गीता – माँ जी कितनी बार कहा हैँ आपसे ये रानी विक्टोरिया की तरह साड़ी जमीन पर लहराते हुए मत चला करो ,,अब आपके पति नहीं हैँ जो नई- नई साड़ी रोज लाकर दे आपको ! इतनी गंदी हो जाती हैँ ! कितना साबुन खर्च होता हैँ इसे धुलने में ! आपको अन्दाजा भी हैँ ! कौन सा कमाके लाना पड़ रहा हैँ ! रोज दिमाग खराब हो जाता हैँ आपका ये फूहड़पन देखकर ! जाहिल गंवार हैँ आप !
राजवती जी – बहू ये आदत सालों पुरानी हैँ इस मरने की उम्र में क्या ही जायेगी ! इनको बहुत अच्छा लगता था मेरा इस तरह साड़ी लहराकर चलना ! कहते थे बिल्कुल महारानी लगती हैँ ! साफ तो मैं ही करती हूँ बहू ! साबुन के पैसे इतने तो मैं दे ही देती हूँ हर महीने !
गीता – हाँ हाँ ,,कह तो ऐसे रही हैँ जैसे लाखों रूपये हर महीने देती हैँ हमें ! साढ़े तीन हजार रूपये मैं आपकी दवाई ,च्यवांप्राश ,कपड़े ,आपके खाने पीने का खर्चा देखें कि साबुन और आपके शौक श्रिंगार ! बोल तो ऐसे रही हैँ जाने कितना एहसान कर रही हैँ हम पर ! अब मेरे पास बहस का टाइम नहीं है ! जाईये आज कलिया नहीं आयेगी बरतन साफ करने ! जब तक मैं बाजार से आऊँ बरतन कर देना ,झाडू लगा लेना ,सब्जी काट के रख देना ! समझी कि फिर से बताऊँ ! पिछली बार की तरह सब काम अधूरा छोड़कर चारपाई मत पकड़ लिजियेगा !
राजवती जी – बहू मैने काम की वजह से आराम नहीं किया था ! मेरी कमर में असहनीय दर्द था ,,बी पी भी बढ़ गया था !
गीता – बहाने बनाना तो कोई आपसे सीखे ! चलिये अपना काम कीजिये ! और हाँ आटा ज्यादा मत लगा देना ,,सुबह की 4 रोटी रखी हैँ आपके लिए !
राजवती जी बिना कुछ कहे अपने पल्लू से आंसू पोंछते हुए किचेन में बरतन मांजने लगी ! सोचने लगी ! राजू के बापू ने रानी की तरह रखा उन्हे ! मजाल हैँ कभी किसी भी बच्चें ने उनके सामने मुझसे ऊँची आवाज में बात भी की हो ! जब शाम को काम से वापस आते तो खोये वाली मिठाई ज़रूर लाते ! इतनी इतराती थी मैं अपनी किस्मत पर ! लाखों कम्बल ,रजाई ,शाल हर साल गांव वालों को बांटते ! वही राजवती जी को आज एक फटी हुई रजाई मिली हुई हैँ ओढ़ने को ! उसमे भी पैर बाहर आ जाता था ,,ज़िसे किसी तरह सिलकर गुजारा कर रही थी !
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तभी अचानक अपने नाती शुभम की आवाज से वो वर्तमान में वापस आयी !
शुभम – दादी ,देखो मैं क्या लाया हूँ आपके लिए ,,खोये की मिठाई !! आपकी फेवरेट हैँ ना ! दादा जी हमेशा लाते थे आपके लिए !
राजवती जी -अरे मेरे लल्ला ,,तुझे कहाँ से मिल गयी ये खोये की मिठाई !
शुभम – अरे दादी ,,वो ना नानू आये है ,,वही लेकर आये हैँ !
राजवती जी – तो तू मुझे क्यूँ दे रहा हैँ ,,तेरी मम्मा ने तुझे दी होगी ना खाने को !
शुभम – दादी आपको तो पता हैँ मैं मीठा नहीं खाता ज्यादा ! ये तो इतनी सारी हैँ ! आप नहीं लोगी ,,ले लो ना थोड़ी सी !
बालहठ के सामने राजवती जी नतमस्तक हो गयी ! वैसे तो ये उनकी पसंदीदा मिठाई थी ! बस थोड़ा सा मुंह में मिठास घुली ही थी कि बहुरानी गीता आ धमकी !
गीता – तेरे नाना क्या इसलिये ही इतना पैसा खर्च करके तेरे लिए खाने को लाते हैँ कि तू ऐरे गैरों को खिलाता फिरे !
गीता ने तुरंत राजवती जी के हाथ से मिठाई छीन ली !
गीता – आप क्या करेंगी खाकर ! इस से अच्छा तो मेहमानों को खिला दूंगी ! आपकी भी आदत बिगड़ रही है दिन पर दिन ! कानखोलकर सुन लिजिये आज के बाद अगर शुभम से कोई भी चीज चोरी से मंगवायी तो मुझसे बुरा कोई नहीं !
शुभम – मम्मा ये तो पापा की मम्मा हैँ ,,आप मेरी दादी से ऐसे कैसे बात कर सकते हो ! इन्होने चोरी नहीं की ! मैने दी हैँ इन्हे मिठाई ! दादी ने नहीं मंगायी !
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गीता – ज्यादा आया दादी दादी करने वाला ,,ज्यादा जबान चलने लगी हैँ तेरी बूड्ढों के साथ रहकर ! जा अपना होम वर्क कर !
राजवती जी पल्लू से आंसू पोंछती हुई अपनी टूटी हुई चारपाई पर आकर बैठ गयी ! पति की तस्वीर से घंटों बाते करती रही ! बोली – राजू के बापू अब तिरस्कार सहन नहीं होता ! पूरा जीवन बच्चों की परवरिश में गुजार दिया हमने ! उसका ये सिला मिला हैँ हमें !
पर अब नहीं ! अब तिरस्कार सहन नहीं !
मन में कुछ प्रण लिए राजवती जी सो गयी !
अगली सुबह होते ही गीता चिल्लायी ! मम्मी जी ये क्या अपने आज झाडू भी नहीं लगायी ,ना चाय बनायी ना नाश्ता ! कितना समय हो गया हैँ ! क्या हो गया हैँ आपको !
राजवती जी – मुझे कुछ नहीं हुआ ! मैं सास हूँ और ये घर मेरा और मेरे पति का है ,ये एहसास हो गया है मुझे ! तुम लोग इस घर से जा सकते हो !अगर आज ही ये घर खाली नहीं किया तो कल पुलिस को बुलाऊंगी !
गीता और राजू राजवती जी का चेहरा ही देखते रह गए !
राजवती जी का फैसला अडिग था ! राजू और गीता किराये के घर में रहने लगे ! शुभम आ जाता हैँ दादी के पास रोज ! उसे वो तरह तरह के पकवान बनाकर खिलाती हैँ ! और घंटों उस से बैठकर बातें करती हैँ !
पाठकों ,,राजवती जी का फैसला गलत था य़ा सही बताईयेगा ज़रूर !!!!
स्वरचित
मौलिक अप्रकाशित
मीनाक्षी सिंह
आगरा
Good decision
एकदम सही फैसला लिया राजवती जी ने. लोग क्या कहेंगे ये सोचकर अक्सर हम अपनी खुशिया दाबाके रख ते हैं जों की सही नही हैं. 🙏😄
कहाणी बहोत अच्छी हैं. हर बार कोई नई बात सिखा जाती हैं. धन्यवाद 🙏😊