टूटे रिश्ते जुड़ने लगे – लतिका पल्लवी : Moral Stories in Hindi

“माँ कहाँ हो, कहाँ हो? किचेन से बाहर निकलो देखो कौन आया है” यह सुन कर मैं किचेन से बाहर आई. देखा की आज मेरे भाई-भाभी, देवर-देवरानी, ननद-नन्दोई सभी अपने बच्चों के साथ मेरे ड्राइंग रूम में खड़े थे और मुझे देखते ही हैप्पी ऐनवर्सरी कहने लगे। 

आज मेरी पच्चीसवी वैवाहिक वर्षगाठ है। बच्चों ने  सरप्राइज पार्टी का प्लान बनाया है और उन्होंने ही सभी करीबी रिश्तेदारों को बुलाकर रेस्टोरेंट में पार्टी राखी है। सभी लोगों के पहुँचने के कारण कह रहे है “ माँ जल्दी करो तुम और पापा तैयार हो जाओ, अरे माँ खाना बनाना बंद करो। आज हम बाहर खाना खाने वाले हैं।” पार्टी में सभी ने खूब मज़े किए। बच्चे बहुत खुश थे। अपनी पीढ़ी की मै सबसे बड़ी बेटी  हूँ और मेरे पति भी अपने सब भाई-बहनों में बड़े है। अतः ननद, देवर, मेरे भाई, बहन सभी के बच्चों के लिए यह पार्टी महत्वपूर्ण थी।

वे खूब इन्जॉय कर रहे थे और अपने- अपने मम्मी-पापा के पच्चीसवी ऐनिवरसरी का प्लान बना रहे थें। पार्टी बहुत ही अच्छे ढंग से हुई, फिर सभी अपने-अपने घर चले गए। हम भी होटल से घर आ गए। बच्चे अपने-अपने कमरे मे सोने चले गए। मैं भी घर के कामों को निबटा कर आराम करने अपने कमरे में आ गई। मैने देखा कि मेरे पति अभी तक सोए नहीं थे। वे मेरा इन्तजार कर रहे थे। उन्हें जगे हुए देखकर मैंने उनसे कहा “आप अभी तक सोए नहीं? क्या कल छुट्टी ले रखी है? जल्दी सो जाओ नहीं तो सुबह नींद नहीं खुलेगी

और आप ऑफिस के लिए लेट हो जाओगे।” मेरी बात को सुनकर वो मुस्कुराते हुए बोले “ नहीं छुट्टी तो नहीं ली है पर तुम्हे धन्यवाद दीए बगैर कैसे सो जाता, तुम्हारा इन्तजार कर रहा था। मैंने  बोला “ धन्यवाद?? किसलिए?  यह पार्टी तो बच्चों ने दी।  आपकी तरह मुझे भी इस बारे मे कुछ भी पता नहीं था। मैं तो जैसे हर वर्ष अच्छे-अच्छे पकवान और मीठा बना लेती हूँ, वैसे ही इस बार भी बनाने वाली थी पर बच्चों ने यह पार्टी रख दी और इस शहर में रहने वाले पूरे रिश्तेदारों को भी बुला लिया। नहीं तो हम कहां पार्टी करते थे।“

“तुम शायद भूल रही हो शादी के शुरु के समय के दिनों को और मेरे व्यवहार को। तुमने थोडी सी समझदारी  नहीं दिखाई होती तो आज हम यह दिन सेलिब्रेट नहीं कर रहे होते। उस समझदारी के लिए धन्यवाद कहना है।”

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उनके ऐसा कहते ही में जैसे वर्तमान से अतीत में चली गई। मुझे याद आने लगे वह दिन जब मेरी शादी तय हुई थी। जैसे कि मैंने पहले ही आपको बताया कि हम दोनों अपनी पीढ़ी के पहले संतान थे अतः हमारी शादी को लेकर उल्लास दोनों ही परिवार में चरम पर था। सभी खुश थे। हमारी शादी में सभी नातेदार-रिश्तेदार आए हुए थे। हमारी शादी बहुत ही धूमधाम से हुई। दोनों तरफ से सौगातों की बौछार हुई। मुझे इतने उपहार मिले थे कि गिनना मुश्किल था। जो आता वह आशीर्वाद के साथ कुछ ना कुछ उपहार दे जाता। 

