ये तेरा घर ये मेरा घर – अंजना ठाकुर

मां राहुल दस दिनों के लिए काम के सिलसिले मै बाहर जा रहे है तो मैं रहने के लिए आ रही हूं—मीनू की आवाज में मायके जाने की अलग ही खुशी थी। फोन पर उसकी हँसी सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी से अपने बचपन वाले आँगन में दौड़ रही हो। कभी-कभी लड़की जितनी भी बड़ी हो जाए, शादी हो जाए, जिम्मेदारियाँ बढ़ जाएँ—मायके का नाम सुनते ही आवाज में एक अलग-सा खिलापन अपने आप आ जाता है।

मां भी ये सुनकर बहुत खुश हुई पर अगले पल ही कुछ सोचने लगी कि मीनू अभी एक महीने पहले ही रहकर गई है। कहीं बहू (प्रीति) को ननद का आना बोझ न लगने लगे, कल को रिश्ते खराब हो जाए। मंजू जी का मन बेटी की खुशी और घर की शांति—दोनों के बीच झूल गया। उन्हें याद आया कि आजकल लोग कितनी छोटी-छोटी बातों में रिश्तों को बड़ा मुद्दा बना लेते हैं। कहीं ऐसा न हो कि जो अपनापन अब तक सहज था, वह धीरे-धीरे “जिम्मेदारी” और “बोझ” में बदल जाए।

क्या सोच रही हो मां तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा क्या..? मीनू ने दूसरी तरफ से पूछ लिया। शायद बेटी माँ की चुप्पी तुरंत पकड़ लेती है।

अरे नहीं- नहीं.. बेटी का आना किसे बुरा लगता है आजा तू। मंजू जी ने जल्दी से बात संभाली, पर मन की गांठ अभी भी ढीली नहीं हुई थी। उन्होंने अपने ही मन में खुद को समझाया—“बेटी का आना तो सुख है, पर बहू का मन दुखी हुआ तो घर का सुख छिन जाएगा।”

मंजू जी के एक बेटी और एक बेटा है। बेटी की शादी एक ही शहर में दो साल पहले हुई थी। दामाद जी को काम के सिलसिले में बाहर जाना पड़ता है। यहां बेटी और दामाद रहते हैं तो बेटी हमेशा उतने दिन मायके आ जाती। सब लोग खुश हो जाते मीनू के आने से। घर में भी चहल-पहल हो जाती और मंजू जी को भी साथ मिल जाता क्योंकि पति और बेटा दुकान निकल जाते।

मीनू के आने से घर फिर से भर जाता था—हँसी, बातें, यादें, रसोई में खटपट, और रात को छत पर बैठकर पुराने किस्से। मंजू जी को लगता जैसे उनका खालीपन कम हो जाता है। सुबह चाय बनाते हुए भी किसी से बात करने को मिल जाता। दोपहर में टीवी के आगे बैठने पर भी कोई साथ होता। बेटी की मौजूदगी मां के लिए दवा जैसी थी।

अभी दो महीने पहले बेटे की शादी प्रीति से हुई थी। प्रीति काफी मिलनसार और समझदार थी। उसको भी मीनू के आने से खुशी ही होती, क्योंकि वह स्वभाव से खुली और हँसमुख थी। वह घर को अपना बनाने की कोशिश कर रही थी—सबकी पसंद जानना, सास की आदतें समझना, और ससुर व पति का सम्मान निभाना।

लेकिन आजकल की बातें सुनकर मंजू जी को लगता कि यूं मीनू का बार-बार मायके आना कहीं रिश्ते में दूरी न ला दे। उन्होंने मोहल्ले की औरतों की बातें भी सुनी थीं—“बहू को क्या अच्छा लगेगा बार-बार ननद का आना?” “ननद आती है तो बहू को काम बढ़ जाता है।” “फिर तुलना शुरू होती है।” ये सब बातें मंजू जी के मन में घर कर गई थीं।

मंजू जी जब बेटी से बात कर रही थी तो प्रीति कमरे में ही थी। उसने फोन पर मीनू की आवाज भी सुनी और मां की आवाज में आए छोटे से ठहराव को भी। सास को विचारमग्न देख उसे लगा कि इस बार मम्मी खुश क्यों नहीं है बेटी के आने पर।

उसने पूछा—क्या हुआ मम्मी आप परेशान लग रही हो, कब आ रही है दीदी?
वो शाम तक आ जायेगी कहते हुए मंजू जी बोली—बहू तुम्हें मेरी बेटी के आने से दिक्कत तो नहीं है।

मंजू जी के स्वर में हिचक थी, जैसे वे कोई बहुत नाजुक बात पूछ रही हों। उन्हें डर था कि अगर प्रीति के मन में कहीं भी हल्का सा बोझ होगा तो वह मान जाएगी, और वही बोझ धीरे-धीरे दीवार बन जाएगा।

