आक्रोश बन गया शक्ति – लतिका श्रीवास्तव

पूरे गांव में लाउडस्पीकर से घोषणा की जा रही थी गांव की बेटी का सम्मान समारोह …..जल्दी आइए आप सभी आइए…..”मिनी गदगद थी आज ….आज के समारोह के लिए नई कांजीवरम साड़ी खास उसके लिए आशा ने भिजवाई थी अपने संदेश के साथ “….. दीदी मेरे आक्रोश को आज मंजिल मिल गई है सारा श्रेय जिसे जाता है वो आप ही है समारोह में  इसी साड़ी  में मैं आपको देखना चाहती हूं  ….”आपकी चिर ऋणी आशा”

मिनी के पांव आज जमीन पर नहीं पड़  रहे थे और दिमाग में आज सुबह से आशा का पूरा अतीत सजीव हो रहा था….वो तो आशा के पड़ोस में ही रहती थी।

उठ जल्दी आशा देख सूरज चढ़ आया है सिर पे …मां ने फिर से आशा की चादर खींचते हुए जोर से कहा तो आशा जो अपने किशोर वय की सपनीली दुनिया में बेसुध थी अपनी सपनिली आंखों को अधमुंदा कर फिर से चादर ओढ़ कर सो गई थी।

ये लड़की भी बावरी सी होती जा रही है एरी उठ जा इस बार मां ने पानी डाल दिया था उस पर…हड़बड़ा कर उठ बैठी थी क्या मां मुझे ही उठाने की पड़ी रहती है तुमको वो देखो भैया अभी तक सोया पड़ा है उसको भी उठाओ ना कहती आशा पुनः सोने की तैयारी कर ही रही थी कि पिता की वजनदार आवाज सुन सहम गई लच्छन ठीक नहीं है इसके बड़ी तो हो रही है पर सहूर और कायदा कौड़ी भर नहीं आया अभी तक ….वो कहते जा रहे थे और आशा जल्दी जल्दी अपना बिस्तर समेट कर मां के पास पहुंच गई थी।

चल अब जल्दी सबके लिए चाय चढ़ा पहले फिर भैया के लिए टिफिन बना ले….उसे देखते ही मां ने कहा तो वो फिर से चिढ़ गई केवल भैया के लिए टिफिन क्यों!! मैं भी तो स्कूल जाऊंगी मेरा टिफिन नहीं बनेगा क्या??

हां आज तू स्कूल नहीं जाएगी और आज ही नहीं पूरा एक हफ्ता ना जाएगी…मां ने कहा।

क्यों मां क्यों नहीं जाऊंगी स्कूल…उसे याद आया स्कूल में कितनी पढ़ाई हो जायेगी तब तक

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तेरे पिता के दूर के रिश्तेदार वो मोहन काका अपने परिवार सहित अपने घर आ रहे हैं यहां किसी डॉक्टर का इलाज करवाना है उन्हे तो अपने घर पर ही रुकेंगे।

और भैया..!!वो भी नहीं जायेगा स्कूल आशा ने आशंकित हो पूछा तो मां नाराज हो गई

जब देखो तब भैया भैया की हिरस करती रहती है अब तू छोटी नहीं है बड़ी हो गई है…तू लड़की जात है तेरा नसीब ही अलग है तेरी जिंदगी भैया की जिंदगी से एकदम अलग है …मां ने लगभग डांटते हुए कहा था।

क्यों अलग क्यों है अभी तक तो भैया के साथ सोना उठना हंसना स्कूल जाना करती थी अचानक लड़की जात बड़ी ये सब क्या है मां…. ये हम दोनो का घर तो है मां फिर वो मुझसे बड़ा है उसको ज्यादा काम करना चाहिए मां घर के सारे काम भी मैं ही करूं सुबह भी सबसे पहले मैं ही उठूं और सारा काम करने के बाद भी स्कूल मेरा बन्द किया जा रहा है भैया को बढ़िया है ना कोई काम ना धाम फिर भी सब कोई ख्याल भी उसका ही रखते है …वो स्कूल जाना ही नहीं चाहता पर सब कोई उसे स्कूल जरूर भेजते हैं….लड़की जात क्या होता है मां..!आक्रोशित हो उठी थी आशा।

जुबान मत चला अपना काम कर जो तेरी मां बता रही है नहीं तो हमारा हाथ उठ जाएगा….पिता की गर्जना सुन कर भी वो आज डरी नहीं थी।…पर मैं स्कूल जरूर जाऊंगी अभी जितना काम करवाना हो करवा लो…भैया को स्कूल के लिए तैयार होते देख वो जिद कर बैठी….।तैयार होकर आ गई ….टिफिन नहीं देने पर चिल्लाने लगी …।जा तू घर का काम करवा मेहमान आते ही होंगे पिताजी का गुस्सा देखा है ना …भैया उसकी हंसी उड़ा रहा था और आशा आज रण चंडी बन गई थी।

