दीपक!आओ बेटा,बड़े अच्छे वक्त पर आए हो,चाय ही बना रही थी मैं,सुधा देवी ने प्यार से कहा।
नहीं आंटी, मै पी के ही चला था,फिर कभी…वो संकोच करता बोला।
मुझे मां समान मानता है न तू,फिर ये संकोच कैसा?सुधा देवी ने जबरदस्ती उसे चाय पकड़ा दी।
लो इसकी पसंद के मिर्च के पकोड़े भी दो इसे,राम बाबू किचेन से आते हुए बोले।
नमस्ते अंकल!दीपक ने झट उनके पैर छू लिए।आप पकोड़े बनाएं और मैं न खाऊं?ऐसा कभी हुआ है क्या?
सब हंसने लगे।दीपक उसी मोहल्ले में रहता था,दो चार मकान छोड़ कर ही उसका कमरा था और सुधा देवी और राम बाबू अक्सर उससे कहते,अब अकेले कब तक रहोगे ,घर बसा लो वो हंस के रह जाता उनकी बात पर।
गांव में उसका परिवार था और वो यहां शहर में नौकरी करता था।
एक दिन शिवरात्रि के पर्व पर सुधा देवी दीपक के घर गई तो वहां उन्होंने बहुत सुंदर सी लड़की देखी जो सहमी हुई सी खड़ी थी,सिर पर पल्लू लिए,आंखों में शर्म का गहना पहने वो उन्हें बहुत सुंदर लगी।
उन्होंने दीपक को शिकायती नजरों से देखा,इसे कहां छुपा के रखा था अभी तक,कितनी प्यारी है,बहुरानी है न ये,कभी बताया ही नहीं हमें?चलो!अब ख्याल रखना दीपक का तुम…।
प्यार से कह कर वो तो चली गई लेकिन दीपक खुश नहीं था ,वो गरजा था उस लड़की पर उनके जाते ही।
क्यों आई हो यहां?कहा था ना मेरा तुमसे कोई नाता नहीं है?दीपक बेरुखी से बोला।
आप को याद दिलाने आई हूं कि मेरी आपसे शादी हुई है,मैंने तो आजतक आपके सिवा किसी के बारे में सोचा ही नहीं। वो धीमी आवाज में बोली।
तो अब सोच लो,किसी ने मना किया है तुम्हें?दीपक वैसे ही बेरुखी से बोल रहा था।
देखिए! मै इतनी दूर से आई हूं सिर्फ आपके लिए,ज्यादा पढ़ी लिखी भी नहीं मै,शहर के तौर तरीके नहीं जानती पर आप मेरे पति परमेश्वर हैं,आपको छोड़ के कहां जाऊं मैं?
ये मेरी समस्या नहीं है…मुझे तुमसे किन दबावों में शादी करनी पड़ी थी,तुम जानती हो और मैंने तुम्हें पहले ही दिन बता भी दिया था,फिर आज अचानक क्यों?
लेकिन बताया तो तब था जब हमारी शादी हो चुकी थी,मेरा इस सारी घटना में क्या कुसूर?वो गिड़गिड़ाने पर आ गई थी।
तभी सुधा देवी वहां वापिस आ गई जो दीपक और उसकी नई नवेली दुल्हन रोशनी को अपने घर निमंत्रण देने आई थीं जो पहले भूल गई थीं,लेकिन उनकी बात सुनकर वो चौंक गई।
दीपक!ये सब क्या है बेटा?तुम तो बहुत संस्कारी और अच्छे लड़के लगते हो,फिर ये कैसा व्यवहार है अपनी पत्नी से?
आंटी! मै इसे अपनी पत्नी नहीं मानता,ये जबरदस्ती की शादी है मेरे साथ। वो विरोध करता बोला।
लेकिन शादी तो हुई है न और तुम्हारे मां बाप की उपस्तिथि में हुई है फिर तुम मानो या ना मानो। वो थोड़ा गुस्से से बोली।
आंटी!ये मेरा जाती मामला है,इसमें आप न ही बोलें तो बेहतर होगा,दीपक ने बेरुखी से कहा तो सुधा चौंक गई।
सॉरी!मैंने हमेशा तुम्हें अपना बेटे जैसा समझा,इसी अधिकार से ज्यादा कह गई,आइंदा ध्यान रखूंगी…कहते हुए वो चल दी।
वो आंटी!मेरा वो मतलब नहीं था,दीपक घिघियाता हुआ बोला लेकिन सुधा देवी जा चुकी थीं।
दीपक ने गुस्से से रोशनी को घूरा,ये है ही मनहूस,मेरी इतनी अच्छी आंटी को भी नाराज़ कर दिया।
मैने?उसकी मोटी आंखों में अपमान के आंसू छलक पड़े।
वो शशपंज में थी,ऐसे में पिया घर रूके या न रूके,बड़े बेआबरु होकर उसे यहां रुकना पड़ता पर वो जायेगी भी कहां?नया शहर, नए लोग…
वो बैग लिए अंदर आने लगी,दीपक बडबडा रहा था,अच्छी जबरदस्ती है!!
