बेसहारे का सहारा – मंजू ओमर : Moral Stories in Hindi

साहब, साहब कल से हमार बेटवा घर नहीं आया है साहब ढूंढ लो उसे साहब,अरे आ जाएगा यही कहीं गया होगा दोस्तों के साथ। नहीं नहीं साहब वो तो इस समय तक रोज आ जाता है कहीं नहीं जाता है साहब मुझे बुढ़िया का अंधे की लकड़ी है वो साहब और मेरा कोई सहारा नहीं है। अच्छा अच्छा देखता हूं घर जा ढूंढते हैं अभी। इंस्पेक्टर ने टालने की कोशिश की । सुखिया आफिस निकल कर बाहर बेंच पर आकर बैठ गई और बैठे बैठे कब उसकी आंख लग गई पता ही न चला ।

                 सुबह-सुबह वहां की सफाई करने वाला आया तो सुखिया को जगाने लगा अम्मा वो अम्मा यहां काहे पड़ी हो जाओ अपने घर जाओ अभी साहब आएंगे तो गुस्सा करेंगे । लेकिन सुखिया वहीं बैठी रही ।आज तीन दिन हो गए सुखिया के बेटे धनीराम को गायब हुए ।

              इंस्पेक्टर के आते ही वो जोर जोर से रोने लगी साहब अभी तक हमार बेटवा नहीं आवा और रोते-रोते सुखिया वहीं अचेत होई गिर पड़ी । तुरंत इंस्पेक्टर ने दो पुलिसकर्मी यों की मदद से उसे उठा कर बैंच पर लिटाया और मुंह पर पानी छिड़का और पूछा अच्छा अम्मा ये बताओ तुम दो दिन से कुछ खाए पीए हो कि नहीं ,

अपने बेटवा के बिना हम कैसे खाएं पाएंगे साहब। अच्छा अच्छा ढूंढता हूं तुम्हारे बेटवा को ।और थाने के कर्मचारी को बोला जाओ ज़रा चाय नाश्ता ले आओ और र अम्मा को खिलाओ पिलाओ  और इसको इसके घर पहुंचा दो ।और अम्मा तुम्हारे बेटवा की कोई फोटो वोटो है नहीं साहब फोटो तो ना है । इंस्पेक्टर अमर दो पुलिसकर्मी को साथ लेकर सुखिया के बेटे को ढूंढने निकल पड़े।

              आसपास ढूंढते हुए पुलिस वाले कुछ दूर गए थे कि खेतों में उन्हें एक सत्रह अठारह साल के लड़के की लाश दिखाई पड़ी ।साहब साहब यहां पर एक लड़के की लाश पड़ी है कहीं यही तो सुखिया का लड़का नहीं है। इंस्पेक्टर बोला पता नहीं कोई फोटो तो है नहीं इसकी ये तो वो बूढी अम्मा ही बता पाएगी पहचान करके।

ले चलो बाडी उठाकर ।बाड़ी उठाकर मुर्दा घर में रख दी गई । पुलिस वाले सुखिया के पास आए और बोले एक लाश मिली है चलो पहचान करो उसकी । सुखिया को लेकर जब मुर्दा घर आए लाश देखते ही सुखिया दहाड़े मारकर रोने लगी अरे मेरा बेटवा जाने की उम्र तो मेरी थी तू क्यों चला गया ।

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तू ही तो मुझ अंधे की लाठी था ये।अब कैसे जीऊंगी तेरे बिना ।संभाले नहीं संभल‌रही थी सुखिया किसने हमार बेटवा को मारा साहब क्या दुश्मनी थी किसी की इससे ।ये तो हम नहीं बता सकते पता लगा रहे हैं फिर पता लगेगा ।

             पोस्टमार्टम हुआ तो पता लगा धनीराम की मौत जहर फैलने से हुई है । किसी ज़हरीले जीव ने या सांप ने काटा है उसको ।अब अम्मा बेटे की लाश तुम ले जाओगी ,हम कहां ले जाएंगे साहब हमार कोई नाही है न हमरे पास रूपया पैसा है । सोचा था इस बुढ़िया का सहारा बनेगा बेटवा तो उ तो हमसे पहले ही चला गवा अब हम का करी।

पुलिस वालों ने ही धनीराम का अंतिम संस्कार किया ।रो रोकर सुखिया के आंसू अब सूख गए थे ।घर भी उसका नहीं था एक झोपड़ियां बना कर रहती थी। थोड़ी बहुत मेहनत मजदूरी खुद कर लेती थी और धनीराम बेलदारी कर लेता था तो पेट भर जाता था।

               आज जब सुबह-सुबह इंस्पेक्टर अमर आए तो देखा बूढ़ी अम्मा वहीं बेंच पर पड़ी हुई है ।ये क्या अम्मा अभी तक यही पड़ी हो जाओ घर जाओ , कहां जाती साहब कोऊ घर नाही है ।घर नहीं है फिर क्या करें हम तुम्हारा ,,,,,,,,।एक हफ्ता हो गया सुखिया वहीं पड़ी है पुलिस वाले ही उसे कुछ खाने पीने को दें देते थे।

आज एक पुलिस वाले ने इंस्पेक्टर अमर से पूछा साहब इस बुढ़िया का क्या करें ।वो तो धरना देकर यही बैठ गई है जाने का नाम नहीं ले रही हैं। इंस्पेक्टर अमर सोंच में पड़ गए तभी उनको घर पर मां की कही हुई बात याद आ गई , बेटा अमर कोई ऐसी काम वाली मिल जाए बेटा जो दिनभर घर पर रहे काम करें खाना कपड़ा हम दो देंगे

और पैसे भी । वहीं पीछे जो नौकरों का कमरा है वहीं रह लेगी ।अमर उठकर बाहर आए, अम्मा ये बताओ घर का काम धाम कर लेती हो , हां बाबूजी कर लेत है , अच्छा चलो मेरे साथ ।अमर ले गए सुखिया को मां से मिलवाया , मां ये सुखिया है बेसहारा है दुखी हैं आदमी नहीं है

एक बेटा था वो भी नहीं रहा , रहने खाने की जगह नहीं है इसके पास।इसको रख लो गई का काम करेगी और यही पीछे नौकरो का कमरा है वहीं पड़ी रहेगी। खाना कपड़ा दो देना और कुछ पैसे भी।

                ठीक है अमर की मां बोली और अंदर से दो साड़ियां ले आई सुखिया को देती हुई बोली जाओ पहले नहा धोकर साफ सुथरी हो जाओ फिर तुम्हें काम समझाते हैं ।

         सुखिया को अमर के घर पर सहारा पाकर दिन फिर गए ।खूब अच्छे से मन लगाकर काम करने लगी ।और आते जाते भर-भरकर आशीष देती अमर को बेटवा खूब फलों फूलों,मुझ बेसहारा को तुमने सहारा देकर बहुत पुन्य का काम किया है।अमर और उनकी मां को बहुत खुशी है कि उन्होंने किसी बेसहारे को सहारा दिया ।उनका काम भी हो रहा है और अंधे को लकड़ी भी मिल गई।

मंजू ओमर

झांसी उत्तर प्रदेश

17 अक्टूबर

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