आखिरी फैसला – सीमा गुप्ता : Moral Stories in Hindi

“पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता ही परमं तप: ……” पंडित जी राजेश से पूजा अर्चना करवा रहे हैं। वह भी पूर्ण निष्ठा और विधि-विधान से पूजा में तल्लीन है। पंडित जी के निर्देशों का अक्षरशः पालन कर रहा है। कहीं कोई कमी न रह जाए, इस बात का पूरा ध्यान रख रहा है। आज उसके पिता की पुण्यतिथि है। 

पूजा समाप्त कर राजेश मंदिर के बाहर आता है और अपने ड्राइवर को कार से कंबल और खजूर के पैकेट निकालकर लाने को कहता है। खजूर उसके पिता को बेहद पसंद थे।

 “लो राजेश, ये खजूर खाओ। ये स्वादिष्ट तो हैं ही, इनसे रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।” सर्द मौसम में जब राजेश को नजला-जुकाम होता तो उसके पिता उसे अक्सर कहते। इसीलिए पिता की पुण्यतिथि पर वह खजूर विशेष रूप से लाया है।

जैसे ही ड्राइवर सामान लेकर आया, दोनों मिलकर मंदिर के बाहर बैठे गरीब लोगों में वितरित करने लगे। प्रत्येक को एक कंबल और एक खजूर का पैकेट दिया जा रहा था।

गरीबों की आत्माओं ने राजेश पर आशीर्वादों की झड़ी लगा दी: 

“भगवान तुम्हारे बच्चों को खूब तरक्की बख्शे।”

“कड़ाके की ठंड से हम गरीबों को बचा रहे हो, प्रभु तुम्हें हर विपदा से बचाए।”

“ऊपर वाला तुम पर कृपा बनाए रखे।”

“बेटा! राम तुझे लंबी उम्र दे और तेरे हर काम में बरकत हो।” 

“बहुत अच्छा बेटा! तेरे मां-बाप धन्य हैं। ईश्वर तेरे जैसा बेटा हर किसी को दे।”

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 यह सुनते ही राजेश अपने मन में बुदबुदाया, “मेरे जैसा बेटा देने से अच्छा भगवान किसी को बेटा न दे।” वहां खड़े रहना उसके लिए मुश्किल हो गया। अभी गिरने ही वाला था कि ड्राइवर ने उसे संभाला और मंदिर के मुख्यद्वार के पास ही एक बेंच पर बिठा दिया। 

“मैं ठीक हूं। तुम बचे हुए कंबल बांट आओ।” राजेश ने अपने ड्राइवर से कहा। ड्राइवर के जाते ही उसे पश्चाताप के आंसुओं ने घेर लिया। वह गहरी सोच में डूब गया और उसके दिमाग में वह दिन कोंधने लगा जब उसके पिता का एक्सीडेंट हुआ था।

उस दिन उसके पिता शाम को अपनी दुकान बंद कर अपने स्कूटर से घर आ रहे थे। पीछे से एक कार ने टक्कर मार दी। वह स्कूटर समेत सड़क पर गिरकर घायल हो गए। उसकी मां और पत्नी सूचना मिलते ही अस्पताल की ओर भागीं। उस समय वह अपने नशेड़ी दोस्तों के साथ बैठा मजे कर रहा था।

उसकी मां ने उसे फोन किया, “बेटा जल्दी आ, तेरे पिताजी।” मां आगे कुछ बोलती, उसके पहले ही नशे में धुत्त वह बोला, “हां हां मां! पता है मुझे कि पिताजी की दवाई लानी है। आते हुए ले आऊंगा‌। सुबह से मुझे दस बार फोन कर चुके हैं। अब तुम जान खाने लगी।” ये सब कह कर उसने फोन काट दिया।

मां ने रोते-रोते दोबारा फोन किया, “राजेश सुन तो! तेरे पिता..।” इस बार मां की बात बीच में ही काट कर चिल्लाया, “क्या पिताजी, पिताजी लगा रखा है? मां, मैं अब दो बच्चों का बाप हो गया हूं। तुम दोनों का दूध पीता बच्चा नहीं हूं जो हर समय तुम्हारी गोद में पड़ा रहूं।” 

