विषकन्या – सुषमा यादव

नागिन जैसी बलखाती,फन फैलाती,रोब झाड़ती,लाल लाल आंखें, अपने शब्दों से विषवमन करती, किसी भी अन्याय का प्रचंड विरोध करती,वो है एक विषकन्या,

जी हां, मुझे यही नाम दिया गया था, मेरी मां ने और बाद में सभी ने।

मैं बहुत ही गुस्सैल, स्वभाव की हूं, किसी की ग़लत बात को सहन नहीं कर सकती, बचपन से ही,, किसी को भी चांटा जड़ देना या जो भी हाथ में है उससे पीट देना,अपनी जहरीली बातों से उसका ह्रदय लहूलुहान कर देना,

अपनी बात पर अडिग रहना, गुस्से में एकदम पागल हो जाना,या तो मर जाना या सामने वाले को मार डालना,, ये सब पागलपन देख कर मेरी मां मुझे विषकन्या कहने लगी, और कालांतर में स्कूल में भी यही उपाधि मुझे मिल गई।।

जरूरी नहीं है कि हम अपने पर किये गये अत्याचार और अन्याय का विरोध मायके या ससुराल में ही करें। हमें अपने कार्यक्षेत्र, अपने आसपास, अड़ोस पड़ोस जहां भी हमारा तिरस्कार, अपमान और अन्याय होता है,सबका निडर होकर डट कर विरोध करना चाहिए। 

मेरे बाबूजी ने मुझे ये मंत्र दिया था,,** ना तो किसी के साथ अन्याय करो और ना ही अन्याय सहन करो।।

इसी से संबंधित एक बहुत ही रोचक प्रसंग आप सबके साथ साझा कर रहीं हूं।

मैं शिक्षक संघ में महिला प्रकोष्ठ की प्रांतीय अध्यक्ष थी और विश्व शिक्षक संघ की सदस्य रही हूं।

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एक बार पूर्व का घोषित ईद का अवकाश निरस्त कर दिया गया था, मैंने जैसे ही समाचार पत्र में पढ़ा, फौरन स्कूल स्टाफ और प्रिंसिपल सबको सूचना दिया,आज का अवकाश निरस्त कर दिया गया है,आप सब तुरंत स्कूल पहुंचिए। सब अपने अपने साधनों से पहुंच गए, लेकिन मैं सबको सूचना देने के बाद जब सड़क पर ऑटो देख रही थी मुझे नहीं मिला तो मैं एक मोटरसाइकिल वाले से लिफ्ट मांग कर स्कूल पहुंच गई।

मैं जैसे ही आफिस में गई मैंने देखा कि मेरा कालम खाली था। शिक्षा अधिकारी पेन लिए बैठे थे, उनके स्टाफ में से किसी ने धीरे से कहा,,आ गई विषकन्या,,

और जल्दी से शिक्षा अधिकारी ने मेरे कालम में,,ए,, लाल स्याही से लिख दिया,, फिर क्या था,विष कन्या फनफना उठी, फुंफकारते हुए गुस्से में बोली,,सर, मैं आपके सामने खड़ी हूं, फिर भी आपने मेरे कालम में,, ए,,लिख दिया,इसका मतलब आप समझते हैं, वो हैरानी से मुझे देखते हुए बोले,,इसका मतलब यह है कि आप अपसेंट है,,पर मैं तो आपके सामने खड़ी हूं,, और हां, मुझे याद आया, मैंने आपकी गाड़ी को हाथ दे कर रोका था,पर आपने नहीं रोका, मुझे साधन नहीं मिल रहा था, तो क्या आप मानवता के नाते मुझे लिफ्ट नहीं दे सकते थे। उनके साथ आये उनके सहयोगियों ने कहा, वो एक अधिकारी हैं,, क्यों रोकेंगे,, मैंने कहा, मेरे पति इनसे भी बड़े अधिकारी हैं,पर पता नहीं कितनों को मदद मांगने पर बिठा लेते हैं,

और आप प्रिंसिपल सर,,आप को तो मैंने ही फोन किया और मेरे ही खिलाफ आपने इन्हें बुला लिया, आपने ये अच्छा नहीं किया,,।

मैं उन सबसे भिड़ गई,, हमारे सर ने कहा,, मैं कह रहा था ना, वो यही विषकन्या है। सर बहुत जहर उगलती है,,

मैंने पलट कर आग्नेय नेत्रों से देखा और अपने स्टाफ रूम में चली गई,,मेरा गुस्सा अपनी चरम सीमा पर था,सारा दिन ज़हर उगलती रही।

