ये बंधन है नेह का – श्वेता अग्रवाल : Moral Stories in Hindi

शर्माती,लजाती लाल जोड़े में लिपटी पीहू ने जैसे ही चावल भरे कलश को गिराकर गृह-प्रवेश किया,वैसे ही उसकी जेठानी मुग्धा ने उसे गले से लगा लिया और धीरे से उसके कान में प्यार से बोली “टेंशन मत लो, मैं हूँ ना।”

इतना वात्सलय और अपनापन था उन शब्दों में कि पलभर में ही पीहू का सारा डर गायब हो गया और बस उसी क्षण से मानो मुग्धा पीहू की बड़ी बहन ही बन गयी। वह पीहू को खूब लाड़-प्यार करती। उसकी हर जरूरत का ध्यान रखती ।ससुराल के नियम-कायदे उसे बहुत प्यार से समझाती। बदले में पीहू भी मुग्धा का खूब मान-सम्मान करती । सारा दिन साये की तरह उसके आगे-पीछे लगी रहती। दोनों में बहुत प्यार था। सारा दिन पूरा घर दोनों की हँसी-ठिठोली से खिलखिलाता रहता था।

इसीतरह हँसते-खेलते पीहू को ससुराल में दो महीने हो गए । राखी का त्यौहार आने वाला था । शादी के बाद पीहू का यह पहला त्यौहार था तो वह इसे लेकर बहुत एक्साइटेड थी ।

“भाभी, मैं राखी पर कौन सा लहंगा पहनूँ ,रेड या पिंक?” एकदिन पीहू ने चहकते हुए पूछा।

“कोई भी पहन ले ,तेरे पर तो हर रंग जचता है ।” मुग्धा ने कहा।

“भाभी आप क्या पहनेंगी?” पीहू ने पूछा ।

“मैंने अभी डिसाइड नहीं किया ।” मुग्धा ने सपाट शब्दों में कहा और वहाँ से चली गई।

“भाभी,आज राखी लेने बाजार चलें ?” कुछ दिन बाद पीहू ने कहा।

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“पीहू तुम और मयंक (पीहू का पति) चले जाओ,मेरी तबीयत ठीक नहीं है।” मुग्धा ने मना करते हुए कहा ।

“क्या हुआ,भाभी?” पीहू ने चिंतित होते हुए पूछा।

“कुछ नहीं,हल्का सिरदर्द है।तुम जाओ।” मुग्धा ने कहा ।

“आपको ऐसे छोड़कर मैं कैसे जा सकती हूँ ।” पीहू ने कहा और तेल लेकर मुग्धा के सिर की मालिश करने लगी ।

“अब मुझे ठीक लग रहा है ।जा तू मयंक के साथ चली जा। तुमलोग घूम-फिर भी लेना और राखी भी ले आना।” कहते हुए मुग्धा ने पीहू को जबरदस्ती भेज दिया।

“चलो, पहले तुम्हारी फेवरेट चॉकलेट आइसक्रीम खाते हैं,फिर शॉपिंग करेंगे।” मयंक ने कार आइसक्रीम पार्लर की ओर मोड़ते हुए कहा।

“नहीं,मुझे नहीं खानी कोई आइसक्रीम-वाइसक्रीम।” पीहू ने कहा।

“क्या! आइसक्रीम नहीं खानी? पर क्यों? मयंक ने हैरानी से पूछा।

“बस ऐसे ही, मन नहीं है।” पीहू ने टालते हुए कहा।

“क्यों मन नहीं है ,कोई तो बात है जो तुम्हें परेशान कर रही है।बताओ क्या बात है।” मयंक ने जोर देते हुए कहा।

“मयंक,पता नहीं आजकल भाभी को क्या हो गया है? बिल्कुल उदास और चुप-चुप सी हो गयी है।मैं, कितनी कोशिश कर रही हूँ पर कुछ समझ नहीं आ रहा। लगता है मेरी किसी बात का उन्हें बुरा लग गया है। तभी तो देखो आज शॉपिंग पर भी नहीं आयी।” पीहू ने परेशान होते हुए कहा।

“नहीं,पीहू जैसा तुम सोच रही हो वैसा कुछ नहीं है। तुम बेकार ही परेशान हो रही हो। राखी आने वाली है न इसलिए भाभी उदास है। आज से चार साल पहले भाभी के एकलौते बड़े भैया लेफ्टिनेंट शशांक कश्मीर में उग्रवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। तबसे हर साल भाभी का यह त्यौहार सूना ही जाता है। हम भी भाभी की भावनाओं का ख्याल कर प्रिया दीदी के यहाँ जाकर ही राखी बंधवा आते हैं। यहाँ कोई सेलिब्रेशन नहीं करते।”