अबकी बार उसकी पत्नी ममता ने उसे फोन किया, “राजेश जी, आप जल्दी आइए क्योंकि पिताजी…।” पत्नी को अनसुना कर क्रुद्ध होकर उसे धमकाते हुए बोला, “तू होती कौन है मुझे जल्दी आने का आदेश देने वाली? तुझे मेरे मां-बाप ने सिर पर बैठा रखा है वरना कब की अक्ल ठिकाने लगा देता।”

राजेश की बकवास सुनकर ममता के हाथ से फोन नीचे गिर गया। जब से दोनों की शादी हुई थी, उसी दिन से वह अपने पति राजेश द्वारा अपमान सह रही थी। इसका एक ही कारण था – उसके सास-ससुर बहुत भले और उदार दिल वाले थे। वे ममता को अपनी बेटी मानते थे। उसे दुख होता था कि राजेश को उनकी भी कोई कद्र नहीं थी।

इधर गैर-जिम्मेदार और नशे का आदी राजेश नशे में धुत्त पड़ा रहा और उधर उसकी मां और पत्नी ने पिताजी की जान बचाने की खातिर अपनी पूरी जी-जान लगा दी। राजेश से उन्हें कोई उम्मीद नहीं बची थी। डॉक्टरों ने भी अपनी पूरी कोशिश की लेकिन पिताजी को बचाया नहीं जा सका।

सुबह तक नशे का प्रभाव थोड़ा कम हुआ तो राजेश घर चला आया। घर में रिश्तेदारों और पड़ोसियों की भीड़ लगी थी। उसकी मां, पत्नी और दोनों बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल था। सभी शोक संतप्त थे। वरिष्ठ जन मिलकर उसके पिता की अंतिम क्रिया की तैयारी कर रहे थे। 

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यह सब देखकर कल रात का फोन वाला पूरा घटनाक्रम उसकी आंखों के आगे घूम गया और उसका सिर शर्म से झुक गया।

अपने पिता को तो राजेश खो ही चुका था। दिन-रात उसकी चिंता करने वाली मां भी बिल्कुल चुप हो गई थी। उसे राजेश से अब कोई अपेक्षा नहीं थी। राजेश को अपनी गलती का अहसास तो था पर वह अपनी गंदी आदतों के वशीभूत होकर रह गया। 

एक दिन राजेश की पत्नी ने उसे समझाने का प्रयास किया, “मां की सेवा करना हमारा कर्तव्य है। कृपया अब तो नशा छोड़ दीजिए। हम सब आपको लेकर बहुत परेशान रहते हैं। बच्चों पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है। वे ऐसे में क्या सीखेंगे?..”

गुस्से में पसीने से तरबतर राजेश अपनी पत्नी ममता पर चिल्लाया, “तू मुझे सिखाएगी कि मुझे क्या करना चाहिए? मां और बच्चों का ध्यान रखना तेरी जिम्मेदारी है। इसीलिए तुझे घर में रखा हुआ है। वरना कब का निकाल देता।”

उस दिन ममता ने भी उत्तर दिया, “सही कहा आपने। जिसे मां-बाप न समझा सके, उसे मैं क्या सिखा पाऊंगी?”

अपनी मम्मी का ऐसा अपमान देख राजेश के दोनों बच्चे रोने लगे थे। बहू के साथ ऐसा दुर्व्यवहार देख, मां ने भी अपनी चुप्पी तोड़कर राजेश को हर तरह से समझाने का प्रयास किया था। राजेश ने अपनी गलती मानते हुए, मां से सुधरने का वादा किया।

पर राजेश ने अपनी बुरी संगति नहीं छोड़ी। वह सुधरने की बजाय, दिन प्रतिदिन और बिगड़ता गया। ममता अपनी सास मां की खातिर राजेश द्वारा दिन-प्रतिदिन किए जाने वाले अपमान के कड़वे घूंट पीती रही। दोनों बच्चे अपने पिता राजेश से विमुख होते गए। धीरे-धीरे ममता और बच्चों के मन में राजेश के प्रति आदर भाव पूरी तरह समाप्त हो गया।

अपने पति की आकस्मिक मृत्यु और बेटे की असहाय हरकतों ने राजेश की मां को बहुत बीमार और बूढ़ा कर दिया। बहू ममता की सहृदय सेवा भी मां का दुख-दर्द कम न कर पाई और अपने पति के जाने के कुछ महीने बाद ही मां स्वर्ग सिधार गई। 