आशा काम कर आशा जल्दी उठ आशा चाय बना दे आशा बहस मत कर आशा स्कूल मत जा….सुन सुन कर और उसी घर में अपने से महजएक साल बड़े भैया का मान सम्मान दुलार ख्याल देख देख कर बड़ी होती आशा के मन का  आक्रोश इसी तरह फूट पड़ता था…आज भी वो विद्रोहिणी हो गई थी..अपना स्कूल बैग लेकर आ गई।

अचानक पिता ने आकर उसके हाथ से स्कूल बैग छीन लिया और एक थप्पड़ गालों पर लगा घर के अंदर धकेल सा दिया…..धरती पर मुंह के बल गिर गई थी आशा ….पर आज उसकी आंखों में एक भी आंसू नहीं आए थे…..वो फिर से उठी और किसी की भी परवाह किए बिना स्कूल की तरफ दौड़ लगा दी….!

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मुश्किल से स्कूल पहुंची ही थी पीछे से पिता दुर्वासा बने आ गए और सबके सामने उसे थप्पड़ लगाते हुए लगभग खींचते हुए घर की तरफ ले गए….वो चीखती रही रोती रही पूरा स्कूल असहाय सा उसे पशु सम खिंचता देखता रहा।

रोज रोज आशा की अपने अधिकारों के लिए उठती आवाज पर घरवालों के दमनकारी अत्याचार बढ़ते जा रहे थे और धधकता जा रहा था आशा के भीतर आक्रोश का एक ज्वालामुखी ..!

आशा का ये आक्रोश महज घरेलू काम करवाने के कारण नहीं था बल्कि अपने ही घर में अपने ही घरवालों द्वारा मात्र लड़की होने के कारण उस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध थे भैया को वो प्यार करती थी लेकिन लड़का लड़की के इस असहनीय भेदभाव ने भाई के प्रति उसके दिल में नफरत की खाई खोद दी थी जिसे पाटने की कोशिश बड़े भाई की तरफ से भी कभी नहीं की जाती थी….।

सुप्त ज्वालामुखी थी आशा की मां भी जिसने अपने अंदर सुलगती आग के साथ खामोश रह जिंदगी बिताना सीख लिया था…आत्मा को मारकर

लेकिन उसकी बेटी अपने अंदर की इस आक्रोश की अग्नि को रोज प्रज्वलित करती रहती थी और उसी अग्नि में स्वयं को दग्ध करती रहती थी

उस दिन सुबह भोजन के समय पर भाई और पिता साथ खाना खाने बैठे.. मां ने हमेशा की तरह आशा से रोटी सेक कर लाने बोला ही था कि मानो चिंगारी लगा दी थी आशा तुरंत चौके से बाहर आकर भाई के साथ बैठ गई थी.. मां मेरी थाली भी लगाओ मैं भी भाई के साथ ही खाऊंगी ये रोज रोज सबको खिलाकर बाद में  खाना मैं ही क्यों खाऊं भैया क्यों नहीं खाता बाद में ….मुझसे भी नहीं होगा…।

इस अप्रत्याशित व्यवहार से मां डर गई सहम कर उसके पिता की तरफ देखने लगी ….पिता ने उसकी थाली उठाकर फेंक दी थी “….सीख ले ले अपनी मां से और आदत डाल ले पराए घर जाकर कैसे रहना है….सबको बना खिला कर जो बच जाए वही खाना है तुझे भी…..तेरी हरकतें दिन प्रीतिदिन बढ़ती जा रहीं हैं दिमाग ठिकाने लगाना ही पड़ेगा …अपनी थाली परे हटा कर आज वो आशा पर पिल ही पड़े थे….चप्पल लकड़ी जो भी दिखी सबका प्रयोग अपनी ही बेटी पर किए जा रहे थे और आशा चीखती जा रही थी पर वहां से हटने का नाम नहीं ले रही थी….मिनी पड़ोस में रहती थी चीख पुकार की आवाजे सुन इस बार वो अपने आपको रोक नहीं पाई तेजी से आशा के घर के अंदर आ गई थी…..देखा …..एक पिता को अपनी ही मासूम बेटी का जल्लाद बने हुए…. एक विवश दबी घुटी मां के बेटी को बचाने के असफल प्रयास करते हुए….. एक भाई को तटस्थ हो दर्शक की भूमिका निभाते हुए ….

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थर्रा उठी थी मिनी ऐसा दृश्य देख कर ….आशा तो मानो आज ज्वालामुखी बन गई थी…अपने पिता से चिल्लाती कह रही थी हां हां मार डालिए मुझे आज आप…. नही जीना मुझे भी ऐसी जिंदगी  और मारिये और मारिए….!मिनी को  देखते ही आशा की मां दौड़ कर उसके पास आ गईं थीं दीदी दीदी आप कुछ करिए मेरी बेटी आज मर जायेगी …..

