युवा – विनय कुमार मिश्रा

हड़बड़ी में मोटरसाइकिल निकाल गाँव की ओर निकल गया। चाची की तबीयत का सुनकर पत्नी भी साथ आना चाहती थी पर अस्सी किलोमीटर धूप में इस खटारा साधन पर उसे ले जाना उचित नहीं समझा। सोचा थोड़ा शॉर्टकट ले लूँ।रास्ता सुनसान है थोड़ा खराब भी पर जल्दी पहुंच जाऊँगा। मुश्किल से पंद्रह किलोमीटर ही आया था कि एक कार वाले ने मेरे पूरे कपड़े पर कीचड़ उछाल दिया। और कट मार के आगे बढ़ गए। चार लड़के थे। बहुत गुस्सा आया। मैंने बड़बड़ाते हुए स्पीड बढ़ाई पर वो आगे निकल गए। ये बड़े घर के बिगड़ैल लड़के पता नहीं क्या समझते हैं।इंसान को इंसान नही समझते।चलने की तमीज नहीं। जरूर पीकर गाड़ी चला रहे होंगे। एक तो चाची के बारे में सोचकर और फिर इनकी हरकत ने इस लहलहाते धूप में मेरा दिमाग दुगुना गरम कर दिया था। इसी गुस्से में अभी कुछ दूर बढ़ा था कि वो चारो कार खड़ी कर एक टपरी पर थे शायद चाय या सिगरेट पी रहे होंगे। मन किया कि यहीं रुक कर हिसाब चुकता कर लूँ।पर उन चारों की कदकाठी और अपनी हालत देख मैंने इरादा बदल लिया।

फिर भी मोटरसाइकिल थोड़ी धीरे कर उन्हें घूरता हुआ निकल गया। अभी और कुछ दूर आया तो मेरी गाड़ी बंद हो गई। शायद पेट्रोल नहीं था। मेन और रिजर्व पेट्रोल चेंज का स्विच पहले से खराब है।और आज का दिन तो पूरा खराब है। शॉर्टकट लेने के कारण पेट्रोल लेना भूल गया। पेट्रोल पम्प यहाँ से लगभग दस किलोमीटर पर था। इतनी धूप में गाड़ी को खींच पैदल निकल रहा था।

पसीने और थकान से हालत खराब हो रही थी। सुनसान रास्ते पर कोई पानी पीने की दुकान भी नज़र नहीं आ रही। तपती गर्मी में पैदल गाड़ी खींचना मानो जान निकल रहा हो। इतने में वो लड़के आकर अपनी गाड़ी रोक दिए। मेरी तो हालत खराब होने लगी। बेकार में इन्हें घूर कर देखा था। गाँव जाकर कपड़े तो धोने ही पड़ते अब ये चारों मुझे धोएंगे!तभी उनमें से एक

“क्या हुआ भइया?”

“ककककुछ नहीं.. पेट्रोल खत्म हो गया है लग रहा है?”  मैंने पसीना पोंछते हुए कहा

“कोई बात नहीं आप परेशान ना होइए पहले ये पानी पीजिए” कसम से आज पानी अमृत जैसा लग रहा था पूरा का पूरा बोतल खत्म कर दिया।

“और चाहिए” मैंने ना में गर्दन हिलाया। फिर उन्होंने मेरी गाड़ी चेक किया हिलाया डुलाया

“पेट्रोल तो है आपकी गाड़ी में! पेट्रोल पम्प तक आसानी से चले जायेंगे।..टूलकिट खोलिए जरा” उन्होंने गाड़ी खोल कार्बोरेटर और चॉक देखा फिर मेरी बाइक स्टार्ट कर दिया। मेरी जान में जान आई।

“धन्यवाद आपलोगों का”

“कोई बात नहीं भइया! गर्मी बहुत है आप निकलिए” वो चले गए मैं भी उनके पीछे निकल गया ये सोचता हुआ कि अनजाने में गंदे हुए मेरे कपड़े से ज्यादा तो इनके हाथ और कपड़े गंदे हो गए थे

मैं गलत था ये आवारा और बिगड़ैल नहीं आज के युवा हैं..जिनमें जज़्बा है दूसरों की मुसीबत में काम आने का..!

विनय कुमार मिश्रा

 

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