रीमा की फ़िज़ूलखर्ची और ज़िद्दी स्वभाव के कारण दिन रात होती लड़ाई से उमेश परेशान हो चुका था । आज रीमा से इस बारे में बात करेगा कि अभी भी वक्त है।जो भी एक दूसरे को नापसंद हो .. दोनों ही अपनी आदतें सुधारने की कोशिश करेंगे,,,और फिर भी कोई सुधार नहीं हुआ तो बगैर किसी इशू के दोनों अलग हो जायेंगे”...सोचते हुए उमेश घर पहुंचा और डुप्लीकेट चाबी से ताला खोलकर अंदर गया तो रीमा का सामान गायब था। मेज़ पर एक काग़ज़ रखा मिला जिसमें चंद लाइनें लिखी थीं “जा रही हूँ.. तुम्हारे जैसे कंजूस और घटिया इंसान के साथ मैं अपना पूरा जीवन बरबाद नही करना चाहती”——रीमा
पढ़ते ही उसे चक्कर सा आ गया और वह वहीं सिर पकड़कर बैठ गया।
उसे याद आ रही थी रीमा से उसकी मुलाकात,,,जो एक दोस्त की शादी में हुई थी । फिर उससे मीठी तकरार कब प्यार में बदल गई, पता ही नही चला। इसके बाद घरवालों को शादी के लिए मनाना, ना मानने पर उनकी मर्ज़ी के बगैर दोनों का लिव इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला करना, उसके बाद भी माँ, पापा का शादी के पवित्र बंधन का मज़ाक उड़ाने की नाराज़गी और बदनामी का डर बताकर समझाना फिर घर से बेदखल करने की चेतावनी देना वगैरह वगैरह,,,,, अतीत की बातें उसके सामने किसी फिल्म की तरह चलने लगीं ।
उसके कानों में माँ की कही बातें गूंज गईं कि “बेटा,शादी के बाद लोग एक दूसरे को जीवन भर उनकी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ निभाते हैं पर उसके पहले पति पत्नी की तरह रहना अपनी संस्कृति और मर्यादा का उल्लंघन करना है.. ऐसे संबंध देर तक नही टिकते हैं और ज्यादातर शादी से पहले ही खत्म हो जाते हैं।”
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पर वह भी कहाँ माना था? उन्हें कितनी बद्तमीज़ी से जवाब दिया था “आप किस ज़माने की बात कर रही हैं मम्मी?अब ऐसी बातें कॉमन हो गई हैं और अब तो कोर्ट ने भी इजाज़त दें दी है,,, वैसे ज़माने के साथ आप लोग भी तो कुछ बदलिये मम्मी” फिर मम्मी पापा की नाराज़गी की परवाह किये बगैर वह रीमा के साथ अलग रहने चला गया।
“सच ही तो कहा था मम्मी ने।” उसकी आंखें भर आईं “शादी किये बगैर पति पत्नी की तरह रहना पवित्र बंधन और मान मर्यादा का मज़ाक उड़ाना ही तो है।” काश कि उनका कहना माना होता..रह-रहकर उसे अपने ऊपर क्रोध आ रहा था “क्यों नहीं अपने बड़ों की बात मानी,, आख़िर वो हमसे ज़्यादा अनुभवी होते हैं। पर उस वक्त आधुनिकता का चश्मा जो चढ़ा था उसके दिमाग में,,, अब क्या करें? क्या मुँह लेकर मम्मी के पास जाये?” उसके दिमाग में झंझावात चल रहा था। अंततः उसने निर्णय लिया “वह जायेगा और जाकर उनके पैर छूकर उनसे माफी माँग लेगा आखिरकार वह माता,पिता हैं .. अपने बेटे को ज़रूर माफ कर देंगें” सोचते हुए उसने माँ को फोन लगा दिया..”मम्मी,,,, सॉरी,,,आप लोग सही थे,,,, मैं वापस आ रहा हूं”
कल्पना मिश्रा