घर गई पतिदेव से कहा,, आप जाकर कलेक्टर साहब से कहिए। आप संभागीय अधिकारी हैं,आप उनसे जाकर मिलिए।

मैं नहीं जाऊंगा, इतनी छोटी सी बात के लिए। एक दिन का वेतन ही तो काटेंगे,, पर क्यों काटेंगे जब मैं वहां थी। 

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मैंने अपने साथ के और शिक्षकों को लिया जो उनके सामने थे और उन्हें भी अनुपस्थित कर दिया गया था, और पहुंच गई, जिला शिक्षा अधिकारी आफिस,, और खूब हंगामा किया,सब लोग आकर सुनने लगे, ये कौन है जो सर से बहस कर रही है,, अरे वही विषकन्या,, अच्छा,, बहुत नाम सुना था,, ये तो मंत्रियों से और बड़े बड़े दिग्गजों से खूब भिड़ जाती है, अपने लिए और अन्य लोगों के लिए भी,, किसी से भी बिल्कुल नहीं डरती।।

आखिरकार हारकर सर ने मेरे नोटिस के नाम के आगे लाल गोला काट कर अपनी टिप्पणी लिख दी,, और कहा,अब आप जाइए आप को कोई नोटिस नहीं आयेगी,,

पर शायद मुझसे कुछ लोग चिढ़े हुए थे और सबके साथ मेरा भी एक दिन का वेतन काट लिया गया,, अन्याय के विरोध में विषकन्या का क्रोध फुंफकार उठा, और पहुंच गई, कलेक्टर साहब के आफिस,, चपरासी से पूछा,सर हैं,, जी हां,, मैंने अपना परिचय पत्र भिजवाया, उन्होंने तुरंत अंदर बुलाया। मैं एकदम से सामने गई। सर ने कहा, बैठिए, बताइए,,,,,जी नहीं, मैं ठीक हूं,बस आपसे एक प्रश्न पूछना है,




,आप कहीं जांच करने गए हैं, और आपके सामने कोई कर्मचारी खड़ा है तो आप उसको अनुपस्थित कर देंगे या उससे लेट आने की वजह पूछेंगे, और क्या जो सामने है, और जो बिल्कुल ही नहीं आया उसकी सजा और उन सबकी सजा एक जैसे रहेगी,

सर बड़े ही गौर से देखते हुए बोले, नहीं हरगिज़ नहीं,, ये तो अन्याय होगा,

वही तो सर जी,, विषकन्या ने टेबल पर जोर से हाथ पटक कर कहा, और सब वाकया उस दिन का विस्तार से बताया,,

सर ने अपने मातहत से कहा,, तुरंत डीईओ को फोन लगाओ, उधर से आवाज आते ही सर ने कहा, फलां स्कूल की वो शिक्षिका आपके सामने थीं जी हां सर, फिर कैसे आपने उन्हें अनुपस्थित किया और वेतन काटने का आदेश दिया,अभी तुरंत बहाल करिए,,जी सर, मैंने कहा,सर जी जो जो उस दिन विद्यालय पहुंच गए थे,सबका वेतन बहाल करवा दीजिए, प्लीज़,, क्यों कि हम सबकी गलती नहीं थी, जैसे ही हमे पता चला,सब भागते हुए देर सबेर आ गये थे,, और यहीं नहीं पूरे प्रदेश में ऐसा ही वाकया घटित हो गया था,,ईद का अवकाश निरस्त कर दिया गया था,, इसलिए ये सब हो गया था।। और दो दिन बाद हम सबका वेतन बहाली का आदेश आ गया था,,

सब बहुत खुश हुए, विषकन्या ने अपना काम कर दिया।। 

मैंने भी हंसते हुए कहा,,आप सब जानते हो,, मैं कहां की हूं,ना सौ पढ़ा और ना एक,,,,,,हा हा हा,, सबके साथ हम भी दिल खोलकर हंसे।। 

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हर प्रकार के अन्याय का प्रबल विरोध करना चाहिए,,ना अन्याय करो और ना ही अन्याय सहो,,।।

वरना विषकन्या से बचना मुश्किल हो जाएगा,,, ऐसा ज़हर उगलेगी कि उसके काटे का कोई तोड़ नहीं मिलेगा ,,

 

#विरोध 

सुषमा यादव, प्रतापगढ़, उ प्र

स्वरचित मौलिक अप्रकाशित

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