“उफ! ये क्या कर दिया आपने? पूरी फाइल डिलीट हो गई!अब कैसे मैं ये सब..”
छोटा भाई गुस्से में अपना लैपटॉप दूसरे कमरे में ले गया। पिछले दो महीने से इसके साथ रह रहा हूँ। पुराना काम छूटने के बाद नए काम की तलाश में। इसी ने अपने पास बुला लिया था।आज पहली दफा उसे गुस्सा करते देखा है। उसने खुद एक पुरानी फ़िल्म अपने लैपटॉप में मेरे लिए लगाई थी। और वे खाना बना रहा था। फ़िल्म देखते वक़्त मैं एक सीन को दुबारा देखना चाहता था पर कुछ डिलीट हो गया शायद। गलती मेरी ही थी, जो चीज आती नहीं उसे शायद नहीं करनी चाहिए। उसके डिलीट हो चुके जरूरी फाइल के लिए मैं आत्मग्लानि से भरा कमरे में तन्हा ही बैठा था कि भाई ने आवाज लगाई
“भैया.. सब्जी तैयार है”
मैं उसी आत्मग्लानि के साथ कमरे में गया और उसके कंधे पर हाथ रखा। वो अपना चेहरा दूसरी तरफ किये हुए था
“मुझे माफ़ कर दे छोटे, तेरा इतना नुकसान कर दिया”
“नहीं भैया,आप मुझे… माफ़”
उसकी आंखें भरी हुई थी पर वो अब भी मेरी ओर नहीं देख रहा था
“क्या बात है.. छोटे..?”
वो फफक कर रो पड़ा
“आपको..याद है.. भैया..जब आपने नया कैमरा लिया था.. जिसमें रील भरते थे?”
ये जिस बात की याद दिला रहा था, उसे मैं कभी भुल ही नहीं सकता। इसके बचपन की ऐसी कितनी नादानियों को याद कर अक्सर चेहरे पर मुस्कान जो आ जाती है। जब मैं कॉलेज में था तो ये आठ साल का होगा, मैंने अपने खरीदे उस कैमरे में पहली रील भराई थी,और खूब सारी तस्वीरें खिंची थी। बस उस रील को साफ कराना था। जब मैं कॉलेज से आया तो ये कैमरे से रील निकाल कर, धूप में उसे देख रहा था। मुझ पर नज़र पड़ते ही बोल पड़ा
“भैया! इसमें तो कुछ नज़र ही नहीं आ रहा है?”
“अरे ये क्या कर दिया, इसे पहले साफ कराते हैं, सब बेकार कर दिया तूने..कितनी सारी तस्वीरें खिंची थी मैंने”
उसके गालों पर दो मोती लुढ़क आये थे
“मुझे माफ़.. कर दो भैया, मैंने जानबूझकर नहीं किया.”
उसके आंसू देख मैंने झट से उसे अपने गोद में बिठा लिया था और
“पगले.. रो मत! ये इतना जरूरी नहीं था मेरे लिए, जितना..”
भाई की याद दिलाई इन बातों ने होठों पर मुस्कान और आँखों में नमी ले आई, मैंने उसे गले लगा लिया। ये गले लगकर रोते हुए मेरी उन्हीं बातों को दोहरा रहा था
“ये भी उतना जरूरी नहीं था भैया..जितना जरूरी आप हो मेरे लिए..!’
विनय कुमार मिश्रा
रोहतास (बिहार)