“लेकिन, मुझे किसी ने यह बताया क्यों नहीं?” पीहू ने दुखी होते पूछा।

“वो छोड़ो,अब तो तुम्हें पता चल गया ना तो तुम भी अपने पीहर जाकर ही राखी मना लेना। यहाँ कोई ताम-झाम मत करना।” मयंक ने कहा |

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राखी के पहले दिन सासू माँ ने भी पीहू को समझाया “बेटा, तुम कल पीहर जाकर ही राखी बाँध आना। अपने भाई को यहाँ मत बुलाना, बेकार में मुग्धा का जी दुखा कर क्या फायदा।”

लेकिन पीहू के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था। सबकी बातों को अनसुना कर राखी वाले दिन वह सुबह से ही जोर-शोर से तैयारियों में जुट गई। तरह – तरह के पकवान बनाए। पूरे घर को सजाया।

जब मयंक ने उसे इस चीज के लिए टोका “पीहू,अब तो तुम्हें सारी बात पता है। फिर, तुम क्यों इतना तामझाम कर रही हो? तुम्हारी इस हरकत से भाभी का कितना दिल दुखेगा तुम्हें पता है ना। इसीलिए बंद करो यह तामझाम और चुपचाप अपने पीहर जाकर राखी बांधकर आ जाओ।”

यह सुनकर पीहू ने मयंक को टका-सा जवाब दे दिया “मयंक मुझे भाभी से पूरी हमदर्दी है। लेकिन,उसके लिए मैं अपना त्यौहार तो नहीं खराब कर सकती। यह शादी के बाद कि मेरी पहली राखी है और मैं इसे यही ससुराल में मनाऊॅंगी। आखिर मेरे भी कुछ अरमान हैं।” यह कहकर पीहू और भी जोर-शोर से तैयारियों में जुट गई। उसके इस व्यवहार से सब हतप्रभ रह गए।

मयंक उसे गुस्से में कुछ और कहता इससे पहले ही उसकी सासू माॅं ने यह कहकर मयंक को रोक दिया “की जब इसे किसी की भावनाओं की कोई कद्र ही नहीं है तो क्यों बात आगे बढ़ा रहा हैं? ऐसा करने से बड़ी बहू का ज्यादा जी दुखेगा।” यह सुनकर मयंक गुस्से में घर से बाहर चला गया।

वही दूसरी ओर अपने भैया की तस्वीर को सीने से लगाए मुग्धा अपने कमरे में रो रही थी। अपने सूनेपन से ज्यादा पीहू का व्यवहार उसे तकलीफ पहुँचा रहा था। समझ ही नहीं पा रही थी कि जिस देवरानी को वह अपनी छोटी बहन सा प्यार करती है वह इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है।

यह सब सोचते सोचते मुग्धा की आँख लग गयी। तभी जोर-जोर से कमरे का दरवाजा खटखटाने की आवाज़ आयी। दरवाज़ा खोला तो सामने पीहू का छोटा भाई नितिन हाथों में राखी लिए खड़ा था “दीदी ,अपने छोटे भाई को राखी नहीं बांधोगी। मैं शशांक भैया की जगह तो नहीं ले सकता पर इतना विश्वास जरूर दिलाता हूँ कि छोटे भाई के सारे फ़र्ज़ जरूर निभाऊँगा।” यह सुनकर मुग्धा फूट-फूट कर रो पड़ी।

उसे रोता देख पीहू ने आगे आकर कहा “दीदी, जल्दी से नितिन को राखी बांधो। जब तक बड़ी बहन राखी नहीं बांधेगी, छोटी कैसे बांधेगी और आपकी छोटी बहन को बहुत जोर से भूख लगी है। भूख से पेट में चूहे कूद रहे हैं।”

यह सुनते ही मुग्धा को हॅंसी आ गई। उसने मुस्कुराते हुए नितिन की कलाई पर राखी बाँध दी और नितिन और मुग्धा को प्यार से गले लगा लिया। उनके ‘स्नेह का बंधन’ राखी के तार से जुड़कर और भी मजबूत हो गया।

धन्यवाद।

साप्ताहिक विषय प्रतियोगिता-#स्नेह का बंधन

लेखिका – श्वेता अग्रवाल

            धनबाद, झारखंड

शीर्षक- ये बंधन है नेह का

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