आत्मसम्मान – के कामेश्वरी : Moral Stories in Hindi

सरस्वती भगवान के सामने हाथ जोड़कर आँखों में आँसू भरकर विनती कर रही है कि हे भगवान मुझे आपने अपने पास बुलाना भूल गए हो क्या ? और कितने दिन मुझे यह सब सहना पड़ेगा । मैंने ऐसी कौनसी ग़लतियाँ की हैं जिसके कारण मेरे आत्मसम्मान को हमेशा ठेस पहुँचती रहती है । किस बात की सज़ा मुझे मिल रही है । सरस्वती है कौन उसके साथ ऐसा क्या हो रहा है जिससे वह इतनी दुखी हो गई है ।

सरस्वती आँध्रप्रदेश में एक छोटे से गाँव में रहतीं हैं ।  उनके तीन बेटे और एक बेटी है ।

 सरस्वती के पति राजेश जी की कपड़े की दुकान भाई विशाल के साथ साझे में थी । दोनों भाइयों में प्यार बहुत था इसलिए अंत तक वे एक साथ एक ही घर में रहते थे ।

विशाल जी की तीन लड़कियाँ और एक लड़का था । बच्चे सब एक ही जगह पल रहे थे ।

विशाल की पत्नी रुक्मिणी बहुत होशियार थी । उसने अपने बच्चों को अच्छे से पढ़ाया लिखाया था । उसने अपने बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया । उनकी लड़कियाँ भी नौकरी करतीं थीं ।

इधर सरस्वती बहुत ही भोली भाली थी । उसने अपने बच्चों पर कभी सख़्ती नहीं बरती थी। इसलिए उनके तीनों बेटों ने सिर्फ़ डिग्री तक की पढ़ाई पूरी की थी । लड़की ने तो दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दिया था तो उन्होंने उसकी शादी अठारह साल की उम्र में ही कर दी ।

बड़े बेटे ने बी.एड. किया और वहीं गाँव में टीचर बन गया था।उसकी शादी सुवर्णा से हुई। सुवर्णा बहुत ही अच्छी पढ़ी लिखी थी । वह भी एक छोटे से स्कूल में टीचर की नौकरी करने लगी थी । वह संयुक्त परिवार में ख़ुशी से ढल गई थी ।

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इस बीच घर में बहुत से बदलाव आए थे । देवरानी ने अपनी तीनों बेटियों की शादियाँ करा दी थी ।

सरस्वती के दूसरे बेटे की शादी तो हुई थी परंतु उसका दूसरा बेटा केंसर से छोटी सी उम्र में ही माता-पिता को गम देकर अपनी पत्नी को छोड़कर चला गया था ।

उसके बच्चे नहीं थे तो उन्होंने ही बहू को दूसरी शादी के लिए प्रोत्साहित किया और उसकी शादी भी कराई थी ।

अब तीसरे बेटे की शादी करानी थी । बहुत से रिश्तों में से हैदराबाद की ही लड़की कल्पना उन्हें बहुत पसंद आ गई थी तो माता-पिता ने उससे ही शादी तय किया था जो हैदराबाद में ही नौकरी भी कर रही थी ।

यहाँ तक ठीक चल रहा था कि एक दिन सरस्वती के पति दुकान से घर आते हुए रास्ते में गिर गए थे । उन्हें लोग अस्पताल लेकर गए थे परंतु तब तक उनकी मृत्यु हो गई थी । उन्होंने अपनी पत्नी को रोते बिलखते हुए छोड़ दिया था ।

एक दिन सरस्वती को देवर ने बताया था कि भाभी भैया ने घर, खेत,और बैंक बैलेंस सब आपके नाम कर दिया है शायद उन्हें पहले से ही आभास हो गया था कि वे कुछ दिनों के ही मेहमान हैं । आप सब सँभाल कर रख लीजिए कहते हुए काग़ज़ात सरस्वती को सौंप दिया था ।

सरस्वती की आँखों से आँसू बहने लगे थे कि उन्हें मेरी कितनी फ़िक्र थी। इसलिए पहले से ही सब मेरे नाम कर दिया है ।

सरस्वती रसोई में काम कर रही थी कि रुक्मिणी वहाँ आई और बिना किसी भूमिका के कहने लगी कि दीदी आपके देवर इस घर में अपने हिस्से को बेचना चाह रहे हैं ।

सरस्वती के सर पर बिजली गिर गई हो । उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि देवर इस तरह से अपने हिस्से को बेच कर चले जाने की बात कहेंगे । उसने बात को बढ़ाते हुए कहा कि आपको तो मालूम है ना दीदी हमारे बेटा बहू काकीनाड़ा में रह रहे हैं  ना हम सोच रहे थे कि हम भी वहीं घर ख़रीद लेंगे और बेटे बहू के पास रहेंगे । इसलिए आप अपने पोर्शन में शिफ़्ट हो जाइए ।

