भाभी – खुशी : Moral Stories in Hindi

निशा एक मस्तमौला लड़की थी। अठारह की हुई तो मां बाप शादी की तैयारी में लग गए। धनंजय का रिश्ता आया जो बैंक में मुलाजिम था उसकी उम्र 27 साल थी घर में मां,भाई बहन थे।पिता की मौत हो जाने के कारण धनंजय पर सारी जिम्मेदारी आ गई।भाई बहन छोटे थे।

मां बीमार रहती तो उन्हें जल्दी थी कि बेटे का सेहरा सजा दे और जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए और इस तरह धनंजय की दुल्हन बन निशा उनके घर आ गई।मां की सीख और घर की जिम्मेदारी पड़ने से मस्तमौला निशा एक दक्ष ग्रहणी में परिवर्तित हो रही थी।

देवर आनंद और नंनद प्रीति का बहुत ध्यान रखती उन्हें बच्चों की तरह स्कूल भेजती।सास सारा घर संभालती। धनंजय शांत स्वभाव के मालिक थे।और सब इस लिए उनसे डरते थे जो बात होती भाभी ही उन तक पहुंचाती समय गुजरा निशा दो बच्चो की मां बन गई।

पर उसके पहले बच्चे आनंद और प्रीति उसे जान से प्यारे थे।आनंद मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा था उसी के साथ पढ़ने वाली कानन से वो शादी करना चाहता था।कानन को ले कर वो घर आया सब को कानन पसंद आई और उनकी शादी हो गई।कानन के पिता शहर में नर्सिंग होम बनवा रहे थे

जो वो चाहते थे कि उनकी बेटी और दामाद संभाले परंतु आनंद ने ये कहते हुए कि मेरे भाई भाभी ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है मैं वही रहूंगा यह सुन कानन का मूड खराब हो गया पर वो आनंद के लिए उनके घर आ गई।निशा खुद सारे काम करती और कानन 12 बजे तक सो कर उठती।

मां कहती कानन को भी काम बताओ पर निशा कहती अभी बच्चे है सीख जाएगी।कानन अब घर में निशा से नौकरों सा वाहवर करती ।एक दिन इतनी बात बढ़ी कि धनंजय को आनंद को कहना पड़ा कि तुम यहां से दूर चले जाओ। यही तो कानन  चाहती थी की आनंद अपने घर वालों से दूर हो जाए

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और वह आनंद को ले अपने पिता के घर आ गई उन्होंने शहर में नर्सिंग होम ज्वाइन कर लिया और वहीं रहने लगे कानन ने आनंद के मन में उसके घर वालों के प्रति  जहर भर दिया था। आनंद अपने घर धनंजय से अपना हिस्सा मांगने गया

आनंद की मां बोली कौन सा हिस्सा बेटा इन्होंने तुम्हे मां बाप की तरह पाला तुम तो अपनी बहन की शादी में भी ना आए और आज हिस्सा मांगने आ गए जाओ यहां से ।निशा बोली हम दे देंगे तुम्हे हिस्सा तुम हमारे बेटे हो पर आनंद नहीं रुक और चला गया कुछ दिन बाद धनंजय का बेटा बीमार हो गया

और उसे इलाज के लिए शहर ले जाना पड़ा वहां पहचकर धनंजय ने आनंद से मिलने की कोशिश परंतु वह धनंजय से ना मिला और बिना इलाज के कारण धनंजय का बेटा इस दुनिया से चला गया पोते के गम में दादी भी दुनिया से चल बसी अब घर पर सिर्फ धनंजय निशा औरउसकी बेटी रेखा थे।

एक दिन धनंजय भी सोते-सोते ही दुनियाको अलविदा कह गए अब सिर्फ रेखा और निशाथे निशा ने घर के सारे कागज आनंद के नाम पर कर दिए और वह अपनी बेटी के साथ चली गई जब आनंद को घर केकगज मिले। उसमें चिट्ठीभी थी।

प्रिया आनंद सब तुम्हारा है मैं जा रही ह यदि हो सके तो तीज त्यौहार अपनी छोटी बहन प्रीति से मिल लेना क्योंकि अब यह फर्ज तुम्हें ही निभाना होगा तुम्हारे भैया अब नहीं रहे और मेरे  दोनों बेटे भी मै अभागन गवा चुकी हु।तुम सदा खुश रहो।यह चिट्ठी पढ़ आनंद पहले अपनी बहन के घर पहुंचा।

वहां से उसे पता चला  उसके नर्सिंग होम में इलाज ना मिलने के कारण धनंजय का बेटा मर गया इस दुख से मां और धनंजय भी चल बसे।भाभी अपनी बेटी रेखा को ले किराए के कमरे में रह रही है और कपड़े सिलने का काम करती हैं।प्रीति बोली ये वोही भाभी है जिन्होंने अपना पेट काट कर तुम्हे पढ़ाया

और तुम उनके बेटे का इलाज भी ना कर सके अपना सब गवा कर भी वो तुम्हे सब देकर चली गई जाओ तुम मेरा एक ही पिता समान भाई था और कोई नहीं। आज आनंद पछता रहा था वो अपनी भाभी के पैर पकड़ माफी मांगना चाहता था। आनंद ने अपनी भाभी को ढूंढा

और उनसे माफी मांगी तो निशा बोली तुम मेरे बेटे हो मैने तुम्हे माफ किया कानन भी उन्हें लेने आई पर निशा ने ये कह इनकार कर दिया यहां धनंजय की यादें है बहुत जोर देने पर निशा अपने घर लौट आई और आनंद बोला ये घर मेरी भाभी मां का है और उनका ही रहेगा और रेखा मेरी बेटी है और उसकी जिम्मेदारी मै उठाऊंगा।तस्वीर से धनंजय और मां देख रहे थे काश ये सब पहले हो जाता।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी 

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