आखिरी निर्णय – मंजू ओमर : Moral Stories in Hindi

भाई कैसे हो , ठीक हूं और तू बता कैसा चल रहा है तू तो बेटे के पास गई थी न कब आई वहां से । हां भइया मैं आ गई वापस और आज एक निर्णय लिया है कैसा निर्णय ,यही कि अब मैं अपने घर पर रहूंगी ।घर पर रहोगी अकेले कैसे ? अकेले क्या मतलब लोग रहते नहीं है अकेले क्या अब भगवान ने अकेले कर दिया है तो अकेले ही रहेंगे न ।

भइया इंसान अगर ठान लें न तो वो कुछ भी कर सकता है ।और आप भी तो बार बार कह रहे थे न कि कोई निर्णय लो रेणुका ,ये क्या हैं तुम बहू बेटे के पास गई थी और अपमान का घूंट पीकर वापस आ गई। कैसे चलेगा ऐसे , क्योंकि बेटे घर से काफी दूर है और बार बार आने जाने से तुम्हें परेशानी भी तो होती है ।

नये सिरे से घर की सारी व्यवस्था करनी पड़ती है ।और फिर तुम्हारी भी तो उम्र हो रही है 64 साल की हो रही हो एक जगह रहने का निर्णय तो लेना पड़ेगा न। हां भइया सारी जिंदगी मान सम्मान से रही हूं । कभी किसी पर आश्रित नहीं रही हूं सबके लिए किया ही है कभी करवाया नहीं है । कभी किसी ने थाली परस के खिलाया नहीं है हमेशा हमने ही सबके लिए आगे से आगे किया है ।और अब बुढ़ापे में अपना आत्मसम्मान खोकर बहू बेटों के पास नहीं रह सकती।

                    रेणुका और अविनाश की अपनी एक दुनिया थी ।दो बेटे थे दोनों बेटों की शादी हो चुकी थी और दोनों अपनी अपनी नौकरी में व्यस्त थे ।एक बेटा मुम्बई और एक हैदराबाद में था । अविनाश और रेणुका अपने घर झांसी में रहते थे । दोनों बहुएं भी नौकरी पेशा थी । कभी कभी दोनों बहू बेटे घर आते थे कोई त्यौहार है या कोई अन्य मौका हो तब ऐसे नहीं।

अविनाश और रेणुका अपने घर में रहते थे आराम से जिंदगी कट रही थी । पैसे रूपए की भी कोई दिक्कत न थी बेटों से लेने की कभी जरूरत नहीं पड़ती थी। बहुएं ज्यादा मतलब नहीं रखतीं थीं सास ससुर से और नहीं कभी सास ससुर को अपने घर बुलाती थी ।बेटे भी नहीं कहते थे कि मम्मी पापा आप लोग आ जाओ कुछ दिन को हमारे पास। कभी कभी अकेले रहते रहते अविनाश और रेणुका का मन ऊब जाता था तो वो सोचते थे कि कुछ दिन बहू बेटे के पास रह ले लेकिन बहू बेटे कभी कहते ही नहीं थे कि हमारे पास आओ ।

                              ऐसे ही हंसी खुशी से रेणुका और अविनाश की जिंदगी कट रही थी कि एक रात अविनाश जी सोएं तो फिर उठे ही नहीं ।सुबह देर तक उनको सोने की आदत थी । रेणुका को तो तड़के ही उठकर चाय पीकर अपना ध्यान प्राणायाम करती थी और घर के अन्य काम भी निपटा देती थी तब जाकर अविनाश जी का उठना होता था।

आज रेणुका ने नाश्ता भी बना लिया तब भी अविनाश जी नहीं उठे तो रेणुका ने आवाज दी लेकिन कोई जवाब न मिलने पर रेणुका ने पास जाकर हिलाया डुलाया कोई हरकत न देखकर अपने फैमिली डाक्टर को फोन किया । डाक्टर ने बताया कि इनकी तो सुबह पांच छै बजे के करीब मृत्यु हो चुकी है। सुबह-सुबह हार्ट अटैक आया होगा। रेणुका की तो जैसे दुनिया उजड़ गई । अभी रात को तो अच्छे से बातचीत हुई खाना आया फिर अचानक से क्या हो गया लेकिन अनहोनी को कौन टाल सकता है ।

