शानो-शौकत से भरी जिंदगी थी ठकुराइन की।कलफ लगी साड़ी पहनकर पान का बीड़ा मुंह में दबाए जहां से निकलती सब सम्मान में सिर झुका कर प्रणाम करते और वो भी दो मीठे बोल बोलकर सभी का हालचाल पूछा करती थीं।
ठाकुर साहब नहीं रहे तो भी उन्होंने गांव छोड़कर बच्चों के साथ विदेश जाने से मना कर दिया था। बच्चों की भी अपनी दुनिया थी।धन दौलत की कमी थी नहीं एक नौकरानी गुलबिया के भरोसे मां को छोड़कर चल दिए थे।
गुलाबिया तन मन से ठकुराइन अम्मा की सेवा किया करती थी और ठकुराइन भी उसकी हर जरूरतों को पूरा कर देती। कहीं ना कहीं अकेलापन उनको खाने लगा था। वक्त के साथ उम्र भी ढल रही थी और सेहत में गिरावट भी शुरू हो गया था।अब वो पूरी तरह से गुलाबिया पर निर्भर रहने लगी थी।
गुलाबिया भी निस्वार्थ भाव से उनकी सेवा करती। एक दिन ठकुराइन की तबीयत ठीक नहीं थी और कुछ दवाइयां और फल मंगाने थे, लेकिन वो चाह करके बिस्तर से खड़ी नहीं हो पा रहीं थीं। रुपए पैसे तिजोरी में रखतीं थीं, चाभी पल्लू के कोने में बांधी रहती थी। गुलाबिया ने उनका भरोसा पहले से ही जीता था तो बिना सोचे-समझे गुलाबिया को चाभी थमाती हुई बोली,” गुलाबिया… आलमारी से कुछ पैसे निकाल कर मेरी दवाइयां और मौसमी मांग ले बिटिया…आज उठने की हिम्मत नहीं हो रही है।”
अम्मा!” चलो मैं सहारा देकर ले चलतीं हूं…आप ही सम्हालो अपने रुपए – पैसे। मैं आपकी तिजोरी को हांथ ना लगाऊंगी” गुलाबिया ने ठकुराइन अम्मा को लेकर तिजोरी तक गई।
अरे! ” मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है ” अम्मा थकी हारी आवाज में बोली। तिजोरी में पैसे देखकर गुलाबिया की आंखें चकाचौंध हो गई, लेकिन अपने आपको संभाल कर तुरंत नजरें फेर ली। अरे “सम्भाल कर ले चल बिस्तर पर लिटा दे “और चाभी को पल्लू में कसकर बांध कर बिस्तर पर लेट गई अम्मा। गुलाबिया के सामने इतने सारे पैसे जैसे घूम रहे थे।वो मन ही मन सोच रही थी कि काश! भगवान उसे भी कुछ दौलत देते तो उसे अपने बच्चों को पालने – पोसने में दर – दर की ठोकरें ना खानी पड़ती और मेरा परिवार भी एक अच्छी जिंदगी गुजारता।
कहते हैं ना नियत अगर बदलने लगे तो इंसान कुछ ना कुछ गलत काम करने की सोचते ही लगता है। एक इमानदार को भी जरूरत या ये कहें की लालच गलत कदम उठाने से रोक नहीं सकती है। अम्मा की तबीयत ठीक हो गई थी क्योंकि गुलाबिया खूब सेवा करती थी। गुलाबिया आज सुबह से गुमसुम सी अपने काम में लगी थी। अम्मा को समझ में आ रहा था कि गुलाबिया थोड़ी परेशान हैं।” क्या हुआ बिटिया…आज तू चुप – चुप क्यों है?”
“कुछ नहीं अम्मा बच्चे की फीस भरनी थी… पैसे नहीं हैं।आप तो जानती हो ना कि घर खर्च ही बड़ी मुश्किल से चलता है… कहां से लाऊं फीस? बच्चे नहीं पढ़े लिखे तो हमारी तरह किसी के घर में चाकरी ही करेंगे” बड़बड़ाती हुई रसोई घर में चली गई गुलाबिया।
“कितने रुपए चाहिए बता मैं देती हूं ” अम्मा पल्लू से चाभी खोलकर तिजोरी की तरफ जाती हुई बोली।
अम्मा! ” मेरे ऊपर आपके बहुत अहसान हैं … कहां से भरूंगी इतने पैसे?”
