शादी को एक माह हो गया, मैं,,, शीला,, आज अपने पीहर जा रही हूं,,, भाई, कल ही लेने आ गया था,, खुशी के कारण मन ही नहीं लग रहा था,, लग रहा था,, पंख लग जाएं और मैं,,, झट से अपने माता पिता के पास पहुंच जाऊं,,,
सास, ससुर के पैर छुए,, हसरत से पति की तरफ़ देखा,,, शायद,, कुछ कहेंगे, पर मेरी तरफ़ तो देखा तक नही उन्होंने।
तन से सुंदर न सही मन से तो,,, मुझ सा सुंदर कोई नहीं,, फिर क्या वजह है,, कि इनको मै अब तक भा न सकी।
रात की ट्रेन से चली,12 घंटे के सफर के बाद,, अपने शहर पहुंची,,, आज तो अपना शहर भी बहुत प्यारा लग रहा है,,, लगे भी क्यों न,, पूरा बचपन यहीं बीता,, स्कूल, कॉलेज,, की पढ़ाई यहीं की,, एक अलग ही अपनापन होता है अपने मायके और अपने शहर से।
मम्मी से गले मिली, पापा ने सिर पर हाथ फेर दिया,, छोटे भाइयों से मिली,,, एक अलग सी शांति मिली। अपने बड़े से घर में आकर,, बहुत खुश हो रही थी,, ससुराल में छोटा घर था,, अति साधारण लोग थे,,, उसका सुन्दर न होना ही उसकी,, देर से हुई शादी का कारण था,,, पापा ने रिश्ते तो बहुत देखें थे,,, पर असुंदरता उसके आड़े आ जाती और रिश्ता होते होते,,, रुक जाता, यही कारण था कि बिल्कुल साधारण परिवार ने उसे पसन्द किया,, तो उसके साथ पूरे परिवार ने राहत की सांस ली।
एक महीना पलक झपकते निकल गया,,, ससुराल जाने का दिन आ गया,,, भारी मन से पति के साथ,,, ससुराल आ गई,,, पति उससे दिखने में काफ़ी अच्छे थे,, उसे यह अहसास था,,, पति उससे बात चीत,,, ज़रूरत पड़ने पर ही करते,,, पर शारीरिक संबंध ही उन दोनों के संबंधों का आधार रहता,,,, उसे बुरा भी लगता,, पर कहने सुनने को पतिदेव,, उसके पास रहते कहां??
कुछ समय बाद उसकी गोद में बेटा आ गया,,, वैसे भी काम का,, ज़रूरत से ज्यादा बोझ,, अब बच्चे के जन्म ने तो उसकी हालत खराब कर दी,,, पतिदेव की ज़रूरत पूरी न होने के कारण,,, वो अपना सारा क्रोध उस पर उतार जाते,, सोचकर हैरान हो जाती,, ये कैसा पुरुष है? न इसे पिता बनने की खुशी है,, न ही मेरे ऊपर दया,,, इतना कमजोर शरीर है मेरा,,, कितना मुश्किल था मेरा प्रसव,,, आज तक मेरी हालत पर तरस क्यों नहीं आता इन्हें।
ढेरों प्रश्न थे मेरे, पर जवाब देने का वक्त किसे और कहां?,, क्या यही शादी है ? जानवरों की तरह बरताव,,, नोचना, खसोटना,, यही पति धर्म होता है? अपने ही प्रश्न,, अपने ही उत्तर,, करूं तो क्या करूं।
बंधन में बंधी शीला,,, न मायके का सहारा था,, न, भाइयों का,, वो भी पराया कर चुप्पी साधकर हाथ बांधकर बैठ गए थे,,, प्रसव के बाद,,,सास ने थोडा बहुत गुड़ मेवा खिलाकर जिम्मेदारी पूरी कर ली,,, अपनी व्यथा कहे भी तो किस्से कहे ।
पांच साल में तीन बेटों की मां बन गई,,, पति का ट्रांसफर काफ़ी दूर दूसरे प्रांत में हो गया,,, मुझे साथ ले जानें के लिए सास को बोला,, सास को अपना स्वार्थ,, फ्री की नौकरानी,,, वो अपने बुढ़ापे की दुहाई देने लगीं,,, पता नहीं क्या सोचकर आज्ञा दे दी मुझे ले जाने की।
