“क्या राज है अंजू, तू सास -ससुर के साथ रहती है, फिर भी सोसाइटी के हर एक्टिविटीज में भाग लेती है। सजी संवरी भी रहती,कैसे मैनेज करती है तू, हमें भी वो राज जानना है।”नीला ने अंजू से पूछा।
“कुछ नहीं यार, बस दिमाग से काम लेती हूँ, वो लोग भी खुश और मै भी खुश यानि हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा -चोखा.., अर्थपूर्ण मुस्कान से अंजू बोली।
“अब बता भी दे, कैसे तुम अपने शौक के लिये समय निकाल लेती है, और घर में भी सब बढिया”.। तीसरी सहेली प्रिया बोली।
देख,जब भी मुझे खाना बनाने का मन नहीं होता मै सासु माँ को बोल देती -माँ ये कह रहे थे आप कोफ्ते बहुत अच्छा बनाती हैं। मुझसे आप जैसा बनता ही नहीं। बस फिर कौन माँ होगी जो बनाने से इंकार कर दे, मेरी सासु माँ गदगद होकर कि बेटे ने फरमाइश की है, तुरंत बनाने को तैयार हो जाती हैं। बस वो खुश कि बेटे को आज भी उनका बनाया
खाना पसंद और मुझे खाना बनाने से फुर्सत…।किट्टी हो या घर में कोई पार्टी हो, मै आधे से ज्यादा काम सासु माँ से ही करवा लेती हूँ।और तो और, जब मुझे मम्मी जी का कोई गहना पसंद आ जाता तो मै उसकी इतनी तारीफ करती हूँ कि मम्मी जी मुझे ही दे देती।ननद रानी को मै मौका ही नहीं देती, सासु माँ के गहने ले जाने को,।
सब सहेलियां राज जान मुस्कुरा पड़ीं। वे भूल गईं, क्लब के दूसरे कमरे में सीनियर सिटीजन की बैठक चल रही थी। अंजू और नीला की सास ने भी सारी वार्तालाप सुनी।दोनों की सास भी आपस में अच्छी सहेलियां हैं।अंजू की सासु माँ निर्मला जी का चेहरा उतर गया। अभी कुछ देर पहले ही वो किसी से बहू की बड़ाई कर रही थीं,
और अपने को भाग्यशाली बता रही थीं । नीला की सासु माँ उमा जी ने सहेली का चेहरा उतरा पाया तो पास आकर उनको हौंसला बढ़ाया -तू क्यों उदास हो रही निर्मला, वो आज की बहुयें हैं, तो हम लोग कहाँ किसी से कम, मैं तुझसे जैसा कहूँगी तू ठीक वैसा कर।उन लोगों ने भी अपनी सहेली को बहू से काम करवाने के तरीके बता दिया। हम आज की सास हैं, पर बहू तो पुरानी थीं, अपनी सास के सारे तिकड़म अच्छे से जानती थीं।
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अगले दिन इतवार था अंजू देर से सो कर उठी, रसोई में सन्नाटा था। अरे अभी मम्मी जी उठी नहीं क्या, नाश्ता तो क्या चाय भी नहीं बनाई। रसोई में झाँक कर रसोई में देखा।सासु माँ के कमरे में गई तो वो मजे से रजाई तान कर सो रही थीं। अंजू ने उनका माथा छू कर देखा, ना बुखार तो नहीं हैं, फिर क्या बात हैं। तभी प्रतीक की आवाज सुनाई दी,
अंजू दस बज गये अभी तक चाय नहीं मिली।मम्मी जी उठी नहीं,अंजू ने पूछा तो प्रतीक ने बताया,हाँ उनके घुटने में दर्द है, सुबह वो उठी थीं कराह रही थीं, मैंने ही उन्हें आराम करने को बोला।हाँ नाश्ते में आज तो पकौड़ियाँ बननी हैं, जल्दी से चाय पिला कर पकौड़ियाँ खिलाओ…,
प्रतीक की बात सुन अंजू बिचारी भाग कर रसोई में गई, चाय चढ़ाई पर मूड चौपट हो गया आज संडे था सोचा था आराम से सासु माँ के हाथ की गर्म -गर्म पकौड़ियाँ खायेगी, और अदरक वाली स्पेशल चाय पियेगी पर यहाँ तो उल्टी पड़ गई।
सब लोग नाश्ता करने टेबल पर पहुंचे, सासु माँ का मोबाइल बज उठा। निर्मला जी ने कॉल उठाया तो उधर से आवाज आई। क्या कर रही हो..। नाश्ता कर रही हूँ, बहू ने बहुत अच्छी पकौड़ियाँ बनाई हैं, तुझे खानी हैं तो तू भी आ जा।
दस मिनट में ही निर्मला जी की तीन सहेलियां घर पहुँच गईं। अंजू को सबको पकौड़ियों का नाश्ता कराना पड़ा। तभी उमा देवी बोलीं, अरे निर्मला कल क्लब में हरी साड़ी पहननी हैं तुझे याद हैं कि नहीं,
उफ़्फ़, मैं तो भूल गई थी। कोई बात नहीं, अंजू तुझे हरी साड़ी दे देगी और हाँ अंजू बेटा साड़ी के संग मम्मी को वो अपना मोती वाला सेट भी दे देना। तेरी सास को भी लगना चाहिये कि अंजू की सास हैं।
अंजू कुछ बोल ना पाई, वहाँ सास के ग्रुप में सब बोल रहे थे, ये बहुयें हमें बनाने चली हैं, इनको नहीं पता की तू डाल -डाल तो हम सब पात -पात हैं।
बिचारी अंजू का अब दिमाग ही नहीं काम कर रहा, ये कैसी बयार चली जो उसकी सासु माँ को बदल दी।
-संगीता त्रिपाठी