सरस्वती अपने बेटे बहू और दो पोतों के साथ वहाँ अपने पोर्शन में शिफ़्ट हो गई । इतने सालों से साथ रहे देवर देवरानी घर बेचकर बेटे के पास काकीनाड़ा चले गए थे ।

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उन सबके जाते ही सरस्वती के बच्चों ने माँ को सताना शुरू कर दिया था कि जायदाद हमारे नाम कर दो । सरस्वती बहुत भोली थी । इसका फ़ायदा बेटे उठा रहे थे। उन्हें भावनात्मक रूप से धमकी देने लगे थे कि अगर जायदाद हमारे नाम नहीं करोगी तो हम दोनों तुम्हारी देखभाल नहीं करेंगे ।

चाचा जी को बिना बताए अपने किसी दूसरे रिश्तेदारों को मध्यस्थ की भूमिका देकर सारी जायदाद और माँ का गोल्ड सब आपस में दोनों बाँटने लगे । यह बात दूसरी बहू को जैसे ही पता चली उसने भी पुलिस की धमकी दी और अपना हिस्सा लेकर गई थी ।

बेटी और माँ को कुछ नहीं दिया था । अब माँ की देखभाल की बारी आई तो दोनों भाइयों ने सबके सामने यह फ़ैसला कर लिया था कि माँ छह महीने बड़े भाई और छह महीने तक छोटे भाई के घर में रहेंगी।

चाची को जैसे ही यह बात पता चली तो वे भागते हुए आई और सरस्वती के बच्चों से कहा कि माँ का बँटवारा मत कीजिए यह गलत बात है । उसे इतनी स्वतंत्रता तो दो कि वह जितने दिन जहाँ रहना चाहती है रह लेंगी ।

बच्चों ने उनकी बातें नहीं सुनी और माँ को बाँट लिया । रुक्मिणी ने जब देखा कि बच्चे उनकी भी बात नहीं सुन रहे हैं तो वे चुपचाप वहाँ से चली गई थी । अब बेटों को देखे तो बड़ा बेटा जगन्नाथ अपनी माँ को छह महीने होते ही उन्हें एक दिन भी ज़्यादा नहीं रखता था । उसकी देखा देखी छोटा मोक्ष भी वही करता था ।

अब बात यहाँ तक ठीक है फिर क्यों हम उनकी बात कर रहे हैं ।

चलिए मैं आपको बता देती हूँ कि बात क्या है?

सरस्वती अपने दोनों बेटों को एक ही जैसे प्यार करती थी।  लेकिन बहुओं ने उनके साथ भेदभाव करना शुरू किया था।  बड़ी बहू सुवर्णा थोड़ी अच्छी थी क्योंकि वह बहुत पहले से ही संयुक्त परिवार में रहती थी । वह सास की अच्छी देखभाल करती थी समय पर खाना पीना उनके कपड़े धोना रहने के लिए उनको एक कमरा भी दिया।

पूरी प्रॉब्लम की जड़ छोटी बहू कल्पना ही थी । वह खुद कोई काम नहीं करती थी । उसका पति ही खाना बनाता था और उसके कपड़े मशीन में डाल दिया करता था । यहाँ तक बात ठीक है नौकरी करती है तो इतने नखरे तो करेगी ही ।

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सरस्वती यहाँ जब भी आती है  कल्पना हमेशा उसके साथ गाली-गलौज करती है और खाना भी ठीक से नहीं देती है। मोक्ष उसे कुछ नहीं कहता है । सुवर्णा जब फ़ोन करके पूछती है कि आप हैदराबाद में अच्छे से हैं तो सरस्वती कहती हैं कि हाँ मैं खुश हूँ क्योंकि फोन मोक्ष का है और वह वहीं बैठा रहता है ।

 हैदराबाद में रहने वाले रिश्तेदारों को जब पता चला कि उनकी हालत नाज़ुक है तो उन्होंने जगन्नाथ को बताया कि तुम्हारी माँ की हालत अच्छी नहीं है। इस बीच चाची ने और उनके कई रिश्तेदारों ने उनसे कहा कि हमारे घर में आकर रहिए हम सब मिलकर आपकी अच्छे से देखभाल करेंगे परंतु सरस्वती में आत्मसम्मान कूटकर भरा था वह उस ज़माने में ही दसवीं पास थी ।

उनके पिताजी स्कूल के प्रिंसिपल थे । उन्होंने अपनी सभी लड़कियों को भी पढ़ाया लिखाया था इसलिए लड़कियों में आत्मसम्मान की कमी नहीं थी । सरस्वती ने अपने रिश्तेदारों और देवरानी को भी कह दिया था कि मैं अपने बेटों के साथ खुश हूँ ।

