सुबह की साफ़-सफाई करने के बाद निशा ने सोचा कि अब पूजा का सामान ले आती हूँ।हाथ में पर्स-थैला लिया और माँ को ‘ आती हूँ ‘ कहकर बाज़ार चली गई।खरीदारी के बाद जब वह घर लौट रही थी कि अचानक किसी ने आकर उसके मुँह पर हाथ रख दिया और उसे सुनसान गली में घसीटकर ले गया।अपना बचाव के लिए उसने चिल्लाना चाहा तो उस दुराचारी ने उसके ही दुपट्टे से निशा का मुँह बाँध दिया।
निशा उसके चंगुल से बचने के लिए पूरी कोशिश कर रही थी कि तभी कोई फ़रिश्ता बनकर आ गया और उस बदमाश के पीठ पर ज़ोर का एक मुक्का मारा।वह छिटक कर दूर जा गिरा।फिर तो फ़रिश्ते ने बदमाश की ऐसी धुनाई की कि वह सिर पर पैर रखकर भाग गया।निशा बहुत डरी हुई थी।उसकी घबराहट देखकर उन्होंने निशा से कहा,” जब भाई तुम्हारे साथ है तो डर कैसा।आओ,तुम्हें घर छोड़ देता हूँ।” उनके ऐसा कहने से निशा में हिम्मत आ गई और वह झट से उनकी मोटरसाइकिल पर बैठ गई।रास्ते में उन्होंने निशा से कहा कि घर में इस घटना का ज़िक्र नहीं करना, बेवजह तुम्हारे मम्मी-पापा परेशान हो जाएँगे।
घर आने पर वह मोटरसाइकिल से उतर गई और ‘थैंक यू ‘ कहकर अंदर चली गई।दीपावली के दो दिन बाद जब भाईदूज़ आया तो उसे अपने फ़रिश्ते भाई की कही बात ‘भाई तुम्हारे साथ है ‘ याद आने लगी।सोचने लगी,काश!दीपावली के दिन मिला हुआ भाई आ जाते,मैं उन्हें तिलक लगाती,उनकी आरती….।तभी दरवाज़े की घंटी बजी तो उसकी सोच को विराम लगा।उसने सोचा,शायद पापा के दोस्त आए होंगे।दरवाज़ा खोलते ही वह दंग रह गई।सामने उसके फ़रिश्ता भाई खड़े थें।उसे हतप्रद देखकर वे बोले,” मुझे तिलक नहीं करोगी।”
” हाँ-हाँ, क्यों नहीं।” उसकी खुशी का ठिकाना न था।उसकी मम्मी ने देखा, वो कोई प्रश्न करतीं, उससे पहले ही उसके भईया ने बोल दिया, ” आंटी, मेरा नाम अविनाश है।पिछले महीने मेरा एक्सीडेंट हो गया था,तब निशा ने ही अपना खून देकर मेरी जान बचाई थी,अब तो निशा मेरी बहन हुई ना।”
” हाँ-हाँ बेटा, क्यों नहीं।जा निशा,आरती की थाली ले आ।आज तो मुझे भी एक बेटा मिल गया है।” कहते हुए निशा की मम्मी चेहरा खुशी से खिल उठा।सच है,कभी- कभी अनजान रिश्ते एक अटूट बंधन में बँध जाते हैं।
— विभा गुप्ता