मिनी ने तत्काल आशा को उसके पिता के बेरहम हाथों से जोर लगा कर  छुड़ाया और अपने दोनो हाथो से उसे सहारा देती अपने घर ले आई थी दरवाजा बंद कर दिया था उसने ताकि उसके पिता वहां भी ना आ जाएं।

मुझे जाने दीजिए …..मुझे मर जाने दीजिए मैं इनकी बेटी नहीं हूं मैं तो एक लड़की हूं बस ….इनका तो बस ये भाई ही सब कुछ है ….आवेश आक्रोश ने आज उसे अंधा कर दिया था।

उस दिन मिनी ने बहुत प्यार से बहुत मुश्किल से आशा को संभाला था खाना बना कर खिलाए था फिर बड़े प्यार से समझाया था”…बेटा मैं तेरा ये अंदर का आक्रोश महसूस करती हूं क्योंकि मैं भी एक लड़की ही हूं इसी समाज की….सदियों से चला आ रहा है ये भेदभाव बदलने में समय लगेगा पर बदलेगा जरूर….लेकिन इस तरह से नहीं बदलेगा जैसा तुम कर रही हो ….ये बगावत पिता से विद्रोह भाई से नफरत मार पीट ये सब गलत तरीके हैं…!

तो फिर मैं क्या करूं दीदी इसके अलावा …चुपचाप उनकी बाते मानती रहूं दब कर जीती रहूं घुट घुट कर रहूं अपने ही घर में….अपने लिए मुझे ही लड़ाई करनी पड़ती है दीदी कोई नही करता…मेरी मां को भी मुझे पिटते हुए देखने में मजा आता है मेरा बड़ा भाई अपनी छोटी बहन का साथ नहीं देता ….क्या घर ऐसा होता है दीदी..!

हां आशा ये बात तुमने सही कही है बेटा कि सबको अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है ….लड़ाई लड़ो पर तरीके बदल लो ताकि तुम्हारी लड़ाई का कोई सार्थक परिणाम मिल सके…मिनी ने संजीदगी से समझाया तो आशा समझ नहीं पाई की लड़ाई का और भी कोई तरीका हो सकता है क्या!!




तुम्हे अपने भाई की बराबरी करनी है ना … तुम्हें अपने आपको भी योग्य साबित करना है ना …तो तुम मेरा कहना मानो अपना पूरा ध्यान आज से अपनी पढ़ाई में लगा दो अपना सारा आक्रोश सारा गुस्सा सारी ऊर्जा अपनी पढ़ाई में लगा दो देखना जिस दिन तुम भाई से ज्यादा अच्छा रिजल्ट लाओगी भाई से ज्यादा अच्छा भविष्य बना लोगी….तुम लड़ाई जीत जाओगी तुम पढ़ाई लिखाई को ही अपनी लड़ाई का सबसे बड़ा अस्त्र बना लो…जिस दिन तुम किसी जिम्मेदार पद पर पहुंच जाओगी यही परिवार और समाज लड़कियों की आजादी और बेहतरी के लिए किए जाने वाले तुम्हारे प्रयासों को बातो को सुनेगा समझेगा और समर्थन करने पर बाध्य हो जायेगा ….तभी इस लड़ाई का और तुम्हारे अंदर उफनते इस आक्रोश का सार्थक उपयोग होगा।

आक्रोश में बहुत ताकत होती है जैसे कोई उफनती बेगवती नदी …..सही दिशा देने पर बंजर भूमि लहलहा उठती है  और गलत दिशा होने पर प्रलयंकारी बाढ़ बन जाती है।

आशा को बात समझ में आ गई थी उस दिन के बाद से मिनी को पड़ोस के घर से कभी भी मार पीट चीखने चिल्लाने की आवाजे नहीं सुनाई पड़ीं …पिता और भाई इस शांत हो चली हमेशा पढ़ाई लिखाई करने वाली आशा को देख चकित थे ….मां खुश थी …।

आज आशा के गांव में बहुत रौनक थी पूरा गांव आशा के मां पिता को बधाई दे रहा था सम्मान कर रहा था क्योंकि आज उनकी बेटी आशा पुलिस अधिकारी बन कर पहली बार गांव आ रही थी….उसका बड़ा भाई जो पढ़ाई में अपनी बहन से हमेशा पिछड़ता ही गया अंत में घर के ही काम काज करने लगा…..लड़की समझ उसे दबा कर रखने वाले उसके पिता आज खुद अपनी बेटी के लिए अपने हाथो से बना कर एक पुष्पहार लाए थे बड़ी बेसब्री से अपने बेटे से भी बढ़ कर निकलने वाली अपनी होनहार बेटी की प्रतीक्षारत उनकी आंखो में गर्व और आनंद के अश्रु थे।

दोस्तों भेदभाव किसी के भी मन में आक्रोश को जन्म दे देता है इसको बढ़ने का मौका ना दें…उसके कारणों का पता लगा कर समाधान में जुट जाएं सही दिशा देंगे तो वही आक्रोश आपकी सफलता की शक्ति बन सकता है।

#आक्रोश 

लतिका श्रीवास्तव

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