असली बात तो यह है कि कल्पना और मोक्ष उसे ठीक से खाना नहीं देते हैं तो वह कमजोर हो गई है फिर भी किसी को अपने दिल की बात नहीं बताती थी ।

जब सरस्वती ने किसी की बात नहीं सुनी तो रुक्मिणी ने बड़ी बहू सुवर्णा को फोन किया और कहा तू तो अपनी सास के बारे में जानती हो ना हमारे बुलाने पर भी हमारे घर नहीं आ रही है । मैं चाहती हूँ कि तुम लोग ही उन्हें अपने पास रख लोना पैसे चाहे तो मैं भेज दूँगी परंतु उसके अंतकाल में उसे ख़ुशियाँ दे देना ।

।सुवर्णा अच्छी थी पर उसके पति को लगता है कि भाई के बच्चे भी नहीं है जायदाद में हिस्सा भी बराबर का लिया है तो माँ की ज़िम्मेदारी से कैसे भागेगा । इसलिए माँ को तकलीफ़ हो रही है फिर भी वह भाई के घर भेजता ही था ।

एक दिन मामा का फ़ोन आया था कि हैदराबाद में भाई के घर में तुम्हारी माँ चक्कर खाकर गिर गई है।  मैंने पड़ोसी के फोन पर अपने बेटे को वहाँ भेजा तो उसने अपने भतीजे को रोते हुए बताया था कि मुझे जीने की इच्छा नहीं है मैं सुसाइड कर लेना चाहती हूँ ।

इन फोन कॉल को सुनकर जगन्नाथ और सुवर्णा हैदराबाद पहुँचे तो देखा सरस्वती एक दम कमजोर अवस्था में पलंग पर पड़ी हुई है । मोक्ष और कल्पना अपने कमरे पकोड़े खाते हुए मूवी देख रहे थे । बड़े भाई भाभी को अचानक देखते ही दोनों चकरा गए थे ।

सुवर्णा ने सास को इस हाल में कभी नहीं देखा था । सरस्वती हँसमुख थी अपने चेहरे पर कभी दुख के भाव नजर नहीं आते थे । उन्हें देखते ही कल्पना डरकर अपनी दलीलें दे रही थी कि सासुमाँ बहुत ख़राब है मुझे बहुत सताती है ।

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सुवर्णा और जगन्नाथ ने उनसे कुछ नहीं कहा और न ही उनसे बातें की । अपनी माँ को लेकर शाम की ट्रेन से अपने गाँव के लिए रवाना हो गए।

उन्होंने सोचा था कि कल्पना और मोक्ष में इस तरह से उनके आने और माँ को अपने साथ ले जाने से शर्मिंदगी महसूस होगी और उनके पीछे आकर माफ़ी माँगेंगे कुछ तो सीखेंगे।  लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ कल्पना ने तो तुरंत अपने पिता को फ़ोन किया और कहा कि मेरी सास चली गई है आप कल यहाँ आकर हमारे साथ रहिए ।

उसके पिता बहुत अच्छे थे । उनको बहुत सारी बातें नहीं मालूम थी । कल्पना का सास के साथ व्यवहार उन्होंने कभी देखा नहीं था । उन्हें लगता था कि कल्पना उसकी सास की अच्छी देखभाल करती होगी। कल्पना के घर में रहने के लिए जब वे आए तब उन्हें उनके पड़ोसियों से पता चला कि वह सास को गालियाँ देती थी और उन्हें खाना भी नहीं खिलाती थी। यह तो अच्छा हुआ कि बड़ा बेटा और बहू आकर उन्हें अपने घर ले गए नहीं तो वह यहाँ रहती तो मर ही जाती थी ।

उन्होंने कल्पना से कहा कि बेटा मैं भी तुम्हारे पति के लिए वैसा ही हूँ जैसे तुम्हारे लिए तुम्हारी सास । जहाँ उनकी इज़्ज़त नहीं वहाँ मैं नहीं रह सकता हूँ । भगवान ने मुझे बेटे नहीं दिए अच्छा हुआ नहीं तो मेरी हालत भी तुम्हारी सास के समान ही होती थी । उनमें आत्मसम्मान इतना है कि उन्होंने आज तक मुझे भी नहीं बताया था । जिस घर में बुजुर्गों का सम्मान नहीं वहाँ मैं क़तई नहीं रह सकता हूँ । कहते हुए उल्टे पाँव वापस चले गए।

दोस्तों हम बहुओं को दोषी ठहराते हैं कि वे अपने सास ससुर की देखभाल नहीं करती हैं लेकिन उनके खुद के नालायक बेटों के लिए क्या कहें जिन्हें अपनी माँ नहीं उसकी जायदाद से प्यार है ।

स्वरचित

के कामेश्वरी

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