मुंह दिखाई की रस्म घंटों चली। मैं पूर्णत थक चुकी थी। लग रहा था कि कब लोग हटे और मैं सोने जाऊं। थोड़ी देर बाद मेरी सासू मां ने नंद से कहा कि भाभी को उनके कमरे में ले जाओ और कुछ खाने पीने के लिए भी दे आओ। फिर मुझसे कहा “ जाओ बेटी कुछ खा कर आराम करो। मैं अपने कमरे में आ गई। नंद ने खाने के लिए बहुत सारा सामान लाकर रख दिया

जिसे देखकर मैं बोली “ मैं इतना खाना नहीं खाती।” यह सुनकर मेरी ननद हंसते हुए बोली “मैं तो समझी कि थोड़े कम पड़ेंगे तो और लाकर दे दूंगी।” उन्होंने आगे कहा कि हमें यह नहीं पता है कि आपको खाने में क्या पसंद है इसीलिए इतना सारा ले आई। आपको इसमें से जो भी पसंद हो खा लीजिए। बाकी मैं ले जाकर किचन में रख दूंगी।  मैं बहुत ही खुश थी मेरे सास, ससुर, ननद, सभी बहुत अच्छे थे।

मैं अपने भाग्य पर इतरा रही थी। पति भी बहुत ही प्यार करते थे। परंतु यह सब चार दिन की चांदनी थी। उसके बाद जीवन में सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा था। बाकी सभी का स्वभाव तो सही में बहुत ही अच्छा था परंतु मेरे पति की असलियत तो मुझे उनके साथ जब उनके नौकरी वाले शहर में गई तब पता चली। वैसे तो उनका स्वभाव अच्छा ही था परंतु ‘मेल एगो’ के कारण उनके स्वभाव में बहुत सी खामिया थीं। उनके बुरे स्वभाव में , घर पर डांटना, एक-एक रुपए का हिसाब रखना, कभी भी पैसे मांगने पर यह कह देना कि तेरा बाप खजाना छोड़ के गया था

क्या मेरे पास जो उड़ा रही है जैसी बातें शामिल थी। उन्हें जो पसंद है वह घर में बनना चाहिए, जब वह कहे उठो तो उठो, जब वह कहे बैठो तो बैठो। बाहर मत निकलो, किसी से बात मत करो, पड़ोसी घर में आ जाए तो हंगामा करने लगना। इन सब बातों से मैं परेशान हो चुकी थी मगर मुझे इस तरह रहने की आदत भी हो गई थी।  ऐसे ही समय बीतता रहा और मैं दो बच्चों की मां बन गई। मायके नहीं जाने देना तक तो ठीक था पर ससुराल भी जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी। बच्चे दादी-दादी के दुलार से बिगड़ जाएंगे,

मां तुम्हें कुछ ज्यादा ही सपोर्ट कर देती है‌ फिर तो तुम यहां आकर नाटक करती हो, वह इसे न जाने देने की वजह बताया करते थे। हद तो तब हो गई जब देवर की शादी हुई उसके बाद तो जैसे अपने घर जाने से ही उन्हें नफरत हो गई। कहने लगे कि भाई तो बीवी का गुलाम हो गया है। तुम भी वहां से आकर सोचोगी कि मैं भी वैसा ही करूं तो घर की शांति भंग हो जाएगी।

मैं सुनती, नाखुश होती, मगर फिर मन को मार लेती थी। मैं कभी उनकी बातों को मानने से इनकार नहीं करती थी। इसीलिए शायद उन्हें मुझ पर हाथ उठाने का मौका नहीं मिला परंतु बच्चों के जरा भी ज़ोर से बोल देने पर या हसने पर पीटना अब उनकी आदत बन गई थी। बच्चे हमेशा डरे से रहते थे।

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मुझे लगने लगा था कि कहीं मेरे बच्चे बीमार हो न जाए। यह सब मैं देख रही थी परंतु कुछ कर नहीं पा रही थी। समझ में ही नहीं आता था कि उन्हें इनके अत्याचार से खुद को व अपने बच्चों को कैसे आज़ाद करूं। हम मां, बेटा, बेटी दिन-रात घर से बाहर रहने के बहाने ढूंढते रहते थे। बच्चों की सारी चंचलता, मुस्कान व भोलापन सब मानो गायब होती जा रही थी मानो जैसे उनकी  जगह डर ने ले लिया था।