प्रीति बोली—मुझे क्यों दिक्कत होगी मांजी, ये घर दीदी का भी है, वो जब चाहे तब आ जाए। और फिर दीदी तो खुद ही समझदार है। वो आकर हर काम की उम्मीद मुझसे न करके खुद ही आगे से हाथ बंटाती है और ना कभी कोई बात ऐसे कहकर लड़वाने की कोशिश करतीं। मांजी घर में अपनों के साथ से खुशी ही मिलती है, बस वो आपकी कद्र करे।

प्रीति ने बहुत सहजता से कहा, पर उसकी बातों में गहराई थी। उसने यह भी समझा दिया कि रिश्तों में ‘स्पेस’ और ‘सम्मान’ दोनों जरूरी हैं। अगर ननद सास की कद्र करेगी और घर में प्यार बढ़ाएगी, तो उसका आना बोझ नहीं, आशीर्वाद बनेगा।

मैं भी अपने मायके जाती हूं और मायका तो लड़कियों के लिए सुकून का जरिया है जहां वो अपनी जिंदगी जीती है। आप भी बेफिक्र हो जाओ और बेटी का स्वागत वैसे ही करो जैसे पहले करती थी। मैं भी तैयारी कर लेती हूं।

यह सुनकर मंजू जी की आँखें भर आईं। उन्हें लगा जैसे उनके मन का डर किसी ने धीरे से खोलकर हवा में उड़ा दिया हो। जो बात वे खुद से कह नहीं पा रही थीं, वह बहू ने कितनी खूबसूरती से कह दी।

मंजू जी ने प्रीति को हजारों आशीर्वाद दिए और बोली—अब मैं निश्चिंत हूं कि मेरी बेटी का मायका मेरे जाने के बाद भी रहेगा।

इस वाक्य में एक मां की सबसे बड़ी चिंता छुपी थी—कि उसके बाद रिश्ते बचे रहेंगे या नहीं। और प्रीति ने उस चिंता पर भरोसे का हाथ रख दिया था।

शाम को मीनू घर आई। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, मां ने उसे गले लगा लिया। इस बार गले में सिर्फ खुशी नहीं, राहत भी थी। मीनू ने आते ही कहा—“मां, आज तो आपकी आवाज बहुत खुश लग रही है!”
मंजू जी मुस्कुरा दीं।

शाम को मंजू जी ने मीनू को सारी बात बताई। मीनू भी खुश थी। उसे लगा जैसे उसकी अपनी भाभी ने उसे ‘पराया’ नहीं, ‘अपना’ माना। मीनू के मन में जो हल्का सा डर था कि कहीं वह बार-बार आकर किसी को असहज न कर दे—वह डर पिघल गया।

वो प्रीति को थैंक्यू बोलने गई तो प्रीति बोली—इसमें थैंक्यू वाली कोई बात नहीं, ये घर मेरा भी है और तुम्हारा भी। बस हम कोशिश करे इसमें पनपते रिश्तों को प्यार और अपनेपन से और बढ़ाए, न की जलन और बैर से मुरझाने दे।

प्रीति की बात सुनकर मीनू की आँखों में चमक आ गई। उसने सच में महसूस किया कि अगर घर में बहू ऐसी समझदार हो, तो मां के बाद भी मायके की चौखट बेटी के लिए बंद नहीं होती।

मीनू बोली—सही कह रही हो भाभी, चलो खाने की तैयारी कर ले, मुझे बहुत भूख लगी है।
और फिर दोनों रसोई में लग गईं। मीनू ने सब्जी काटी, प्रीति ने रोटियाँ लगाईं, मां ने मसाले का तड़का लगाया। रसोई में हँसी गूंज रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे रिश्तों की असली खुशबू दाल में नहीं, साथ में घुल रही हो।

मीनू को बाबुल की गलियों का रास्ता हमेशा के लिए खुला दिख रहा था।

वह रात जब सब खाना खाकर बैठे, मीनू ने सोचा—“अगर हर घर में ऐसी प्रीति हो, तो कितनी बेटियाँ अपने मायके को ‘बेगाना’ महसूस करने से बच जाएँ।” मां ने भी मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया—“मेरे बेटे के हिस्से में ऐसी बहू आई, जो रिश्ते जोड़ना जानती है।”

दोस्तों अक्सर रिश्ते गलतफहमी, आपस में चिढ़ और अहम के कारण ही टूटते है। मायका हो या ससुराल रिश्ते बनाए रखने के लिए एक दूसरे को समझना और अपनापन देना जरूरी है। आपकी क्या राय है मेरे विचार के बारे में? कृपया मार्गदर्शन दें।

स्वरचित
अंजना ठाकुर


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आपके हिसाब से मायके का रिश्ता कैसे बचाया जा सकता है—विशेषकर तब, जब भाई की शादी हो चुकी हो?
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