रक्षाबंधन – श्वेत कुमार सिन्हा

बात इसी रक्षाबंधन की है। एक तो रविवार का दिन और ऊपर से रक्षाबंधन का त्योहार।

मन मसोस कर सुबह सुबह उठा और “हमनशी” का अगला भाग अपलोड करके करीब सत्तर किलोमीटर दूर रहने वाली छोटी बहन से राखी बंधवाने निकल पड़ा।

देर हो रही थी। इसलिए मुख्य सड़क छोड़ शॉर्टकट रास्ता पकड़ लिया, जो गरीब झुग्गी बस्तियों से होकर गुजरता था।

थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर प्यास लगी तो एक जगह रुककर गला तर करने लगा। तभी आसपास से किसी बच्ची के जोर–जोर से रोने की आवाज कानों में पड़ी। इधर उधर नजरें घुमाकर देखा तो कोई न दिखा।

तभी मेरी नजर करीब दस साल की एक छोटी सी रोती हुई बच्ची पर पड़ी, जो सड़क किनारे एक चादर पर राखियां फैलाए उसके खरीददार का इंतजार रही थी।

पास जाकर रोने का कारण पूछा तो वह कुछ न बोली। थोड़ा प्यार से पूछने पर उसने बताया कि सुबह से एक भी राखी नहीं बिकी। घर पर एक अकेली मां कमाने वाली है,पर वह भी बीमार है। पिता तो कब के गुजर चुके। एक छोटा भाई है, जो मेरी राह देखता होगा। कुछ राखियां बिक जाती तो उसके लिए कुछ मिठाइयां लेकर जाती और राखी बांधती । लेकिन, सुबह से कोई भी खरीददार न आया।इतना बोलते हुए वह फिर से बिलक–बिलक कर रोने लगी।

मैने उसके चादर में बिक्री के लिए फैलाई हुई राखियां देखी जो यही कोई हजार पांच सौ रुपए की रही होगी। फिर अपनी जेब टटोला और पर्स निकाल एक हजार रुपए उसकी तरफ बढ़ा दिए।




इतने पैसे देख पहले तो वह कुछ समझ न पाई। पर, जब मैंने सारी राखियां खरीदने की बात बताई तो मेरी तरफ घूरती हुई निगाहों से यह सोचते हुए देखी कि मैं उससे कोई घटिया मजाक कर रहा हूं।

पर जब समझाया तो दोनो हाथो से अपने आंसू पोंछ एक बड़े से थैले में सारी राखियां डाल मेरी तरफ बढ़ा दी।

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उसके चेहरे पर छाई मुस्कान और घर पर इंतजार करते भाई को राखी बांधने की जल्दी देख मन प्रफुल्लित हो उठा।

अपने घर की तरफ बढ़ने के लिए मैं ज्यों ही मुड़ा, तभी पीछे से आवाज आई –”भईया, उसमे से एक राखी क्या आप मुझे दे सकते हो।”

इतनी सारी राखियों का भला मैं करता भी क्या! इसलिए बिना समय गंवाए पूरा थैला उसकी तरफ बढ़ा दिया। पर, थैले में से केवल एक राखी निकाल उसने मुझसे मेरा हाथ आगे बढ़ाने को कहा।

घर पहुंचने में मुझे देर हो रही थी। इसलिए उसकी मन की बातों को पढ़ न पाया ।

तभी मुस्कुराती हुई वह बोली “भईया, ये राखी इस छोटी बहन की तरफ से अपने इस प्यारे भैया के लिए।”और यह कहते हुए उसने मेरी कलाई पर वह राखी बांध दी।

उसकी बातें सुन और मन के भाव देख मेरा हृदय भावविहोर हो उठा और आँखें अनायास ही द्रवित हो गईं।

राखी बंधवाने के बाद शगुन के तौर पर उसे कुछ देने के लिए जब जेब में हाथ डाला तो उसने यह कहकर मुझे रोक दिया कि शगुन के रूप में भाई पाने के बाद अब कुछ और पाने की चाह न बची।

यह कहकर मुस्कुराते हुए अपने नन्हे कदमों से वह घर की तरफ  बढ़ गई, जहां उसका एक और भाई राखी बंधवाने के लिए इंतजार कर रहा था।

अपनी कलाई पर बंधी राखी को स्पर्श करता हुआ मैं भी आगे बढ़ गया, जहां एक और छोटी बहन मेरी राह देख रही थी ।

सभी बहनों को सादर नमन

#श्वेत_कुमार_सिन्हा  

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