ठीक है,आज रात यहां रुक जाओ,लेकिन कल अपने घर का रास्ता पकड़ लेना…समझी!!
रोशनी ने आंखें नीचे झुका रखी थीं,आज की इजाजत तोi मिली,कल की कल देखी जायेगी।
तभी दीपक का फोन बज उठा।
ओह शीना डार्लिंग!वो लपक के फोन उठाते ही बोला।
रोशनी के कान खड़े हो गए,किससे इतने प्यार से बातें हो रही हैं।
उसके सीने पर सांप लोट रहे थे,जिस प्यार मोहब्बत की बातें सुनने को उसके कान तरस रहे थे वो उसका पति किसी पराई लड़की को बेमोल लुटा रहा था।
नहीं…अब ये ज्यादा दिन नहीं चलने दूंगी,उसने मन ही मन सोचा,आ गई हूं ना यहां,अपना अधिकार ले कर ही जाऊंगी।
तभी दीपक की घबराई आवाज़ आई,क्या तुम आ रही हो यहां?इसी वक्त??नहीं…नहीं…अभी न आओ, मै घर पर नहीं हूं!
झूठे!डर क्यों रहे हो?क्या किसी और के संग रोमांस कर रहे हो मेरे पीछे? शीना की हंसी जैसे पीछे से ही आई।
दीपक ने मुड़ के देखा तो वो उसके पीछे खड़ी थी,दौड़ के उसके गले से लग गई थी शीना।
दीपक के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी,शरीर ठंडा पड़ गया और पसीने से डूब गया।
क्या हुआ दीपक?इतने घबराए हुए क्यों हो जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो?शीना बोली और तभी उसकी नज़र सामने खड़ी रोशनी पर पड़ी।
गोरा रंग, बड़ी बड़ी डरी हुई हिरनी सी आंखें,लंबी चोटी,माथे पर गोल बिंदी,मांग में सिंदूर दमक रहा था,गले में मंगलसूत्र…
ये…ये कौन है तुम्हारी?उसने चीखते हुए दीपक से पूछा।
दीपक के मुंह से एक बोल न फूटा।
ओह!तो तुम डबल गेम खेल रहे थे मेरे साथ?
शीना फुफकारते हुए बोली।
शीना,तुम मुझे गलत समझ रही हो,मेरी जिंदगी के तुम्हारे सिवा कोई और नहीं है डार्लिंग!वो बोला।
हाऊ डेयर यू टू बीफूल मी…वो चिल्लाई। मै जा रही हूं और मेरे पीछे आने की कोशिश मत करना कभी…वो गुस्से में बाहर निकल गई।
रोशनी को घूरता हुआ,दीपक बदहवास सा शीना के पीछे दौड़ा।
बड़ी मुश्किल से उसे रोक पाया था वो।उसे पकड़ कर घर लाया।
दोनो एक कमरे में बंद रहे बहुत देर।रूठना मनाना चलता रहा था।बाहर खड़ी रोशनी जलती रही,सिसकती रही पर दरवाजा नहीं खुला।उसे लगा कि उसे यहां नहीं आना चाहिए था,उसका पति तो उसका रहा ही नहीं अब।भले ही कानूनन वो उसकी पत्नी थी पर उसने दिल में जगह किसी दूसरी औरत को दे दी थी जो अब वापिस लेना नामुमकिन थी।
फिर काफी देर में दरवाजा खुला और शीना गुस्से में बाहर निकली। वो बहुत खफा थी दीपक से और लगातार एक ही बात रटे जा रही थी कि तुमने मुझे धोखा दिया, मै तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगी।
वो चली गई थी दीपक की दलीलें,अनुनय,प्रेम को ठुकरा कर और दीपक फिर से इस सबके के लिए रोशनी को जिम्मेदार ठहरा रहा था।वो ,थोड़ी देर में ही,चला गया घर छोड़कर।
बेचारी रोशनी भूखी प्यासी बैठी रही उसके इंतजार में…उसका दिल नहीं हुआ कि वो किचेन में जाकर पानी भी पी ले।उसे सब कुछ पराया लग रहा था।काफी रात गए,उसे चक्कर आने लगे,वो वहीं बैठी सो गई थी।
दीपक लौटा था आधी रात को,हल्का सा नशा करके शायद…अरे!अभी तुम गई नहीं यहां से?वो बेशर्मी से बोला और अपने कमरे में जाकर सो गया।
रोशनी मुंह ताकती उसे देखती रह गई।इसमें जरा इंसानियत नहीं है?कैसा पत्थर दिल आदमी है ये?आखिर हूं तो मै इसकी पत्नी ही?कोई अजनबी को भी चाय पानी पूछ लेता है?