अपनी अंतिम सांसें लेते हुए मां एक ही प्रार्थना कर रही थी, “हे प्रभु! मेरी हीरे जैसी बहू ममता के ममत्व की रक्षा करना। मेरे पोतों को मेरे बेटे राजेश जैसा न बनाना।”

मां के देहांत की खबर से आहत, लेकिन अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफल और व्यसनों से ग्रस्त, राजेश ने अपनी पत्नी पर ठीकरा फोड़ा, “तेरे जिम्मे एक ही तो काम था – मां की सेवा करना और वो भी तू न कर सकी। अब निकल जा मेरे घर से।”

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दोनों बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित अपनी सास मां की अंतिम प्रार्थना को याद करते हुए, ममता ने राजेश से संयत स्वर में इतना ही कहा, “निकल जाऊंगी। बस मां की तेरहवीं हो जाने दो।”

13 दिन बाद मां की रस्म क्रिया हो गई। सभी रिश्तेदारों के जाने के बाद, ममता और दोनों बच्चे अपने जरूरी सामान बाहर खड़ी गाड़ी में रखने लगे। 

यह सब देखकर भौंचक्का हुआ राजेश कुछ कहने ही वाला था कि ममता बोल पड़ी, “राजेश जी, खुश हो जाइए। आपकी इच्छा के मुताबिक मैं हमेशा के लिए आपके घर से निकल रही हूं और यह मेरा #आखिरी फैसला है।”

 राजेश के पैरों तले जमीन खिसकने लगी। ममता सच में यह कदम उठाएगी, यह तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था। वह तो बस ममता को अपने वश में रखने के लिए धमकाता रहता था। उसने हथियार फेंका, “तुझे जहां जाना है जा। मेरे बेटों को ले जाने की तेरी हिम्मत कैसे हुई?”

“हमें आपके जैसा नहीं बनना। इसलिए हम मां के साथ रहेंगे और यह हमारा #आखिरी फैसला है।” इस बार राजेश को उत्तर बच्चों ने दिया था।” 

अपना सब कुछ लुटा चुका था राजेश। उसके द्वारा पत्नी और बच्चों को दी गई हर दलील असफल हो गई थी। वह अकेला पड़ गया था। उसे सारा आकाश घूमता नजर आया।

मंदिर के बेंच पर बैठा वह अभी भी बुदबुदा रहा था, “भगवान मेरे जैसा बेटा, पति और पिता किसी को न दें।” कंबल बांटकर ड्राइवर आया तो राजेश को पानी पिलाते हुए बोला, “साहब आप ठीक तो हैं?” तब राजेश की तंद्रा टूटी।

राजेश ने अपने ड्राइवर से कहा, “कुछ ठीक नहीं है। चलो मुझे मंदिर के अंदर दोबारा ले चलो।”

मंदिर के मुख्य भवन में प्रवेश करते ही वह भगवान के चरणों में गिर पड़ा, “हे प्रभु! मैं जानता हूं कि अपने माता-पिता, पत्नी व बच्चों को मैंने अपने कुकर्मों से खोया है। तब से मैं पश्चाताप की आग में जल रहा हूं। मैं यह स्वीकार करता हूं कि अब बहुत देर हो चुकी है और मैं कुछ भी दोबारा पाने के लायक नहीं हूं। नशे की लत और कुसंगति ने मेरी बुद्धि हर ली। आज आपके दरबार में, नशे और बुरे मार्ग को हमेशा के लिए छोड़ने की प्रतिज्ञा करता हूं।”

अपने रूंधे हुए गले के साथ राजेश आगे बोला, “हे दयावान! चाहे मेरी किसी गलती को माफ़ न करना। पर मुझ पर इतनी कृपा अवश्य करना कि मैं अपने #आखिरी फैसले पर कायम रहूं और इंसान बनने की दिशा में कदम बढ़ाऊं।”

पाठकों से निवेदन है कि कहानी पर प्रतिक्रिया देकर मार्गदर्शन करें।

– सीमा गुप्ता ( मौलिक व स्वरचित)

विषय: #आखिरी फैसला 

#साप्ताहिक प्रतियोगिता

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