बड़ी उमंग से मैं पहली बार पति के साथ अपनी गृहस्थी बनाने निकली,,, मन में बहुत खुशी,,, नई जगह,, कैसा घर होगा,, कैसे सजाऊंगी मैं,, सोच सोचकर अंदर ही अंदर गुदगुदी सी होने लगी मुझे।
घर आई,,, ठीक ठाक दो कमरों का साधारण घर था,, निम्न मध्यम वर्गीय परिवार इससे ज्यादा बड़े सपने देख भी कहां पाता है,,, खैर मैंने उसी में अपना आशियाना बना लिया,,, पति की वहशी हरकतें,, कम होने की बजाय बढ़ ही रही थी,,, बच्चों तक की परवाह तक न थी उन्हें,,, कभी कभी तो शर्मिंदगी से मर जाने की इच्छा होती,,, पर बच्चो का चेहरा देखकर रह जाती।
पति का ट्रांसफर काफ़ी दूर के प्रांत में हो गया,,, बच्चों की पढ़ाई की खातिर मैं वापस ससुराल आ गईं और बच्चो के एडमिशन वहीं करा दिए। पति की वहशियाना हरकतों से तो बच गई,,, पर, जब भी,, एसटीडी बूथ से बात करती,, बात करने पर गलियां और झिड़कियां ही मिलती।
कुछ समय तक तो पति पैसे भेजते रहे,,, मैं बड़ी ही किफायत से घर चलाती रही ,,,,बच्चों की पढाई भी कराती रही,, धीरे धीरे पति का आना भी कम हो गया,,, पैसे भी कम भेजने लगे,,,,, एसटीडी पर जाकर फोन करती,, बच्चों,, से कहलवाती पर,, कोई असर नहीं।
सास ससुर रहे नहीं वरना,, ससुर जी की पेंशन का थोडा बहुत सहारा था,,, हिम्मत करके मैने ट्यूशन लेना शुरु किया,, किस्मत से थोडा बहुत पैसा आने लगा।
एक दिन एक परिचित ने आकर बताया, तुम यहां पड़ी हो,, वहां वो किसी और औरत के साथ रह रहे है,,, मेरे उपर तो मानो आसमान टूट पड़ा,,, बिलख बिलख कर रो पड़ीं,,,,, पूछने पर बेशर्मी से बोले,, मेरी भी कुछ जरूरतें हैं ,,, क्या गलत कर रहा हूं,, जिस आदमी ने बेशर्मी की हद ही पार कर दी,, उससे उम्मीद करना व्यर्थ था,, मैने मंगलसूत्र उतार दिया,,,, उसी दिन से सिंदूर लगाना बंद कर दिया ,,, क्यों ऐसे पतित आदमी के लिए सिंदूर जैसी पवित्र चीज़ का अपमान करूं।
उसके बाद मैने उनसे पूरी तरह उम्मीद छोड़ दी,, थोडा बहुत पैसा जो भेजते,, उसके अलावा कुछ नहीं मांगती,, बिल्कुल सीमित जरुरत कर ली थी हमने,,, ईश्वर का नाम लेकर,,, समय गुजरता रहा,,, बच्चे पढ़कर अपने पैरों पर खड़े हो गए।
बच्चो के ब्याह में रुकावट आ रही है,,, पिता का साथ होना जरुरी है,, भले ही पिता कितना भी
गया गुजरा क्यों न हो,, कितना ही निकृष्ट क्यों न हो,, उसकी उपस्थिति के बिना कोई अपनी बेटी देने को तैयार नहीं,,,
वो जानवरों की तरह अट्टहास लगाता है,, अपनी महत्ता दिखाता है,, पर मैं टूटूंगी नहीं,, हारूंगी नहीं,, मुझे इन्तजार है,, उस नई सुबह का ,,,जिस दिन,, पिता की तरह मां की उपस्थिति का भी महत्व होगा ।
आज एक कठोर निर्णय पर पहुंची हूं मैं,,,
एक चरित्रहीन की पत्नी की बजाय,, मैं अपने, लायक बच्चों की,,,,मां बनकर जीना चाहती हूं,, इसलिए मैं उससे तलाक़ लेने जा रहीं हूं मैं।
प्रीती सक्सेना, , स्वलिखित रचना
इंदौर