                 फिर आसपास के लोगों ने डीप फ्रीजर का इंतजाम किया और अविनाश जी को उसमें रखा गया फिर रेणुका जी ने बेटों को खबर की । आख़िर बेटों को इतनी दूर से आने में वक्त तो लगेगा न ।रात तक दोनों आ पाए । अविनाश जी का अंतिम संस्कार दूसरे दिन किया गया।अब तेरह दिन तो रूक नहीं सकते थे हालांकि रेणुका की इच्छा थी कि अविनाश जी का अंतिम काम अच्छे से विधी विधान से हो लेकिन बच्चों के पास इतना समय नहीं था कि वो तेरह दिन रूकते सारा काम पांच दिन में निपटा दिया गया।

                      आज अविनाश जी का सारा कार्यक्रम निपटा गया और दूसरे दिन दोनों बेटे और बहू जाने की तैयारी करने लगे लेकिन दोनों बहू बेटों में से कोई ये नहीं सोंच रहा है कि मां अब अकेले कैसे रहेंगी । वैसे तो रेणुका जी बहुत समझदार , मेहनती और घर बाहर का सारा काम खुद ही निपटाती थी वो किसी भी तरह से किसी पर भी आश्रित नहीं थी।और इस उम्र में भी जोश से भरी हुई और फुर्तीली थी।सारा काम खुद ही करती थी । फिर भी उन्हें उम्मीद थी कि जाते हुए बहू बेटे उनसे कहेंगे कि मम्मी हमारे साथ चलो क्यों कि अभी अभी अविनाश जी नहीं रहे हैं और तुरंत ऐसी स्थिति में रहना थोड़ा मुश्किल हो जाता है । लेकिन एक क्या दोनों में से किसी ने भी कुछ नहीं कहा और जाने की तैयारी कर ली ।

              चले गए दोनों बेटे और बहू रेणुका जी यहां अकेली रह गई।अब रेणुका जी का यहां समय नहीं कटता था अविनाश जी थे तो खाने पीने के शौकिन थे उन्हीं के बहाने से कुछ न कुछ बन जाता था ।अब तो कुछ बनाने की ही मन नहीं करता था एक बार कुछ बना लिया बस उसी से काम चल जाता था। सोचने लगी क्यों न कुछ समय के लिए बहू बेटे के पास चली जाऊं तीन साल का पोता है तो उसी के साथ थोड़ा मन बहल जाएगा।

आज दो महीने हो गए थे अविनाश जी को गए कुछ सोच कर रेणुका जी ने बड़े बेटे मंयक को फ़ोन किया बेटा अब यहां तेरे पापा के बगैर अच्छा नहीं लगता सोच रही हूं कुछ समय के लिए तुम्हारे पास ही आ जाऊं । ऐसा क्यों होता है कि बेटा बहू तो बेझिझक मां बाप के घर आ जाते हैं लेकिन मां बाप बच्चों के यहां बेझिझक नहीं जा पाते ।हक़ से नहीं जा पाते।देखता हूं कहकर मंयक ने चुप्पी साध ली महीने भर तक कोई जवाब नहीं दिया । फिर रेणुका ने छोटे बेटे शशांक को फोन किया बेटा सुनो मैं सोच रही हूं कुछ समय के लिए तुम्हारे पास आ जाऊं । हां मां आपकी बहू प्रेगनेंट हैं अभी कुछ दिन रूक जाओ फिर डिलीवरी के एक महीने पहले आ जाना आपकी जरूरत पड़ेगी।

                    बड़े बेटे मंयक ने तो कोई जवाब दिया नहीं लेकिन तीन महीने बाद शशांक ने मां को बुलाया क्यों कि उसकी जरूरत थी । शशांक ने फ्लाइट का टिकिट बुक करा दिया और रेणुका जी हैदराबाद पहुंच गई ।बहू का आठवां महीना चल रहा था एक महीने बाद डिलिवरी थी एक महीने तक रेणुका जी उस बहू की खूब अच्छे से देखभाल की । फिर बहू की डिलीवरी हुई बेटा हुआ था एक हफ्ते बाद जच्चा-बच्चा घर आ गए तब भी रेणुका जी अपनी जिम्मेदारी निभाती रही ।