तभी एक दिन मेरे भाई की नौकरी हमारे शहर में लगी। वह हमारे घर आया, मैं उसे मना नहीं कर सकती थी। मेरे पति भी समाज में अपनी छवि खराब हो यह सोचकर उसे मना न कर पाए। मैंने उसे जब तक ढंग की रहने की व्यवस्था नहीं हो जाए तब तक अपने घर में रुकने का ऑफर कर दिया। उन्हें दूसरे के सामने अपनी छवि बहुत ही अच्छी रखनी थी इसलिए वह सदा प्रयत्न करते थे बाहरी लोगों के सामने कभी भी मुझे या मेरे बच्चों को डांटे नहीं। यह मेरे भाई के सामने अच्छा बनने की कोशिश करते थे लेकिन बच्चे इनसे इतना डरते थे की साफ-साफ किसी को भी दिखाई दे जाता था। 

कुछ दिन हम चैन से जिए फिर मेरा भाई चला गया और फिर हमारी पुरानी जीवनी शुरू हो गई।  मेरा भाई जितने दिन भी रहा बच्चों को घुमाने ले जाता, उनके पसंद की चीज उन्हें दिलवाता तो बच्चों के चहरे पर जो खुशी दिखाई देती थी वह मुझे खुश भी करती मगर परेशान भी कर रही थी क्योंकि मैं चाह के भी अपने बच्चों के लिए कुछ कर नहीं पाती थी।

भाई के जाने के बाद बच्चे फिर गुमसुम रहने लगे। अब मुझे लगने लगा कि अब बस बहुत हो गया। मैं अपने बच्चों को घुट-घुट के जीने नहीं दूंगी। यह सोचकर मैंने उनसे तलाक लेने का फैसला कर लिया। रात भर मैं सोचती रही कि कल मैं अपने मायके चली जाऊंगी, फिर वहां से तलाक के कागज भिजवा दूंगी परंतु मेरे पास जाने के लिए पैसे नहीं थे। लेकिन मैं अपने फैसलों से हटना भी नहीं चाहती थी।  7 वर्ष तक दुखी रहने के बाद अब मैं आज़ाद होना चाहती थी। मैंने कभी भी तलाक लेना नहीं चाहा था क्योंकि मुझे लगता है कि बच्चों की सही परवरिश के लिए मां-बाप दोनों का प्यार देना जरूरी है। पर मैं हार गई थी। 

दूसरे दिन सुबह बच्चों को स्कूल नहीं भेजा, बच्चों को घर पर देखकर उन्होंने पूछा कि बच्चों का स्कूल बंद है।  मैंने कहा “नहीं तो।” उन्होंने कहा “फिर बच्चे स्कूल क्यों नहीं गए?” मैंने हिम्मत करके कहा “मैं अपने मायके जा रही हूं। मैं तुमसे तलाक लूंगी और अब वहीं रहूंगी” यह सुनकर लगा जैसे वह पागल हो गए। मुझ पर लाल-जूते की बौछार करने लगे।  फिर बच्चों को पकड़ कर पीटना चालू कर दिया। साथ में जोर-जोर से चिल्लाने लगे। “इसलिए तुम लोगों को कहीं जाने नहीं देता और दूसरों से मिलने नहीं देता। चार दिन तेरा भाई आकर रह कर क्या गया तुम लोगों के पर निकल गए।

मेरा खाया पिया और मेरा ही घर बर्बाद कर चला गया वह। यह सब सुनकर और बच्चों को बेरहमी से मार खाता देख मेरा वर्षों का गुस्सा जाग गया और मैंने उन्हें दो थप्पड़ जड़ दिए। उसके बाद मैंने बच्चों को लेकर दूसरे कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया। अभी तक तो पैसों की ही बात थी पर अब इस हालत में जाना भी संभव नहीं था। मैंने सोचा ठीक होने पर दो-चार दिनों में चली जाऊंगी। बच्चे भूखे थे। मैं भी परेशान थी। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं। गुस्सा भी आ रहा था, रोना भी। मेरे जाने से इनको क्या दिक्कत होगी।