सुबह,मुंह अंधेरे,वो एक लेटर छोड़ कर वहां से चली गई।सीधे,वो पड़ोस वाली आंटी के गई,उन्होंने उसे बहुत समझाया…ऐसे रूठकर मत जाओ,वो तुम्हारा पति है और तुम्हारा अधिकार है उस पर पर वो नहीं मानी,जहां प्यार ही नहीं,वहां रहने का कोई फायदा नहीं।
ये ही बात,दीपक की उसके पत्र में लिखी मिली जब वो सुबह उठा,तभी शीना की कॉल आई और उसने बताया दीपक को कि वो कल रात की फ्लाइट से सिंगापुर चली गई अपने पेरेंट्स के पास जहां उसकी शादी उसके एक्स से हो रही है जल्दी,दीपक उसे भूल जाए।
दीपक के पैरों तले जमीन सरक गई।ये तो दोनो ही हाथों से निकल गईं।
शीना भले ही उसका प्यार थी लेकिन रोशनी तो उसकी ब्याहता पत्नी थी।वो हड़बड़ा के अपनी गाड़ी से बस स्टैंड की तरफ भागा।
पीपल के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर रोशनी उसे बैठी दिख गई जो बस का इंतजार कर रही थी।पड़ोस वाले सुधा आंटी और राम अंकल भी उसके साथ थे ,शायद उसे छोड़ने आ गए थे।
हांफते हुए दीपक रोशनी के पास पहुंचा,रोशनी!प्लीज मुझे माफ कर दो।
किस बात की माफी मांग रहे हैं आप?वो बिना किसी भाव के बोली।
तुमसे बहुत बुरा व्यवहार किया मैंने,प्लीज मुझे माफ कर दो और अपने घर चलो। वो बोला।
अपने घर?वो घर जहां मुझे एक वक्त पानी भी नसीब नहीं हुआ?चौबीस घंटे से भूखी प्यासी मै,अगर वो घर है तो वो आपको ही मुबारक….हमारे घरों में तो अजनबी को भी पानी के साथ मीठा खिलाया जाता है।
मै अपने पति के पास आई थी,नहीं जानती थी कि वो किसी और की जुल्फों में गिरफ्त है,आपको आपकी प्रेमिका,घर सब मिले,गुड बाय।
तभी उसकी बस ड्राइवर ने चलने का हॉर्न दिया और वो सुधा राम आंटी अंकल के पैर छू कर बस में चढ़ गई।
दीपक भौंचक्का देखता रह गया।बेबसी में वो बोला…सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते ना आंटी? मैं उसके साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताना चाहता हूं,क्या करूं?
जाओ और मनाओ उसे…राम अंकल बोले।
लेकिन वो मुझे ठुकरा के चली गई है…
तुमने भी उसे ठुकराया था एक बार…वो लड़की होकर,अनजान शहर में तुम्हें ढूंढती आ गई तुम एक आदमी होकर अपने रूठे प्यार को मनाने नहीं जा सकते?कैसे पति हो?प्रेमी तो हो ही नहीं? सुधा हिकारत से बोलीं।
क्या वो मान जायेगी?सहमी आवाज में पूछा था दीपक ने।
जितना इंतजार तुमने उसे कराया है,कुछ तो अभी भी करवाएगी?बाकी तुम्हारी तकदीर…सुधा हंसी अब जाओ कहीं ज्यादा देर न हो जाए।
दीपक तेजी से दूसरी बस में चढ़ गया अपनी प्रियतमा रोशनी को मनाने के लिए,अब चाहे सिर फूटे या माथा,उसे अपनी पत्नी को मनाना ही था।
समाप्त
डॉक्टर संगीता अग्रवाल