खून से लथपथ बेहोश पति को देखकर उनका हृदय चीत्कार उठा था।होश आया तो इतना ही कह पाये,”अब मैं साथ नहीं…।” उन्होंने पति की आँखें बंद की और अपने आँसूँ पोंछ लिये थे।अकेली होती तो पति संग ही चली जाती लेकिन दो बच्चों की ज़िम्मदारी…।
फ़ैक्ट्री से मिली रकम से उन्होंने सिलाई मशीन खरीदी।दिन में तीन घरों में खाना बनाने जाती और रात को बैठकर सिलाई करती।स्नेहा अपनी पढ़ाई से समय निकालकर माँ के कामों में मदद करती और भाई को भी गाइड करती।कभी-कभी सुनयना को आर्थिक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता तब स्नेहा उन्हें सांत्वना देती,” माँ..घबरा मत..अच्छे दिन भी आयेंगे..।”
बारहवीं पास करके स्नेहा ने टीचर-ट्रेनिंग का कोर्स किया और स्कूल में पढ़ाने लगी।घर की आय बढ़ी तो उनके रहन-सहन का स्तर अच्छा हुआ।आशीष ने जी-तोड़ मेहनत करके मेडिकल की प्रवेश-परीक्षा पास की।उसे अच्छे काॅलेज़ में दाखिला मिल गया।तब स्नेहा ने उनसे कहा,” माँ..अब आराम कीजिये..मैं हूँ ना..।” लेकिन उन्होंने कहा कि नहीं..अभी आशीष का डाॅक्टर बनना बाकी है।आज वो शुभ दिन आ ही गया..उनके पति का सपना सच…।
” माँ..कहाँ खो गई…मुझे आशीर्वाद दो ना…।” आशीष की आवाज़ सुनकर सुनयना की तंद्रा टूटी…।उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और उठाकर उसका मस्तक चूम लिया।उनका मन भावुक हो उठा था,” काश! आज तुम्हारे पिता होते…।”
” पापा सब देख रहें हैं माँ…हमारे अच्छे दिन देखकर वो भी खुश हो रहें हैं.., वो देखो..।”कहते हुए स्नेहा ने दीवार पर टँगी अपने पिता की तस्वीर की ओर इशारा किया।सुनयना ने मुस्कुराते हुए अपने दोनों बच्चों को हृदय से लगा लिया।
विभा गुप्ता
# गाढ़े दिन स्वरचित, बैंगलुरु