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कुछ दिन बाद फिर आराम में उनकी शादी हो जाएगी। सरकारी नौकरी है तो कोई भी अपनी बेटी दे देगा। जाएगा तो मेरा और मेरे बच्चों का। मैंने सोचा इन्हें ऐसे छोड़ कर जाना सही नहीं होगा मगर रहना भी सही नहीं था।  द्वंद में फंसी थी तभी मेरे दिमाग में एक उपाय आया। इन्हें मर्द होने पर बड़ा घमंड था। अपनी छवि भी समाज में खराब नहीं करना चाहते थे। बस मैंने इसी का फायदा उठाने का सोचा। इन्होंने यह देखने के लिए कि उनके ऑफिस जाने पर घर में कोई आता तो नहीं है, घर में सीसीटीवी लगवाया था। मैं तुरंत कैमरे के पास गई

और उसमें से यह सारी घटना का वीडियो निकाल लिया। थोड़ी देर बाद वह जब ऑफिस चले गए। शाम को जब वह ऑफिस से आए तो घर में मैंने अपनी पसंद का खाना बनाया था और हम टीवी देख कर हंस रहे थे। यह देखते ही उनका दिमाग गर्म हो गया। वह चिल्लाते हुए बोले “सुबह की मार का दर्द ठीक हो गया तो फिर मार खाने का काम करने लगे?” तब मैंने भी पलट कर जवाब दे दिया “क्या थप्पड़ से काम नहीं चला और भी कुछ आजमाना होगा याद रखना आइंदा कभी भी आपने मुझे या मेरे बच्चों को मारा,

तो उस घटना का वीडियो वायरल कर दूंगी। मुझे पीटने पर तो शायद कुछ सफाई दे दोगे लेकिन खुद बीवी से पिट जाने पर समाज में कैसे जियोगी सोच लेना।” यह सुनकर वह चुप हो गए। कुछ कहा नहीं, खाना भी नहीं खाया और सो गए। लेकिन धीरे-धीरे सब सामान्य होने लगा क्योंकि वह मन से खराब नहीं थे बस बचपन से ही मर्द का भाव अपने मामा को देखकर आ गया था। फिर जब-जब थोड़ा गुस्सा होते तो फिर बोलती “वीडियो अभी भी है।”

इस प्रकार उनकी आदत में सुधार होने लगी। उन्हें भी लगने लगा कि इस तरह से हम उनकी बात को कभी नहीं मानेंगे। मैं धीरे-धीरे खुश रहने लगी क्योंकि बच्चे भी समय के साथ सामान्य होने लगे। हमारे घर में खुशियां लौट आई। हम बच्चों के दादा-दादी के पास भी जाने लगे। भाई से मिलकर उसके परिवार से मुलाकात की। उनको बदला हुआ देख मां-पापा भी खुश रहने लगे। सब कुछ सामान्य हो गया और अब मेरा जीवन कैसा चल रहा है यह तो आप आज के सेलब्रैशन से समझ ही सकते है।

मैं यही सब पुरानी बातों को सोचते-सोचते गुम सी हो गई थी। मुझे चुप देखकर उन्होंने झांझर कर बोला “क्या हुआ कहां खो गई?” मैंने हंसते हुए कहा “कहां खोऊंगी आपके प्यार के अलावा मैं” फिर कहा कि इस तरह तो मुझे भी आपका शुक्रिया अदा करना चाहिए। इस पर वह बोले “मुझे क्यों?” तब मैंने कहा कि आप यदि सहयोग नहीं करते तो ऐसा होना संभव नहीं था। आप चाहते तो मुझसे वीडियो छीन भी सकते थे। इस बात को इग्नोर भी कर सकते थे। परंतु आपने ऐसा कुछ भी नहीं किया। यह बात सुन कर उन्होंने कहा कि तुम्हारे उसे स्वभाव के बाद तो मैं जैसे सदमे में ही चला गया।

लगा मानो क्या हो गया कि तुमने ऐसा कदम उठाया। फिर भी मैंने हार न मानकर दूसरे दिन भी तुम्हारे साथ खराब व्यवहार किया। लेकिन जब दूसरे दिन भी तुम्हारा वही रवैया रहा तो मुझे लगा कि शायद मुझे अपने में ही बदलाव लाना चाहिए और जब बदलाव लाया तो फर्क साफ-साफ दिखाई देने लगा कि तुम सब कितने खुश रहने लगे हो। इससे घर का माहौल बहुत ही खुशनुमा हो गया। चलो जैसे भी हुआ लेकिन सारे टूटे रिश्ते जुडने लगे और हमें आज यह खुशनुमा दिन देखने को मिला। 

 

टूटे रिश्ते जुड़ने लगे

लतिका पल्लवी

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