“चल फालतू बात बंद कर बता कितने पैसे दूं”।
“अम्मा पांच हजार फीस भरनी है दोनों बच्चों की” गुलाबिया कपड़े डालते – डालते बोली।
अरे! ” गुलाबिया सरकारी स्कूलों में तो इतनी फीस नहीं है” अम्मा को कुछ अजीब लगा था।
“अम्मा फीस ही थोड़ी होती है और भी दस नाटक हैं …आप तो रहने दो ब्याज पर उठा लूंगी कहीं ना कहीं से।”
” मेरे रहते कोई जरूरत नहीं है कर्ज उठाने की। भगवान की कृपा से खेती से पैसा रुपया आता ही है और तेरे बाबूजी की जमा-पूंजी मेरे लिए बहुत है। बच्चों को ना ही मेरे पैसों की जरूरत है ना मुझे उनकी” अम्मा ने पांच हजार रुपए गुलाबिया के हांथ में रखते हुए कहा।
गुलाबिया को अब समझ में आने लगा था कि अम्मा से कैसे पैसे निकाले जा सकते हैं। लालच का बीज उसके मन में पनपने लगा था। दस – पंद्रह दिन में कोई ना कोई जरूरत का रोना रोकर वो पैसे मांगा करती और अम्मा को भी लगता कि,” बच्चों को तो लेना देना है नहीं…सब अपनी दुनिया में मस्त हैं।
जब उनको मां की स्मृति ही नहीं है तो दौलत का क्या… गुलाबिया कितनी सेवा करती है। उसके काम ही आ जाएंगे पैसे। मैं तो ये घर गुलाबिया के नाम कर दूंगी। जिसने मेरी तन मन से सेवा की है वही मेरी सम्मति का भी अधिकारी होगा।” अम्मा के मन में गुलाबिया के लिए कितने नेक विचार थे।
अम्मा की तबीयत बिगड़ी रहने लगी थी और गुलाबिया धीरे धीरे घर की मालकिन बनने का सपना देखने लगी थी।अब वो बेधड़क तिजोरी खोलती और सौ रुपए की जगह पांच सौ निकाल लेती। अम्मा भी क्या करती वो बेखबर थीं की गुलाबिया की नियत खराब हो चुकी है।वो तो उस पर आंख बंद करके भरोसा करतीं थीं।
एक दिन गुलाबिया ने सोने की बालियां कान में डाल कर आई तो अम्मा बोली कि, ” अरे बालियां तो बड़ी अच्छी लग रहीं हैं। पहले तो कभी नहीं देखा।”
अम्मा!” सोने की बालियां मेरे नसीब में कहां…ये तो सोनार की दुकान के पास वाले ठेले से खरीदा है पचास रुपए में” और नजरें चुराकर जल्दी से रसोईघर की तरफ भागी।
अब गुलाबिया के रहन- सहन में अब बदलाव दिखाई देने लगा था। सागर में से कुछ बूंद निकाल लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता पर गुलाबिया का लालच का घड़ा में वो बूंदें इक्ट्ठा होने लगी थी। अम्मा की मजबूरी का भरपूर फायदा उठाने की आदत पड़ने लगी थी गुलाबिया को।
आज रात अम्मा की तबीयत ठीक नहीं लग रही थी तो उन्होंने गुलाबिया से कहा ” बिटिया आज रात मेरे पास ही रुक जा। अच्छा नहीं लग रहा है मुझे… तू पास ही रहेगी तो
रात में ज़रूरत पड़ने पर परेशानी नहीं होगी।”
गुलाबिया को भी लगने लगा था कि” अम्मा ने ऐसे कभी नहीं कहा… जरुर तबीयत बिगड़ी हुई लगती है।”
अम्मा के पलंग के पास ही चटाई बिछाकर लेट गई। रात को अम्मा ने पानी मांगा… अम्मा के सीने में बहुत दर्द था… दर्द और बेचैनी से कराह रहीं थी। शायद उनको लगने लगा था कि अब उनका अंतिम समय आ गया है।
पानी लेकर लौटी गुलाबिया तो अम्मा की आंखें बंद हो चुकी थीं। गुलाबिया को लगा कि अम्मा को नींद आ गई होगी। सोने देती हूं…जब पानी मांगेंगी दे दूंगी।
सुबह अम्मा उठी ही नहीं तब उसने अम्मा को हिलाकर देखा तो उसकी समझ में आ गया था की अम्मा नहीं रहीं।
पड़ोसियों को आवाज दिया… अम्मा दुनिया से विदा हो चुकी थी अब इस धरती से तो क्या रिश्ते – नातों और धन दौलत से दूर एक अलग दुनिया में चली गई थीं।
पड़ोसियों ने बेटे को खबर दिया… बच्चों को आने में वक्त लगना था इसलिए दूर के रिश्तेदारो और गुलाबिया ने ही अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। सभी दुखी मन से तैयारी में लगे थे तभी किसी की निगाह अम्मा के सिरहाने रखे कागजात पर पड़ी। उसमें लिखा था कि,” अम्मा ने अपनी सारी दौलत और घर गुलाबिया के नाम कर दिया था।…
गुलाबिया के हांथ – पांव ठंडे पड़ गए थे।उसको आत्मग्लानि महसूस होने लगी थी कि उसने अम्मा के विश्वास को कितनी चोट पहुंचाई थी चंद रुपयों के लालच मे। बिना किसी रिश्ते के सबकुछ उसके नाम करके चली गई थी और वो उन्हीं के साथ विश्वासघात करती रही।मन ही मन अम्मा से माफी मांग रहीं थीं और सोच रहीं थी कि अम्मा मैं इस काबिल नहीं हूं, हो सके तो माफ कर देना।
सच कहा कि # ये धन – सम्पत्ति ना अच्छे-अच्छों का दिमाग खराब करती है।” मन के अंदर लालच का आ जाना हमेशा इंसान को गलत दिशा में ले ही जाता है। निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाली गुलाबिया के मन में जब से लालच बैठा तो उसकी भावनाओं में भी परिवर्तन आने लगा था और ना चाहते हुए भी वो अम्मा से विश्वासघात कर बैठी थी।
प्रतिमा श्रीवास्तव
नोएडा यूपी
#ये धन -सम्पत्ति ना अच्छे-अच्छों का दिमाग खराब कर देती है