कौशल्या आंटी! हाँ! यही नाम था उनका। कौशल्या आंटी हमारे पड़ोस में रहती थी। मेरे घर से दो घर छोड़कर। बड़ी, मोटी तगड़ी थी वो। हम गली के बच्चे उनसे बड़े मजे लेते थे। होली के दिन तो हम सबसे ज्यादा गुब्बारे उन्हीं को मारते थे। पता है, क्यों? क्योंकि वह इतनी मोटी थी कि कितने भी गुब्बारे मारो पर गुब्बारे उनकी थुलथुल काया से टकराकर नीचे गिर जाते थे। फूटते ही नहीं थे।
खैर,यह तो हुई हँसी मजाक की बात। पर उनकी एक बात सबको बड़ी अखरती थी। उनमें एक बड़ी बुरी आदत थी।आंटी गली में आने वाले सब्जी, फल वालों से सब्जी, फल खरीदती थी। फल सब्जी तुलवाने और पैसे देने के बाद अक्सर कौशल्य आंटी साइज में छोटी सब्जियां, फल वापस रखकर बड़े साइज की सब्जी अपनी थैली में डाल लेती। सब्जी वाले से धनिया, हरी मिर्च देने के बाद भी खुद से ही एक्स्ट्रा धनिया, हरी मिर्च ले लेती।
पहले तो ठेले वाले उन्हें मना करते पर जब आंटी का यह सिलसिला बदस्तूर रहा तो ठेले वाले उनके हाथ से सामान वापस ले लेते। आखिर एक दिन वह भी आया जब फल, सब्जी वालों ने उनके आवाज देने पर भी उनके घर के सामने रुकना बंद कर दिया। अगर गली में कोई और महिला सब्जी ले रही होती और कौशल्या आंटी भी सब्जी लेने वहाँ आ जाती तो सब्जी वाले भैया उन्हें सब्जी देने से इंकार कर देते।
धीरे-धीरे यह बात अंकल को पता चली। अंकल ने आंटी को बहुत डाँटा पर अब क्या हो सकता था? आज आंटी की बहुएं भी आ गई हैं और सब्जी, फल वाले उनके घर के आगे आज भी नहीं रुकते।आंटी के छोटे से लालच में गली मोहल्ले में ही नहीं वरन सब्जी,फल वालों के बीच भी उन्हें बदनाम कर दिया।
इस तरह की हरकतें ना केवल हमें हमारे नैतिक व सामाजिक मान मर्यादा को भी समाप्त कर देती हैं।
स्वरचित
ऋतु अग्रवाल
मेरठ