फिर एक दिन सुबह-सुबह बहू को खाने के लिए दलिया और मूंग की दाल दी तो बहू बोलने लगी ये क्या मां जी आपको दाल और दलिया बनाने नहीं आती क्या ,क्यों बहू क्या हुआ अरे ये कैसी दलिया बनाई है और दाल भी इतनी गाड़ी है कच्चा पक्का खाना देगी क्या मुझको कच्चा पक्का क्या है क्या मुझे खाना बनाने नहीं आता क्या ।अब तो आप रहने दो यहां मेरी देखभाल करने आईं हैं तो ढंग से करें ।

             रेणुका जी कमरे में बैठी सोंचने लगी बीस बीस पच्चीस लोगों का खाना अकेले बना लेती हूं और सब तारीफ करते खाते हैं और यहां बहू हमें ये बता रही हैं कि मुझे खाना बनाने नहीं आता ।अरे दाल और दलिया अगर गाढ़ी थी तो ये भी तो कह सकती है कि मांजी इसे थोड़ा पतला कर दीजिए , कहने का भी एक ढंग होता है ।

                        दो तीन दिन बाद सुबह सुबह बहू फिर रेणुका जी पर चीखने लगी क्या मांजी आप तो बस पड़ी पड़ी रात भर सोती रहती है पता है न आपको बच्चा संभालना है ,पर बहू मैं यदि रात को नहीं सोऊगी तो मेरी तबियत खराब हो जाएगी।और मेरी तबियत का क्या अगर खराब हो गई तो आपको तो बस बहाने चाहिए होता है बात बनाने का बहू की आवाज सुनकर शशांक भी वहां आ गया । क्या हुआ नंदिता, देखो शशांक मैंने तुम्हें मना किया था कि अपनी मां को मत बुलाओ मैं अपनी मम्मी को बुला लेती हूं लेकिन तुम नहीं माने ।

अब ये देखो तुम्हारी मां रातभर पड़े पड़े सोती रहती है बच्चे को कौन संभालेगा । शशांक भी बोलने लगा क्या मां सोनै के लिए थोड़े ही बुलाया है , नंदिता और बच्चे की देखभाल के लिए बुलाया है।पर बेटा बच्चा नंदिता का है और अगर वो रो रहा है और भूखा है तो बहू ही तो उसे दूध पिलाएगी न । लेकिन अब आप चुप रहे सुनो नंदिता तुम अपनी मम्मी को फोन करो वो आ जाए और मम्मी आप ,आप तो बस अपने घर जाने की तैयारी करें ।

                इतना अपमान सहकर रेणुका जी हतप्रभ रह गई । डिलीवरी के पहले जो इतनी देखभाल की उसको तो किसी ने देखा ही नहीं ।ये मेरा बेटा है जिसको पैदा किया है वो कह रहा है कि अपने घर जाओ । सोचते सोचते रेणुका जी के आंसुओं ने पूरा तकिया भिगो दिया । बिना खाए पीए कब उनकी आंख लग गई पता ही न चला।सुबह रेणुका जी ने कहा शशांक मेरा टिकट करवा दें बेटा मैं अपने घर जा रही हूं क्योंकि ये मेरा गई नहीं है मेरा अपना घर तो वो है जहां मैं इतने वर्षों से रह रही थी। इतना आत्मसम्मान खोकर तो मैं एक दिन भी नहीं रह सकती।

            फ्लाइट का टिकिट तो मिला नहीं ये ट्रेन का टिकट करवा दिया है । टे्न में बैठकर रेणुका जी ने एक निर्णय लिया कि अब कहीं नहीं जाऊंगी अपने घर रहुंगी ।मुझे आज पता चल गया कि मां बाप का घर तो बेटे बहू का होता है लेकिन बेटे बहू का घर मां बाप का नहीं होता। शादी के बाद बेटे अपने कहां रह जाते हैं वे तो ये भी भूल जाते हैं कि जिसका हम अपमान कर रहे हैं वो मेरी मां है या बाप है । लेकिन आज के समय में वो सब भूल गए हैं ।अपने आप से रेणुका जी बोलने लगी चल रेणुका जब-तक जिंदा है सांसे है ज़िंदा दिली से जाओ किसी पर आश्रित क्यों रहना ।

मंजू ओमर

झांसी उत्तर प्रदेश

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