“बधाई हो, आपके घर नन्हा मेहमान आने वाला है “डॉ. की बात सुनते ही रूपा के चेहरे पर मुस्कान छा गई, पति अरुण के चेहरे पर चिंता की लकीरें देख रूपा ने मुँह बनाया,”पुरुष लोग भी कितने अजीब है, सिर्फ अपनी ही सोचते है ..बिसूरने दो…., मन के विचार झटक रूपा ने सबसे पहले अपनी माँ को फोन लगाया…,
“माँ बधाई हो तुम नानी बनने वाली हो “सुनते ही रूपा की माँ शालिनी जी गदगद हो गई,।
फोन पर बात खत्म कर रूपा ने अरुण की तरफ देखा, कोने में फोन पर लगे थे।”हूँ… कर रहे होंगे अपनी माँ को फोन…”.।अगले दिन सासू माँ को देख रूपा को गुस्सा तो बहुत आया,”क्या जरूरत थी अभी बुलाने की, बुलाना ही था तो मेरी माँ को बुलाते…”
अरुण रूपा का सारा गुस्सा सह गया, कुछ बोला नहीं, रूपा को थोड़ा आश्चर्य हुआ, कड़क मिजाज का अरुण का यूँ चुप हो जाना…. ये परिवर्तन रूपा को समझ में नहीं आया।
समय बीतता रहा, अरुण ऑफिस से देर से आते,यूँ तो दिन में कई बार फोन कर रूपा का हाल पूछता..पर रात खाना खा तुरंत सो जाता…रूपा शिकायत भी करें तो क्या..?
बेटे को ऑफिस के साथ घर के कामों में सहायता करते देख, एक दिन अरुण की माँ बोली,
“अरे बेटा, बहू दिन भर आराम करती रहती है,प्रसव में दिक्कत आयेगी , चलती -फिरती रहेगी तो प्रसव आसान होगा…”..।
“सब ठीक होगा माँ, आप चिंता ना करें,… डॉ. ने उसे रेस्ट बोला है.. और मै कोई रिस्क नहीं लेना चाहता हूँ .”अरुण ने जवाब दिया..।हमेशा अपनी माँ का कहना मानने वाले अरुण का जवाब सुन रूपा आश्चर्य चकित थी।
रूपा माँ बनने के सपनों की उड़ान में मग्न थी, और अरुण चिंतामग्न…,धीरे -धीरे प्रसव का समय नजदीक आ गया…और एक सुबह रूपा ने प्यारी सी गुड़िया को जन्म दिया, जब होश आया तो अरुण को अपने पास नहीं देख रूपा का मन बुझ गया।
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घर आने के बाद रूपा को समझ में आया अरुण कुछ चिंतित है, एक छुट्टी के दिन फुर्सत के पलों में रूपा पूछ बैठी “आप बेटी के पिता बन कर खुश नहीं है….”
“किसने कहा मै खुश नहीं हूँ, मै अपनी परी को पा कर बहुत खुश हूँ..”अरुण बेटी को दुलराते बोला।
“आप तो अस्पताल में भी प्रसव के बाद नहीं दिखे, ना आपके चेहरे पर खुशी दिखी “रूपा की बात सुन अरुण गंभीर हो गया, रूपा का माथा सहलाता बोला,”रूपा,मै पुरुष जरूर हूँ पर मेरे अंदर भी तुम्हारी तरह संवेदना धड़कती है,
तुम अपनी चिंता, अपने आँसू, अपनी खुशी दिखा सकती हो, पर हम पुरुषों को इस तरह की आजादी नहीं है,हमें अपने आँसू खुद ही पोंछने पड़ता है, अपनी हिम्मत खुद बनानी पड़ती, क्योंकि पुरुष को शक्ति का प्रतीक माना गया,।
इन नौ महीने मै किसी दिन चैन से नहीं सोया, डॉ. ने बताया था, प्रसव में दिक्कत आ सकती है, मैंने तुम्हे नहीं बताया, मै नहीं चाहता था तुम अपना चैन खो बैठो, ऑफिस से देर से इसलिये आता था,
ओवरटाइम कर मै और पैसे कामना चाहता था, जिससे तुम्हे और मेरी परी को कोई कमी ना हो…, हाँ तुम्हारी मम्मी को ही सबसे पहले आने के लिये कहा था, पर उन्होंने अपनी तबियत का हवाला दे मना कर दिया था, तब मैंने माँ को कॉल किया था, क्योंकि तुम्हे पूरा आराम चाहिए था..।
“आपने मुझे ये सब बताया क्यों नहीं “रूपा ने शर्मिंदगी से कहा, कितना गलत सोचती थी अरुण के लिये,।
“तुम्हे बता कर मै तुम्हारी परेशानी बढ़ाना नहीं चाहता था, तुम मेरे बच्चे की माँ बन रही थी तुम्हारी देखभाल मेरी जिम्मेदारी थी,पर रूपा पुरुष कितना भी कठोर हो, आखिर एक मानवीय गुणों वाला इंसान ही होता है,
ऑपरेशन रूम के बाहर खड़ा मै,अपने आँसू और चिंता को छुपाने अलग खड़ा था, जब तुम होश में आई, मै मंदिर भगवान का शुक्रिया अदा करने गया था ..सब कुछ कुशलता से हो गया ….”अरुण बोल कर परी को ले बाहर चला गया..।
और रूपा सोच रही थी, पुरुष का ये रूप तो कभी देखा नहीं, उसके अपने पिता से वही नहीं, सब भाई -बहन डरते थे, शादी के बाद अरुण का कड़क व्यवहार उसे बुरा नहीं लगा क्योंकि उसके मन में पुरुषों के लिये यही अक्स था,।
पितृत्व के अहसास ने अरुण को कितना बदल दिया था, पहले का कड़क अरुण अब रूपा को बिना कहे कामों में सहयोग देने लगा था,परी के रोते ही अरुण बेचैन हो जाता था,डाइपर बदलते अरुण को देख कई बार रूपा मुग्ध हो जाती,.।पुरुष ऐसे भी होते है ये तो उसने अब जाना…।
—संगीता त्रिपाठी
#गाजियाबाद
#पुरुष
माता पिता को हमारी छोटी छोटी उलझनों का पता चलने पर परेशान होते देखकर अपनी नाराजगी जताई तो जवाब मिला, बेटा जब बाप बनोगे, तभी समझ सकोगे हम लोगों को……….
एक उत्तम कहानी………….
सुंदर कहानी हैऐसी कहानियों की आवश्यकता है नैतिकता और मानवता सेसंबंधितकुछ कहानियांएवंव्यक्तित्व विकास चरित्र निर्माणसे संबंधित कहानीकी नितांत आवश्यकता समाज को हैकहानी लिखने की कलासभी अभी मैं नहीं होता हैऑफिस विद्या में माहिर हैइसलिएनैतिकता मानवता व्यक्तित्वविकासचरित्र निर्माण से संबंधितकहानीभी लिखिए उचित होगासमाज को एक शिक्षा मिलेगीधन्यवाद