बेटा ये दवाई खत्म हो गई थी जरा ले आना रात को खानी है !
जी बाबूजी अभी ले आऊंगा दफ्तर से सूरज आ कर बैठा ही था की बाबूजी ने याद दिलाया अंदर से शोभा पानी ले आई उसे पनीर मंगाना था उसका बेटा कई दिनों से जिद्द कर रहा था तो शोभा ने सोचा आज मंगा लूंगी लेकिन बाबूजी की बात सुनकर वो चुप रह गई ! मन ही मन सोच रही थी की बेटे आशु को कैसे बहलाऊं !
इतनी छोटी छोटी चीज के लिए भी मन मारना पड़ता है खास कर बात बच्चों की हो तो दिल दुखता है !सोच रही थी जिंदगी सुख कम दुख ज्यादा देती है ।
सूरज घर मैं कमाने वाला अकेला था उस पर पत्नी, बच्चे ,और बाबूजी की जिम्मेदारी , बाबूजी अक्सर बीमार रहते थे तो उनके इलाज पर काफी पैसा खर्च हो जाता था जिस कारण शोभा को छोटी छोटी इच्छाएं भी मारनी पड़ती !जैसे तैसे खींच कर महीना निकलता ।
शोभा घर को सम्हालने वाली और समझदार स्त्री थी लेकिन अब उसके मन मै बच्चे की इच्छा मरते हुए देख कुंठा आने लगी थी अब वो बाबूजी से चिढ़ने लगी और अक्सर अपने दिल की जलन बातों के जरिए निकालती!,जिसे सुनकर बाबूजी दुखी हो जाते पर सूरज से कुछ नही कहते उन्हे लगता उसका दिल दुखेगा।
आज बाबूजी का पेट थोड़ा खराब हो रहा था तो उन्होंने शोभा से कहा की आज सब्जी की जगह थोड़ा दही दे देना !
शोभा एकदम बिफर गई पैसे क्या पेड़ पर उगते है आपके खर्चे ही कम नही हो रहे आपके
चक्कर में हम अपनी इच्छाएं मार कर जी रहे है और तो और आपके पोते की भी इच्छा पूरी नहीं कर पा रहे पता नही कब पीछा छूटेगा !
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ये सुनकर बाबूजी सुन्न से हो गए कभी उन्होंने ऐसी बात नहीं सुनी थी पर आज इतनी बड़ी बात वो सबके लिए बोझ बन गए है ये सब सोचते हुए उनका मन बेचैन हो गया !और मन ही मन निर्णय लिया और वो घर से चले गए ।
शाम को सूरज आया देखा बाबूजी कमरे मै नही है।
शोभा से पूछा -बाबूजी कहां है ??
शोभा गुस्से मै तो थी बोली मुझे क्या पता गए होंगे कहीं !!
काफी देर तक बाबूजी नहीं आए ,सूरज को चिंता हुई उसने जोर देकर शोभा से पूछा तब तक आशु ने पूरी बात बता दी की मां ने दादाजी को ऐसा बोला।
सूरज गुस्से से बोला तुम पागल हो गई हो क्या ऐसे कोई बोलता है क्या ।।
शोभा बोली मैं तंग आ गई अपनी जिंदगी से
जिसमें सुख कम दुख ज्यादा है उनकी वजह से कितनी इच्छाएं मारनी पड़ रही है !
सूरज बोला ऐसे तो तुम्हे मुझसे भी शिकायत होनी चाहिए क्योंकि मैं तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर पा रहा !ये जिंदगी है और जीना इसी का नाम है जिसमे अपनों का साथ ज्यादा जरुरी होता है इच्छाओं की पूर्ति तो कभी नही होती पर अपनों का प्यार ही हमें जीने के लिए मजबूर करता है !बाबूजी मां के जाने के बाद टूट चुके थे लेकिन तुम्हारे आने से और आशु के आने से उनमें जीने की चाह पैदा हो गई और तुम सोचो कल को आशु हमारे साथ ऐसा करे तो ..
और सूरज बाबूजी को ढूंढने निकल गया ।
अब शोभा को भी अपनी गलती का अहसास हुआ की उसे ऐसे नही बोलना चाहिए बड़े लोग तो घर की छांव होते है और आशु भी बही सीखेगा वो भगवान से प्रार्थना करने लगी को उसकी भूल को माफ कर दे बाबूजी मिल जाए ।
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काफी देर बाद सूरज बाबूजी के साथ आया बाबूजी एक मंदिर के बाहर बैठे मिले !शोभा ने माफी मांगी और बोली मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी जिंदगी के दुख मैं ;मैं रिश्ते की कद्र भूल गई ।
बाबूजी ने खुश रहने का आशीर्वाद दिया और कहा
जिंदगी की यही रीत है ।।
स्वरचित
अंजना ठाकुर